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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में प्रस्तुत है
भारत से जयनंदन की कहानी- छठ तलैया


सुगनी जो रोब हुई वियोग से
आदित होऊ न सहाय
सुगवा जो मारबो धनुख से
सुगा गिरे मुरुझाय

दशहरा के बाद कातिक हेलते ही हुलसी मम्मा (दादी) के भीतर अपने आप छठी-मैया के गीत बजने और उसी तर्ज पर होंठ फड़फड़ करने लगे हैं। बार-बार उसका ध्यान उसी पर जाकर टिकने लगा है। कैसे निभेगा ई बच्छर (इस वर्ष) मैया का बरत उसकी जर्जर बूढ़ी देह से और कैसे वह इस पराधीन शहर में भिड़ा पायेगी कोई जुगत? गाँव में रहती तो कोई न कोई रास्ता वह निकाल ही लेती। जबसे उसने अपनी सास द्वारा हस्तांतरित कई पुश्तों से चले आ रहे इस व्रत को घर की अन्य जिम्मेदारियों के साथ ग्रहण किया है तब से आज तक एक बार भी नागा नहीं किया। हालाँकि पिछले साल उसकी हिम्मत ने जवाब दे दिया था, फिर भी उसने जोखिम उठाकर किसी तरह पूरा कर लिया। मगर इस बीच एक साल में उसकी असमर्थता ने उसे बड़ी तेजी से बहुत बुरा दबोचा है।

मम्मा को अपने इस दुर्भाग्य पर रोना आता है कि उसके बेटे-बहू छठ अथवा अन्य पूजा-पाठ को बहुत बकवास और बेमतलब मानते हैं। वह कभी-कभी सोच जाती है कि ये लोग पढ़-लिख कर किस तरह के समझदार बन गये हैं जो अपनी माँ की इच्छा और विश्वास का मान तक रखना वाजिब नहीं समझते। मम्मा ने जब परंपरानुरूप बहू के जिम्मे छठ सुपुर्द करना चाहा तो उसने तो साफ इंकार किया ही, पंचानन ने भी उसका पक्ष लेते हुए बेलाग मना कर दिया कि इस तरह का भोंडा ढकोसला और फूहड़ क्रिया-कलाप उससे संभव न होगा। भला यह भी कोई व्रत है कि एक महीने तक माँस-मछली की कौन कहे, लहसुन-प्याज भी न छुओ...तीन दिन तक उपवास रखो...तालाब में सबके सामने अर्धनग्न नहाओ और सूप लेकर पानी में खड़े रहो। ना-ना यह पाखंड तुम अपने तक ही सीमित रखो।

हुलसी मम्मा अपने बेटे की इस उपहासजनक उक्ति पर काँप गयी थी कि कहीं छठी-मैया उसे अपना कोपभाजन न बना ले। वह पंचानन को चुप कराते हुए मन-ही-मन देवी से बेटे के इस अपराध के लिये क्षमा माँगने लगी थी।

जब तक हुलसा बाबा (दादा) जीवित रहे घर में छठ अन्य किसी भी त्योहार की अपेक्षा ज्यादा धूमधाम से होती रही। इस अवसर पर अपनी दोनों बेटियों और दोनों बहनों को निश्चित रूप से जाकर लाना उनका एक अटल नियम था। बुतरू-वानरों से पूरा घर मेले की तरह गुंजरित हो उठता था। ये दिन मम्मा के लिये सबसे ज्यादा हँसी-खुशी वाले दिन हुआ करते थे, जिसकी प्रतीक्षा वह लगभग साल भर करती थी। पहले अर्घ्य वाले दिन में सुबह से ही ठेकुए छनने लगते थे। समग्र नाता-कुटुंब के अलावा गाँव के हरेक जात-परजात और दुश्मन-दोस्त में इन्हें वितरित करने होते थे। इनके सुस्वादु होने की प्रशंसा महीनों तक होती रहती थी। मम्मा गरी-छुहारे-किशमिश और गाय के शुद्ध घी डालने में कोई कंजूसी नहीं बरतती थी।

वह छठी-मैया की ही पूजा का फल मानती है कि उसका इकलौता बेटा पंचानन उम्दा पढ़ाई करके टाटा में इंजीनियर बन गया और हर तरह से खुशहाल है। भरा-पूरा परिवार, बहुत ऊँची पढ़ाई पास बहू और दो राजकुमार जैसे बेटे।

पिछले साल जब हुलसा बाबा मम्मा को अकेला कर गये तो सारा कुछ गड़बड़ हो गया। न उसकी बेटियाँ बुलाई गईं, न ननदें। बहुत आहत हुआ उसका मन कि जमाने से चला आ रहा एक नियम टूट गया और इस अनियम की अवस्था में पता नहीं वह उन्हें फिर कब देख पायेगी।

बाबा के नहीं रहने पर उसे गाँव से टाटा चला आना पड़ा। अब आये एक साल हो चला है। यहाँ लगभग हर आराम और सुख है फिर भी रह-रहकर ऐसा लगता रहता है जैसे कोई चीज है जो गाँव में ही छूट गयी और यहाँ नहीं मिल रही। ऐसे समय में मम्मा का मन गाँव जाने के लिये एकदम तड़फड़ा उठता है....एक खूँटे में बँधी भूखी गैया की तरह। जब तक बाबा जीवित रहे, पंचानन के लाख अनुरोध पर भी यहाँ आने की उसने एक बार भी इच्छा न जतायी।

अब जब छठ एकदम करीब है तो मम्मा को लगता है कि उड़कर गाँव चली जाये। मगर उसे पंचानन से कहने की हिम्मत नहीं हो रही। कहे भी तो किस भरोसे पर? आँख से न ठीक से लौकता है, न लाठी के सहारे भी दस-बीस डेग से अधिक चला ही जाता है। इस हालत में छठ जैसा महायज्ञ करने की बात वह कैसे करे?
फिर भी पता नहीं क्यों उसके भीतर एक विश्वास जमा है कि छठी मैया उससे अपनी अर्चना जरूर करवा लेगी। वह पहली कातिक को ही बहू से कह देती है कि भन्सा भीतर (रसोई घर) को धो-पोंछकर महीने भर के लिये लहसुन-प्याज से वर्जित कर दिया जाये। वह एक जमाने से इस महीने शुद्ध सात्त्विक भोजन करती रही है।

इस प्रस्ताव को सुनते ही पंचानन ने सिरे से इसे निरस्त कर दिया, "अब जमाना बदल गया है मैया, इस तरह के पोंगापन का अब कोई मानी-मकसद नहीं है। दोनों बषों को सुबह-शाम अंडा चाहिए। तुम तो जानती हो माँस-मछली के बिना मुझसे भी अधिक रहा नहीं जाता।"

मम्मा जड़ रह गयी थी सुनकर। वाह रे बदला हुआ जमाना। उसे तो पाल-पोसकर बड़ा करने में उसने कभी अंडा-वंडा नहीं खिलाया, तो क्या कामयाबी उसको नहीं मिली...क्या वह इंजीनियर नहीं बना?

मम्मा जानती थी कि उसके जवाब का मान देने की जगह पंचानन फिर कोई सेर पर पसेरी वाली हुज्जत लाद देगा, इसलिये हार-सी मानती हुई वह कह देती है कि तब वह इस महीने दूध और केला आदि ही खाकर रह लेगी। पंचानन मानो गुर्रा कर रह जाता है।

दिन सरकता जाता है...छठ पास आती जाती है...मम्मा की बेचैनी बढ़ती रहती है। गाँव की बहुत सारी उसकी स्नेहपात्र जनानियाँ, जो उसकी देख-रेख में छठ करती थीं, बेसब्री से बाट जोह रही होंगी। कोई भूले-भटके भी गाँव से इस वक्त यहाँ आ जाता तो वह उसके साथ हो लेती। उसे सबसे ज्यादा कचोट इस बात की हो उठती है कि बरसों से उसके सूप पर पूरी आस्था के साथ अपनी मन्नत पूरने वाली अक्ली बुआ और उसका बेटा मुस्तफा भी उसके न जाने पर बहुत निराश होंगे।

मुस्तफा का खयाल आते ही मम्मा को अपने बेटे की नास्तिकता पर बहुत क्षोभ हो उठा। एक वह है कि मुसलमान होकर भी छठ के प्रति उसके मन में कितनी अगाध श्रद्धा है। बीस वर्षों से लगातार उसके सूप पर अपनी तरफ से प्रसाद चढ़ाता आ रहा है।
मम्मा के जेहन में पूरा घटनाक्रम एकबारगी बाढ़ की तरह उफन आता है।

मुस्तफा तब दस वर्ष का रहा होगा जब उसकी देह में कई जगह चरख (सफेद दाग) फूट आये थे। उसकी अम्मा अक्ली बुआ को किसी ने सुझाया था कि छठी-मैया की मन्नत माने और घर से तलैया वाले घाट (अर्घ्यस्थल) तक की दूरी साष्टांग दंडवत से नाप-नापकर तय करे तो जरूर उसकी बीमारी ठीक हो जायेगी।
मरता क्या न करता। यह उपाय बुआ को जंच गया और फिर अम्मा को ठेकुए के लिये रुपये एवं अन्य फल-फूल देकर सूप पर प्रसाद चढ़ाने लगी तथा मुस्तफा लेट-लेटकर तालाब तक हर साल पहुँचने लगा।

पता नहीं सचमुच देवी का चमत्कार हुआ या वह जो दवा खा रहा था उसका, तीन साल होते-होते वह बिल्कुल चंगा हो गया। अक्ली बुआ ने इसका श्रेय दवा से ज्यादा छठ को ही दिया। उसका भरोसा पुख्ता हो गया मानो। अच्छी खेती-बारी की वजह से सुखी-संपन्न थी वह। अतः किसी भी साल उसने सूप सजाने में कोताही नहीं की। तलैया पर दोनों माँ-बेटे अलग से ही हाथ जोड़कर अर्घ्य के समय ध्यानमग्न बैठे रहते। पास इसलिये नहीं सटते थे चूँकि हिन्दू महिलायें उनसे छूत मानती थीं। इस बर्ताव का वे बिना बुरा माने पूरा तवज्जो दिया करते थे। बहुत दिनों तक जब एक ही कुआँ था गाँव में, तब भी वे अपने को भरसक बचाकर अलग से ही आना-जाना करते थे।

छठ के प्रति उसकी निष्ठा तो उत्कर्ष पर तब देखने में आयी जब गाँव भर के लिए अपने इकलौते तालाब में धुरपद सिंह ने सभी व्रतियों को अर्घ्य देने पर पाबंदी लगा दी। तब उन्हें अर्घ्य देने के लिए काफी दूर चलकर बगल के गाँव में जाना पड़ा था। यह संकट एक गैर मजरुआ जमीन पर कब्जे को लेकर अक्ली बुआ से धुरपद के झगड़े तथा छठ के प्रति उसकी अगाध निष्ठा के कारण उत्पन्न हुआ था। अक्ली बुआ की जहाँ भैंसें और गायें बँधती थीं, उस पर धुरपद एक मकान बनाना चाहता था। मामला पंचायत से खिंचकर अदालत तक पहुँच गया।

दोनों ने अपनी-अपनी जीत के लिये छठी मैया से प्रार्थना की। अंततः जीत तो किसी एक की ही होनी थी और वह अक्ली बुआ की हुई। धुरपद इस व्रत के प्रति एकदम विरक्त और उदासीन हो चिड़चिड़ा उठा। पहले भी शायद उसकी दुर्भावना से माँगी कुछ और मुरादें नाकाम हुई थीं। उसे यह बड़ा अजीब लगा कि छठी मैया एक हिन्दू की न सुनकर एक मुसलमान की सुने जा रही है। फिर भला वह हिन्दू की देवी कहाँ हुई। उसने एक दुराग्रह बनाकर उपेक्षा-अभियान शुरू कर दिया।

अक्ली बुआ को उसकी इस हरकत से बहुत सदमा पहुँचा। उसे लगा कि धुरपद ने जान-बूझकर एक चुनौती उछाली है उसके नाम...और शायद इस चुनौती की आड़ में छठी मैया उसका इम्तहान भी ले रही है। अक्ली बुआ ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया और अपनी एक लंबी-चौड़ी जमीन देकर अगली छठ के आते-आते पहले से भी कहीं एक उम्दा तालाब खुदवा दिया। गाँव-जवार के लोग हैरत से देखते रह गये। अक्ली बुआ की इस जेहनियत का कोई सानी नहीं था। हिन्दू की अर्चना में एक मुसलमान की ऐसी शिरकत अभूतपूर्व थी। उस
तालाब का नाम ही पड़ गया-छठ तलैया।

नये तालाब के रूप में करारा जवाब पाकर धुरपद तिलमिला उठा और उसने गाँव में भेदभाव की खाई खोदनी शुरू कर दी। कुछ बिगड़ैल लड़कों के हवाले से वह मुसलमानों को परेशान करने वाली कारगुजारियाँ पेश करने लगा। लड़कियों से दिन दहाड़े अभद्र छेड़खानी करवाना, अजान के समय कीर्तन के बहाने शोर मचवाना, मस्जिद में आपत्तिजनक चीजें फेंकवा देना...और सबसे बर्बर हमला पेट पर करने के लिए उनके फसलों वाले हरे-भरे खेत में जानवर छुड़वा देना।
साल दो साल में ही तनाव और आजिजी इतनी बढ़ गयी कि मुसलमान अपने मजहबवाली घनी आबादी के गाँवों-शहरों में बसने के लिये यहाँ से अपनी जमीन-जोत औने-पौने बेचकर विस्थापित होते चले गये।

अक्ली बुआ बहुत लुटे-पिटे मन से बगल के शहर नवादा में जाकर बस गयी। हुलसी मम्मा को इनके बगैर गाँव बहुत दिनों तक उजाड़-वीरान और भुतहा प्रतीत होता रहा। जाती हुई अक्ली बुआ के तो वह गले लगकर फफक पड़ी थी, जैसे एक सगी बहन को कोई दुष्ट छीने लिये जा रहा हो। कई दिनों तक उसे खाना-पीना तक अच्छा न लगा। उसे बहुतों से पूछने पर भी आज तक यह समझ में न आया कि इनके रहने से आफत कहाँ टूटने वाली थी। बल्कि उसकी समझ में तो इनके बिना यह गाँव एक मुकम्मल गाँव लग ही नहीं रहा था। बीड़ी बनाने वाले इसहाक, कुदाल-फाल पिजाने वाले हनीफ, दवा-दारू करने वाले आरिफ, ईंट जोडनेवाले सोबराती, मारकीन बुनने वाले इलियास, कपड़े सीने वाले सुभान, चूड़ी पहनाने वाली सोगरी, गोदना गोदने वाली बिलकिसिया, मौर एवं पटवासी बनाने वाले अल्ताफ, बच्चों की नजर-गुजर की झाड़-फूँक करने वाले मौलवी इदरीश, गाँव में गैरहाजिर फल-सब्जी शहर से लाकर बेचने वाली कुंजडिन नुरसी आदि के बिना यह गाँव कैसे अपने को गाँव कहेगा...कैसे अपनी जरूरतें पूरेगा?

इनके गाँव से समूल उजड़ जाने के बाद सबको इस बात का पक्का यकीन था कि छठव्रत से अक्ली बुआ का नाता खत्म हो जायेगा। मगर पूरे गाँव-जवार को चकमा-सी देती हुई वह छठ के दो-तीन दिन पहले अपने पूरे इंतजाम के साथ गाँव में हाजिर हो गयी। दुश्मनी या नफरत के किसी भी खतरे की उसने परवाह न की। मम्मा तो जैसे खिल उठी। पता नहीं क्यों अक्ली बुआ की साझी और शिरकत के बिना छठ उसे अजीब-अजीब, खाली-खाली लगती थी।

इस तरह वह हर साल दो-तीन दिन की मोहलत निकालकर मुस्तफा के साथ गाँव नियमित आती रही। आते-जाते एक बार मम्मा को अक्ली बुआ ने एक खुशखबरी दी कि मुस्तफा एक बड़ा इम्तहान पास करके कलक्टर बन गया है। उसने उस साल गाजे-बाजे और पटाखे-फुलझड़ी के साथ मम्मा के घर से छठ का दौरा (बड़ा खाँची) निकलवाया। सब लोग आँखें फाड़-फाड़कर देखते रह गये। धुरपद एकदम जल भुनकर रह गया।

पिछले साल जब हुलसा बाबा मरे तो बुआ एक साधारण चिट्ठी में भागी-भागी आयी और मम्मा को अपनों से बढ़कर सहारा दिया.....खुद अपनी मिसाल देकर कि वह भी भरी जवानी से बेटे मुस्तफा पर आस टिकाये मसोमात जिंदगी जी रही है...पर किसी के आगे उसने हार नहीं मानी।

शोक से मम्मा इतनी टूट और ढह गयी थी कि छठ निवाहने का दम भी नहीं जुट पा रहा था। लग रहा था कि किसी से मजूरी पर ही इस बार छठ उठवानी होगी। इस संदिग्धावस्था में तब बुआ को भी लंबी दूरी तय करके गाँव आना गैरमुनासिब लग रहा था। उसके बेटे की पोस्टिंग राउरकेला में हो गयी थी, जहाँ से आना-जाना कोई आसान काम नहीं था। मगर जब समय आया तो वह भी मुस्तफा के साथ आ धमकी और मम्मा ने भी साहस जुटा लिया। तब बुआ ने बहुत बेचारगी से कहा था कि काश! उसे इजाजत और मान्यता होती तो मम्मा के इस पुश्तैनी दायित्व का भार उठाने में वह तनिक संकोच न करती। मम्मा का हृदय इस उद्गार पर भर आया था। बुआ ने फिर बताया था कि अगले साल वह अपने साथ बहू और पोते को भी लेकर आयेगी। छठ देखने के साथ ही मम्मा के दर्शन की उन्हें बहुत हसरत है। मम्मा मानो इस एहसास से धन्य-धन्य हो उठी थी कि कितना अथाह मान देती है यह परायी जाति-कुल-गोत्र और धर्म की अक्ली बुआ।

मम्मा का हृदय अचानक झनझना उठता है - वे लोग इतना खर्च-वर्च करके और अपने अरमानों को सजा कर गाँव पहुँचेंगे...ऐसे में वह न जा पायेगी वहाँ, तो सचमुच कितनी ठेस पहुँचेगी उन्हें। गाँववाले तो उन्हें चिढ़ायेंगे-छेड़ेंगे सो अलग। वह मानो एकदम उद्विग्न हो उठती है और मन-ही-मन सुमिरन करने लगती है कि हे छठी मैया, तुम्हीं कोई जुगत निकालो।

वह सुमरती रहती है और दिन खिसकते हुए केवल चार रह जाते हैं। उसकी उम्मीद क्रमशः मुरझाती चली जाती है। उसकी इसी मनःस्थिति में एक अपराह्न एक कार आकर रुकती है बँगले के बाहर। उसे खबर मिलती है कि उसमें सपरिवार मुस्तफा आया है। मम्मा का चेहरा सूरज देखकर सूरजमुखी की तरह खिल जाता है।
परी-सी खूबसूरत मुस्तफा की घरवाली मम्मा के पैर छूती है पर वह लक्ष्य करती है कि उसकी अपनी बहू मुँह सिकोड़कर भीतर चली गयी। अक्ली बुआ को सलाम तक न कहा। वह इसमें बुआ का नहीं, अपना अपमान समझती है। पंचानन भी घर पर ही है लेकिन वह भी इनके आने पर दिखावे का बात-विचार करना भी उचित नहीं समझ रहा। बुआ इसका कुछ बुरा नहीं मानती है, चूँकि वह जानती है कि छठ के प्रति उनके लगाव से वह बहुत चिढ़ा रहता है।

मम्मा बहू-बेटे से बिना पूछे गाँव जाने की तैयारी करने लगती है। अपने चंद कपड़ों को एक अदद झोले में ठूँस लेती है। पंचानन का जी चाहता है कि उनसे साफ साफ कह दे - एक मुसलमान के भरोसे वह अपनी माँ को नहीं जाने देगा। मगर उसे डर हो जाता है कि मम्मा ही इस पर घोर आपत्ति करके उसे कोसने लगेगी। फिर नाहक उसे छोटा-सा मुँह बनाकर रह जाना पड़ेगा...उसके हावभाव से तो यह जाहिर हो ही रहा है कि वह रुकेगी किसी कीमत पर नहीं।

मम्मा चलते समय पंचानन से अनुरोध करती है कि अगर संभव हो तो नन्हका को उसके साथ जाने दे। मगर वह स्कूल नागा होने का वास्ता देकर मना कर देता है। वह फिर उससे निवेदन करती है कि अगर हो सके तो एक दिन के लिए ही सही वह पारन (अंतिम अर्घ्य) के दिन चला आये।

वह एकदम उचाट शब्दों में कह देता है, "मेरे पास फालतू का समय नहीं है। मैं तुम्हें लाने भी नहीं जा पाऊँगा...तुम खुद ही आ जाना।"

मम्मा के दिल में एक कसक -सी समा जाती है। अपनी माँ के लिये इसके पास एक दिन का भी समय नहीं है। छठी मैया के प्रति आस्था न सही, माँ की भावना का ख्याल भी उसे क्या नहीं करना चाहिए? इतना भी मन में धक-विचार न हुआ कि जो बिना सहारे का दस कदम चल नहीं सकती वह अकेली कैसे आयेगी?

मम्मा को अक्ली बुआ कार में फूल की तरह सहेजकर बिठाती है। मुस्तफा प्लेयर पर शारदा सिन्हा के छठवाले मशहूर कैसेट लगा देता है...
डोमिन बेटी सूप ले ले ठाढ़ छै
उगहू सूरज देव अरग के बेर
हो पूजन केर बेर।
मालिन बेटी फूल ले ले ठाढ़ छै
उगहू सूरज देव अरग के बेर...।
निरधन कोढ़ी राहे-बाटे ठाढ़ छै
उगहू सूरज देव अरग के बेर...।
पान सुपारी पकवान ले ले ठाढ़ छै
उगहू सूरज देव अरग के बेर...।
मम्मा आत्म विभोर हो उठती है। रास्ता मानो झूले का आनन्द देता हुआ कट जाता है।
गाँववाले मम्मा के आगमन पर दंग रह जाते हैं। पास-पड़ोस की आत्मीय महिलाओं के चेहरों पर खुशी की एक लहर उमड़ आती है।

मम्मा बुआ के सहारे सारे विधि-विधान सकुशल निपटा लेती है। इस ढलती उम्र में भी तलैया के कन-कन (बहुत ठंडा) पानी में भींगकर सूर्योदय की प्रतीक्षा में आधा घंटा पहले से कर जोड़े वह ठाढ़ रहती है। मुस्तफा-बहू जितना छठी मैया की आराधना-विधि से प्रभावित होती है उतना ही ममता की जीती-जागती प्रतिमूर्ति मम्मा के व्यक्तित्व से भी।

सुबह का अर्घ्य संपन्न होने के बाद घर लौटने पर जब प्रसाद-वितरण का सिलसिला शुरू होता है तो मम्मा बार-बार घर की देहरी से निकलकर चश्माचढ़ी अपनी मिंचमिंची आँखों से रास्ता निहारने लगती है - हो सकता है पसीजकर उसका मन रखने के लिए पंचानन आ जाये।

अक्ली बुआ ताड़ लेती है मम्मा की बेचैनी। वह जानती है कि पंचानन किसी भी कीमत पर नहीं आने वाला। वह उसे सलाह देती है कि किसी आदमी को आज ही शाम की गाड़ी से भेजकर वहाँ प्रसाद पहुँचवा दे। अपना ही कोखजाया है...कैसे छठी मैया के आशीर्वाद से विमुख रहेगा। अपने साथ ले जाने का तो सवाल नहीं है, चूँकि मम्मा पहले ही बुआ को बता चुकी है कि अब वह शहर नहीं लौटना चाहती। उसकी इच्छा अपने गाँव में पति की देहरी पर ही दम तोडने की है। यहाँ अपने जाने-पहचाने लोगों का कंधा मिलेगा अर्थी में। खबर मिलने से पंचानन भी मुखाग्नि अर्पण करने की औपचारिकता निभाने जरूर ही आ जायेगा।

बुआ के परामर्शानुसार शाम की गाड़ी से प्रचुर मात्रा में ठेकुए और विभिन्न देहाती फल देकर एक आदमी पठा दिया जाता है।

अगले दिन शाम को बुआ प्रस्थान करने वाली है। मम्मा का मन नहीं भरता...लगता है दो-चार दिन और रोक ले इन्हें। पर मुस्तफा एक बड़ा अफसर है, ज्यादा नागा नहीं कर सकता। मम्मा बहू और मुन्नों के लिये शहर से नये कपड़े मँगवाती है। बुआ की आँखें भर आती हैं मम्मा की इस खातिरदारी पर। एक मम्मा है कि उसे अजीज मेहमानों की तरह सत्कार दे रही है, जबकि इसी गाँव के कुछ लोगों ने जानी दुश्मन की तरह उन्हें खदेड़ दिया। उसे लगता है कि इस बूढ़ी से जरूर उसके पिछले जन्मों का कोई रिश्ता है।

मम्मा भरे गले से कहती है, "पता नहीं अगली छठ तक तुम सबसे मिलने के लिए रह पाऊँगी भी या नहीं...इसलिये अब तक कोई भूल या कोई कसर रह गयी हो तो मन में न लाना...माफ कर देना।"

बुआ की आँखें तो बह ही रही थीं, मुस्तफा का गला भी भर आता है, "ऐसा न कहो मम्मा, हम तो तुम्हारे कर्जदार हो गये हैं।"

ड्राइवर कार बढ़ाना ही चाहता है कि तब ही प्रसाद लेकर गया हुआ आदमी वापस आ जाता है और विह्वल नेत्रों से ताकते मम्मा को बतलाता है,
"पंचानन ने प्रसाद लेने से इंकार कर दिया और कहा - जब वह खुद नहीं आयी तो इसे क्यों भिजवाया? ले जाओ...इसे यहाँ खाने वाला कोई नहीं है...वहीं बँटवा देना।"
मम्मा को लगता है कि गश खाकर गिर पड़ेगी...यह छठी मैया के प्रसाद का नहीं सरासर उसका निरादर है। उसकी आँखों से टप-टप आँसू चू पड़ते हैं। मन-ही-मन वह असीसने लगती है कि हे छठी मैया, हमरे नादान बेटे को माफ कर देना।
मुस्तफा को मम्मा की हालत पर काफी तरस हो आता है। वह झिझक के साथ एक प्रस्ताव रखता है, 'मम्मा, अगर बुरा न लगे तो क्या तुम मेरे साथ रहने के लिए चल सकती हो? हम तुम्हारे नेम-धरम में तनिक आँच नहीं आने देंगे। एक हिन्दू नौकर रख लेंगे जो तुम्हारी सेवा-शुश्रुषा और खाना-पीना करवा दिया करेगा।"

मम्मा पलभर के लिये असमंजस में पड़ जाती है कि सही मायने में मुस्तफा और पंचानन में अधिक सगा वह किसे माने? मुस्तफा को वह अतिशय गर्व और वात्सल्य भरे नेत्रों से निहारती हुई भाव-विह्वल आँसुओं के कुछ ज्यादा ही तेज
हो गये प्रवाह के मध्य कहती है, "भगवान तुम्हें सदा सुखी रखे बेटा। अगर तुम सचमुच ही मेरे लिये कुछ करना चाहते हो तो मेरे हाड़-माँस की चुटकी भर राख को तुम खुद के बनाए हुए छठ-तलैया में प्रवाहित होने का पुण्य दे देना। पंचानन या अन्य किसी को शायद यह करना न सुहाये।"

मम्मा की इस आखिरी ख्वाहिश को लेकर कार आगे बढ़ जाती है। उस पर अब एक गुत्थी भी सवार हो जाती है। आखिर मम्मा ने अस्थि-विसर्जन के लिये गंगा मैया की जगह एक मुसलमान द्वारा खुदवाये तलैया को ही क्यों चुना?

१ सितंबर २०१७

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