आज सिरहानेउपन्यासउपहारकहानियाँकला दीर्घाकविताएँगौरवगाथापुराने अंक
नगरनामारचना प्रसंगघर–परिवारदो पलनाटकपरिक्रमा पर्वप्रकृतिपर्यटन
प्रेरक प्रसंगप्रौद्योगिकी फुलवारीरसोई लेखक विज्ञान वार्ता विशेषांकहिंदी लिंक
साहित्य संगमसंस्मरण साहित्य समाचार साहित्यिक निबंधस्वास्थ्य
हास्य व्यंग्य

 

कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है भारत से
शिबन कृष्ण रैणा की कहानी—'मुलाक़ात'


हमारे घर की बिल्कुल सामने वाली सड़क के कोने वाला मकान बहुत दिनों से खाली पड़ा रहा। मकान मालिक संचेती जी की चार वर्ष पूर्व नौकरी के सिलसिले में कहीं दूसरी जगह पर बदली हुई थी और तभी से उनका मकान एक अच्छा किराएदार न मिलने के कारण लगभग दो वर्षों तक खाली पड़ा रहा। संचेती जी चाहते थे कि एक ऐसे किरायेदार को मकान दिया जाए जो एकदम भला हो, जिसकी फैमिली में ज़्यादा सदस्य न हों और जो सुरुचि संपन्न हो ताकि मकान का बढ़िया रख-रखाव हो सके। लंबी प्रतीक्षा के बाद आख़िरकार एक ऐसा परिवार उन्हें मिल ही गया जो उनकी अपेक्षाओं की कसौटी पर फिट बैठ गया और उन्होंने उनको अपना मकान किराए पर दे दिया। मकान सँभालते वक्त संचेती जी मुझे बुला लाए और उस परिवार से मिलवाया। शायद यह सोचकर कि पड़ौसी होने के नाते मैं उनकी कुछ प्रारंभिक कठिनाइयों को दूर कर सकूँ।

आगंतुक पड़ोसी मुझे निहायत ही शरीफ़ किस्म के व्यक्ति लगे। पति और पत्नी, बस। यही उनका परिवार था। अधेड़ आयु वाली इस दंपति ने अकेले दम कुछ ही महीनों में संचेती जी के मकान की काया पलट कर दी। बगीचे में सुंदर घास लगवाई, रंग-बिरंगी क्यारियाँ, क्रोटन, गुलाब, बोनसाई आदि से सुसज्जित गमले. . .। खिड़कियों और दरवाज़ों पर सफ़ेद रंग. . .। दो-चार विदेशी पेंटिंग्स बरामदे में टँगवाई तथा पूरे मकान को हल्के गुलाबी रंग से पुतवाया। देखते ही देखते संचेती जी के मकान ने कालोनी में अपनी एक अलग ही पहचान बना ली।

पृष्ठ : 1. 2. 3

आगे-

 

इस रचना पर अपनी प्रतिक्रिया लिखें - दूसरों की प्रतिक्रिया पढ़ें

Click here to send this site to a friend!

आज सिरहानेउपन्यासउपहारकहानियाँकला दीर्घाकविताएँगौरवगाथापुराने अंकनगरनामारचना प्रसंग
घर–परिवार दो पलनाटक परिक्रमापर्व–परिचय प्रकृतिपर्यटन प्रेरक प्रसंगप्रौद्योगिकी फुलवारीरसोई लेखक
विज्ञान वार्ताविशेषांकहिंदी लिंकसाहित्य संगमसंस्मरणसाहित्य समाचारसाहित्यिक निबंधस्वास्थ्य
हास्य व्यंग्य

© सर्वाधिका सुरक्षित
"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9–16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।