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लघु-कथा

लघुकथाओं के क्रम में इस माह प्रस्तुत है
भारत से मुक्ता पाठक की लघुकथा- प्याज़ के पकौड़ों का जादू
 


बरसात का मौसम था। आकाश में काले-काले बादल छाए हुए थे और रुक-रुक कर रिमझिम फुहारें पड़ रही थीं। ऐसे में, किसी और चीज़ की नहीं, बल्कि गरमागरम, क्रिस्पी प्याज़ के पकौड़ों की याद आना स्वाभाविक था। और यह याद किसी और को नहीं, बल्कि सात साल की छोटी परी को आई, जो छुट्टी का एक दिन बिताने दादी के पास आई थी।

"दादी!" परी ने अपनी दादी की साड़ी का पल्लू पकड़कर खींचा, "आज पकौड़े बनाएँगे ना? वो वाले, जिसमें कुरकुरी प्याज़ होती है और थोड़ी सी हरी मिर्च!"

दादी, मुस्कुरा दीं। उनकी आंखों में एक खास चमक आ गई। "अरे मेरी लाडो, तुझे पता है पकौड़ों का असली मज़ा कब आता है?"
परी ने सिर हिलाया, "जब बारिश हो?"
"बिल्कुल! और जब उन्हें प्यार से बनाया जाए।" दादी ने कहा और रसोई की ओर चल पड़ीं।

रसोई में, दादी ने बेसन, बारीक़ कटी प्याज़, हरी मिर्च, धनिया और कुछ मसाले एक बड़े कटोरे में मिलाए। परी ने उत्सुकता से उन्हें देखा। हर बार की तरह, दादी की हर हरकत में एक जादू सा था। जब बेसन का घोल तैयार हो गया, दादी ने अपनी उंगलियों से थोड़ा सा घोल उठाया और परी के नाक पर लगा दिया।
"दादी!" परी हँसी, "ये क्या किया?"
"शगुन! अब देख, पकौड़े कितने स्वादिष्ट बनेंगे।"

तेल गरम हुआ और दादी ने धीरे-धीरे पकौड़ों को गरम तेल में छोड़ना शुरू किया। गरमाहट में डूबते ही, बेसन और प्याज़ का मिश्रण एक सुनहरे, कुरकुरे रूप में बदलने लगा। रसोई में पकौड़ों की धीमी, मनमोहक खुशबू फैल गई, जिसने बारिश की सौंधी महक के साथ मिलकर एक अद्भुत समां बाँध दिया।
पहला बैच तैयार होते ही, दादी ने उसे एक थाली में निकाला। परी अपनी उत्सुकता रोक नहीं पाई और एक छोटा सा पकौड़ा उठा लिया। "गरम है, धीरे-धीरे खा," दादी ने चेताया।
परी ने फूँक-फूँक कर पकौड़ा खाया। उसकी आँखें खुशी से चमक उठीं। "दादी, ये दुनिया के सबसे अच्छे पकौड़े हैं!"

दादी फिर मुस्कुराईं। उनके लिए, पकौड़ों का स्वाद केवल मसालों और तेल से नहीं आता था, बल्कि उसमें जुड़ा होता था बचपन की यादों का मीठापन, बारिश की फुहारों का आनंद, और सबसे बढ़कर, परिवार के साथ बिताए उन अनमोल पलों का प्यार। उस दिन, प्याज़ के पकौड़ों ने सिर्फ पेट ही नहीं भरा, बल्कि दादी और परी के दिलों में एक और खूबसूरत याद भी जोड़ दी।

१ जुलाई २०२४

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