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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में प्रस्तुत है
भारत से नीलेश शर्मा की कहानी- मिले सुर मेरा तुम्हारा


पिछले आठ नौ दिन से बारिश लगभग लगातार जारी थी। कभी धीमी , कभी तेज और कभी बहुत तेज। पूरा मथुरा बादलों की चादर ओढ़े बूंदो की थाप पर थिरक रहा था। कई जगह सड़कें गीली तो बहुत सी जगह जलमग्न थी ऐसे कि ईंटों और पत्थरों के टुकड़े पानी से गर्दन बाहर निकालकर झाँक रहे होते जैसे साँस लेने को बाहर आये हों।

ये अगस्त और मानसून का महीना था तो बारिश होना जायज था। चारों तरफ हरियाली और हरे तोतई पत्तों से ऊपर से नीचे तक लदे फँदे वृक्ष जिनकी पानी से भीगी हुई भूरी छालें नाक को एक अलग ही महक का अनुभव देती थी। मथुरा श्री कृष्ण का जन्मस्थान, दुनिया के लिए महान तीर्थ स्थल और ये महीना अगस्त का जिसमें जन्माष्टमी पड़ती है और इस साल इसी महीने आखिर में जन्माष्टमी है।

लाखों की भीड़ कन्हैया का दर्शन करने मथुरा में एकत्रित हो जाती है, हर साल के अनुभवों से सीख कर इस साल भी जिला प्रशासन पहले ही सचेत हो गया था और उसने अगस्त शुरू होते ही मथुरा में ट्रक, भारी वाहनों और कमर्शियल वाहनों को प्रतिबंधित कर दिया था। महीना ये जन्माष्टमी और कृष्ण जन्म के साथ साथ बारिश का भी था इसलिए चारों तरफ कन्हैया के जन्मोत्सव की खुशबू फैलना शुरू हो चुकी थी। शहर की हवा में दुकानों पर रखे छोटे नन्द लाला के वस्त्रों की कतारें, फूल मालाएँ और हवा में मोगरे की खुशबू मिल चुकी थी। हलवाइयों की दुकानों पर लोहे की कढ़ाई में गर्म उबलता दूध, जलेबियाँ और मथुरा की प्रसिद्ध कचौरियाँ ग्राहकों को मसालेदार सुगंध के साथ अपने पास आने का इशारा भी करती प्रतीत होती थीं। मथुरा में एक चीज हर हलवाई की दुकान पर ऐसे मिलेगी कि बताने की जरूरत ही नहीं होती। मथुरा का प्रसिद्ध पेड़ा।

मथुरा शहर के बीचों बीच स्थित है मथुरा जंक्शन रेलवे स्टेशन। यह भारतीय रेलवे और देश का सबसे बड़ा जंक्शन स्टेशन है जहाँ एक या दो नहीं बल्कि सात दिशाओं से रेलवे पटरियाँ आकर मिलती हैं और यही वो स्टेशन है जहाँ से भारत के किसी भी हिस्से को जाने वाली ट्रेन मिल जाती है। सात प्लेटफार्म वाला ये बड़ा स्टेशन मजबूत टिन और सीमेंट की छतों से घिरा हुआ है और पिछले दिनों की बारिश की वजह से स्टेशन और आसपास कुछ भी सूखा नहीं है, बाहर निकलते ही ऑटो, टेम्पो और रिक्शे टाँगे वाले घेर लेते हैं। स्टेशन से स्लेटी काले डामर की घुमावदार सड़क सीधे चली जाती है रेलवे कॉलोनियों की तरफ।

इन्हीं रास्तों पर शुरू हुई थी हमारी कहानी, वर्ष १९८५ और १९९० के मध्य, जबकि मुंबई रेलवे मार्ग का विद्युतीकरण हुआ था ये सभी कॉलोनियाँ रेलवे ने तभी बनवायी थी जिनमें बने क्वार्टर्स में रेलवे कर्मचारी और उनके परिवार रहते थे। स्टेशन से निकलकर काले डामर और सीमेंट की एक पक्की सड़क घूमते हुए जिसके एक तरफ थे भारत सरकार द्वारा लगवाए हुए वृक्ष और दूसरी तरफ रेलवे स्कूल की दीवार। स्टेशन से करीब डेढ़ किलोमीटर इस सड़क पर चलने के बाद हलके पीले रंग के बने दो मंजिला क्वार्टरों की कॉलोनी प्रारम्भ हो जाती है। ये कॉलोनी १९८० में थोड़ा पहले ही बन गयी थी, जब दिल्ली मुंबई रेलवे रूट का विद्युतीकरण किया जा रहा था।

दोनों मंजिलों को मिलकर कुल १५० फ्लैट हैं। भारतीय संस्कृति और समाज में जो विविधिता है वही इस कॉलोनी में भी है। जैसे ट्रेन में देश के हर हिस्से के व्यक्ति मिल जाते हैं वैसे ही रेलवे की इस कॉलोनी में भी थे। हरियाणा के शर्मा जी, झाँसी के काजी, आगरा के अग्रवाल साब, केरल के नायर, होशियारपुर के सुखवंत सिंह और लगभग हर कोने से अलग-अलग जाति धर्म के लोग रेलवे के कर्मचारियों के रूप में यहाँ बसे हुए थे। पद और पोस्ट के हिसाब से क्वार्टर का रूप और आवंटन भी था जैसे बड़ी पोस्ट और बडे अफसर को तीन कमरों वाला बड़ा घर बड़ा आँगन जिसे टाइप थ्री कहते थे उस से कम दो कमरे, आँगन और बाकि कुछ छोटे टाइप टू। इस तरह से मकानों को बनाया गया था और क्वार्टर का ये स्टेटस बन्दों में भी झलकता था। कहानी के लिए आवश्यक था इसलिए इनका वर्णन कर दिया लेकिन कहानी मुख्यत आज कॉलोनी के ठीक मध्य के एक टाइप टू टाइप क्वार्टर पर आधारित है। इस दो कमरों बड़े आँगन किचन, बाथरूम, एक स्टोररूम और एक गैलरी वाले क्वार्टर में हरियाणा के रहने वाले शर्मा जी जो अपनी बीवी और दो बेटियों के साथ रहते हैं। उनके ठीक साथ में एक ठाकुर जी जो कैशियर हैं रेलवे में वो रहते हैं। इसी तरह ये पूरी कॉलोनी बसी हुई है अलग अलग प्रान्त जाति और धर्म के रेलवे कर्मचारियों के साथ।

शर्मा जी की पत्नी गृहणी हैं और अड़ोस पड़ोस में पूरी जानकारी और दखलंदाजी रखती हैं। कट्टर हिन्दू और जाति में ब्राह्मण होने के कारण उनमें ब्राह्मणवाद और ऊँचनीच की धारणा भी कूट कूट के भरी हुई है। किसी दूसरे धर्म या छोटी जाति से छूत अछूत करना उनके रक्त और स्वभाव में है। निम्नजाति और किसी दूसरे धर्म के साथ खाना पीना तो दूर उनके यहाँ से आया हुआ कुछ तक भी वो जीभ पर नहीं रख सकती। दो बेटियाँ हैं उनकी बड़ी स्वीटी जो बी ए में पढ़ रही है और छोटी मनीषा जिसे वो कल्लन कहती थी क्योंकि रंग साँवला था उसका।

बड़ी बेटी स्वीटी आज बरसती बारिश में भी अपने कॉलेज जाने से खुद को न रोक सकी दरअसल आज उसकी बी ए की परीक्षा थी। सुबह बारिश तेज नहीं थी सिर्फ बूँदाबाँदी थी तो वह छाता लेकर अपने कॉलेज पहुँच गयी थी। उसकी परीक्षा दोपहर ११ बजे से तीन बजे तक होनी थी लेकिन वो घर नौ बजे अपने कॉलेज के लिए चली गयी। करीब १० बजे जबकि सभी लोग अपने काम धंधे में लगे हुए थे। अचानक आसमान में बादलों का जमावड़ा और बढ़ा और हवाएँ भी कुछ तेज चलने लगी। साढे दस बजे तक अधिकांश कर्मचारी और शर्मा जी भी अपने अपने ऑफिस रवाना हो गए थे।

लेकिन आज के दिन शायद कुछ और ही लिखा था। ग्यारह बजे तक हवाओं ने बहुत तेज गति पकड़ ली। बारिश तो मौसम होने की वजह से कई दिनों से हो रही थी लेकिन आज तेज हवा भी चलने लगी, इतनी तेज कि जगह जगह लगे बिजली के खम्बे भी हिलने लगे। पंद्रह से बीस मिनट भी न गुजरे होंगे कि बहुत तेजी से बूँदें पड़ने लगी, अचानक बारिश ने रफ़्तार पकड़ ली। वर्षा इतनी तेज थी, जैसे सड़क के दोनों छोरों पर खड़े होकर उस पर कोई पानी की चादर बिछा रहा हो।
कॉलोनी में एक एक इंच पानी वैसे भरा हुआ था और अब उसका भी स्तर बढ़ने लगा। बारिश के रूप में गिरती बूंदे सड़क पर नाचती चली जाती थी। क्वार्टर की दीवारों पर लगे हुए पाइपों में बहुत सी छोटी चिड़ियों ने घोसलें बना रखे थे, वो सब भी बारिश के रफ़्तार पकड़ते ही अपने अपने घोसलों में दुबक गए थे।

जले पे नमक छिड़कना इसे कहते हैं कि तेज बारिश को देखते हुए कॉलोनी की बिजली काट दी गयी जिस से कि बिजली के लोहे के खम्बों से कोई अनहोनी न हो जाए ये सामान्य बात थी और मौसम ख़राब होने पर बिजली काट दी जाती है। अब कॉलोनी के इतिहास को देखते हुए बिजली रात तक आने वाली नहीं थी। बारिश और तेज हो गयी, ऊपरी मंजिलों के छज्जों और बालकोनी के पाइप से पानी धार के रूप में गिरने लगा। अब क्वार्टर के आगे सड़क पर पानी इतना हो गया था कि पंजा और जूता पूरा डूब जाए। तब इन्वर्टर का जमाना या विस्तार इतना नहीं था इसलिए घरों में या क्वार्टर में मोमबत्तियाँ, लैंप या खिड़कियों से आती रौशनी से ही गुजारा होना था। शर्मा जी की पत्नी यानि कि स्वीटी और कल्लन की मम्मी अपने घर के काम तो निपटा चुकी थी और अब समय काट रही थी।

बारिश चलती रही और करीब तीन घंटे में इस बारिश ने कॉलोनी और मथुरा के अधिकांश हिस्से को जलमग्न कर दिया था। समय दो और तीन के बीच में पहुँच गया शर्मा जी की पत्नी ने आसपास वाले क्वाटर की महिलाओं से बातें की तो पता चल गया कि हर जगह बहुत तेज और बहुत देर तक बारिश हुई है। कई जगह सड़क किनारे वाले नाले पूरे लबालब हो गए और पता नहीं चल पा रहा था कि सड़क है या नाला। दूर दूर तक बारिश और पानी।

यहाँ से कुछ चीजों ने पलटा मारा जब घडी की सुई तीन बजे को भी क्रॉस कर गयी। इतनी भारी बारिश के बाद उमस और उदासी फ़ैल गयी थी जो स्वाभाविक है, बारिश की सुस्ती और चिपचिपाहट में बैठी शर्मा जी की पत्नी का चेहरा अचानक चिंता के बादलों में घिर गया। अचानक उनका भाव बदल गया समय तो तीन बज गए, स्वीटी का तो पेपर कबका ख़त्म हो गया होगा लेकिन वो आज आएगी कैसे, उसे तो कोई रिक्शा तक न मिलेगा। हे भगवान सड़क के दोनों तरफ नाले भरे होंगे वो चलेगी कहाँ? शर्मा जी की पत्नी बड़े उम्र की थीं। हालत और अनहोनी की आशंका से उनका ब्लड प्रेशर एकदम से कम हुआ और चेहरा पीला पड़ गया।

बिजली अभी भी नहीं आयी थी और सिर्फ मिट्टी के तेल का लैंप जल रहा था , बी पी लो होते ही वो धम्म से जमीन पर बैठ गयी जहाँ पास ही पंख वाली चीटियों की बिल से कतार बाहर निकल रही थी, छोटी कल्लन मम्मी को बेसुध होते देखकर घबरा गयी और उसने बिना देर किये दरवाजा खोलकर तीसरे क्वार्टर में केरला के नायर अंकल का दरवाजा खटखटा दिया। आज वो घर पे थे तो अपनी बीवी के साथ वो कल्लन के पीछे पीछे चले आए।

मोबाइल का जमाना तो था नहीं, और लैंड लाइन फोन भी बंद थे। बात की बात में पूरी कॉलोनी शर्मा जी के क्वार्टर पे इक्कठा हो गई। अब शर्मा जी की पत्नी की चिंता सांझी चिंता बन गयी। इसी घबराहट के बीच में किसी महानुभाव ने यह बता दिया कि किसी जगह कोई रिक्शा नाले में पलट गया। ये सुनकर शर्मा जी की पत्नी जो बी पी की लौ से हल्का सा उबरी थी, फिर से ढेर हो गयीं जैसे किसी ने उनके सीने में कटार मार दी।

लोग सलाह देने लगे कि बारिश में स्वीटी को उसके कॉलेज से कैसे लाया जाये। जितने लोग उतनी सलाह, भारत मुख्यत सलाहकारों का देश है। घबराहट बढ़ने लगी और घडी की सुई अँधेरे का इशारा करने लगी। शर्मा जी की पत्नी सोचने लगीं कि किस भगवन की मन्नत माँगूँ तभी क्वार्टर के आगे एक रिक्शा आ कर रुका जिसके साथ ही दीना रांम जी खड़े थे वही दीना राम जी जिनके घर का कुछ खाना या छूना तक भी शर्मा जी की पत्नी पाप समझती थीं।

घबराई, भीगी डरी हुई स्वीटी रिक्शे से उतरी और रोते रोते अपनी मम्मी से चिपट गई। ''मम्मी पूरा पानी भरा था, मेरा बैग, कपडे भीग गए और कोई रिक्शा न मिला। दीना अंकल दिखाई दिए तब इन्होने रिक्शा ढूँढा और घर तक साथ लेकर आये ''स्वीटी ने दीना अंकल की तरफ देखते हुए माँ से कहा। अंकल मुस्कुराये और बोले कोई बात नहीं बच्ची घर आ गयी।

शर्मा जी की पत्नी ने कृतज्ञता से दीना को देखा और उन्हें खुद पे शर्म आ गयी कि जिस दीना को वो छोटी जाति का समझकर हिकारत भाव से देखती थी वही आज उनकी बेटी को भयंकर बारिश में सुरक्षित घर ले आया। उनके मन से ये ऊँच नीच का भाव निकल गया। बाहर फिर बारिश शुरू हो गयी लेकिन सबके मन अब धुले हुए और हलके थे। आज शर्मा जी की पत्नी ने सबको रोका कि वो सबके लिए पकोड़े और चाय बनाएँगी, उसी समय पूरे घर में उजाला हो गया तो केरला के नायर जी लुंगी पकड़ते बोले।
“चलो लाइट बी आ गया, अम भी पकोड़ा खाता ''
उनकी दक्षिणी हिंदी पर सब मुस्कुराने लगे।
पास खड़ी स्वीटी खुश थी कि अब मम्मी दीना अंकल की बेटी और स्वीटी की दोस्ती पर कोई आपत्ति नहीं करेंगी। अब बाहर तेज बारिश नहीं थी बस हलकी फुहारें थी। लाइट आई तो पहले से चालू टी वी पर बज रहा था- '' मिले सुर मेरा तुम्हारा...''

१ अगस्त २०२५

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