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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है भारत से राजकुमार राकेश की कहानी— 'शिमला-क्लब की एक शाम'


शिमला क्लब की वह एक यादगार शाम थी। शराब बाँटे जाने का सिलसिला अभी शुरू नहीं हुआ था। तय यह किया गया था कि जब दीवार पर टँगी घड़ी की सुइयाँ डंके की चोट पर बारह बजा देंगी, पीने-पिलाने का काम तभी शुरू होगा। चाय-कॉफी के दौर खूब चल रहे थे। इसी बीच इस क्लब के अनुभवी व महत्वपूर्ण व्यक्तियों के भाषण तकरीबन आठ बजे से ही शुरू हो गए थे। मंच-संचालन करने वाले व्यक्ति ने आरंभ में ही यह घोषणा कर दी थी, कि आज का यह समय किसी एक सदी के अवसान का ही नहीं, बल्कि नई सहस्राब्दी के उदय का भी समय है। इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि इतने महत्वपूर्ण समय में तमाम सदस्य गण ख़ासे उत्तेजित और उत्साहित हों, जैसा कि ये थे ही। जैसे उनके भीतर यह भावना घर कर गई हो कि आज की रात जब घड़ी की सुइयाँ बारह बजा देंगी तो मानवीय इतिहास की गति कोई असंभावित पलटी खा लेगी।

लगभग ग्यारह बजे तक सब सामान्य गति से चलता रहा था। लेकिन जैसे ही आया सिंह अरोड़ा बोलने लगे, तो इतिहास का क्रम उलट दिशा में बहने लगा। प्रत्येक व्यक्ति मंत्रमुग्ध-सा उन्हें देखता और सुनता चला गया। इक्कीसवीं शताब्दी के अवसान के उन क्षणों शिमला क्लब की हवा में पसर आई नीरवता में दिया जाने वाला वह भाषण सरदार आया सिंह अरोडा ने किसी तैयारी के बाद दिया हो, ऐसा नहीं लगता।

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