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आज सिरहाने

तारों की चूनर (हाइकु संग्रह)

रचनाकार
डॉ. भावना कुँवर

*

चित्रांकन
बी. लाल

*

प्रकाशक
शोभना प्रकाशन,
१२३-अ, सुंदर अपार्टमेन्ट, जी.एच.१०,
नई दिल्ली -११००८७

*

पृष्ठ - १६०

*

मूल्य : १५ डॉलर

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प्राप्ति-स्थल
भारतीय साहित्य संग्रह

वेब पर दुनिया के हर कोने में

हिंदी साहित्य आज नित्य नवीन विधाओं के क्षेत्र में पदार्पण कर रहा है- हाइकु कविताएँ भी उनमें से एक हैं। जापान जैसे छोटे से किन्तु विकसित और नित्य प्रगतिशील देश में जन्म लेकर हाइकु ने विश्व पटल पर अपनी पहचान बनाई है। हमारे आज के आपाधापी भरे व्यस्त जीवन में इसका लघु आकार जहाँ विशेष महत्व रखता है, वहीं प्रकृति से जुड़ी इसकी पृष्ठभूमि संवेदनशील मन को संबल प्रदान करती है।

हिंदी में हाइकु कविताओं को प्रतिष्ठित करने एवं गति देने का श्रेय प्रो. सत्यभूषण वर्मा जी को दिया जाता है। फिर डॉ. जगदीश व्योम, कमलेश भट्ट और इसी शृंखला में डॉ. भावना कुँवर का नाम तेज़ी से उभर के सामने आया है। डॉ. भावना कुँवर का हाइकु संग्रह 'तारों की चूनर' किसी प्रवासी भारतीय रचनाकार का सर्वप्रथम हिंदी हाइकु संग्रह है और इसलिए साहित्य जगत में अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज कराता है। लेकिन इसकी उपादेयता केवल इस गिनती तक ही नहीं है, बल्कि भाव और शिल्प की जो विशिष्ट प्रस्तुति इस छोटे से काव्य-संकलन में मिलती है वह इसे अनूठा-अनछुआ बनाती है।

इस पुस्तक को पढ़कर लगता है की इतने थोड़े से शब्दों में अनुभव का इतना वृहत् फलक प्रस्तुत कर सकना वास्तव में आज के लेखकों के लिए एक चुनौती है। सूक्ष्म मनःस्थितियों से लेकर स्थूल प्रकृति वर्णन तक और अनचीन्हीं कल्पनाओं से लेकर समसामयिक समस्याओं तक, कवयित्री ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को इसमें समेटा है। मूल रूप से लेखिका एक भावप्रवण कवयित्री हैं। पुस्तक की कई हाइकु कविताओं को पढ़ते हुए लगता है जैसे हम छायावाद के भावुक रोमानियत की दुनिया में पहुँच गए हैं -
सुबक पड़ी
कैसी थी वो निष्ठुर
विदा की घड़ी।

दूसरी ओर यथार्थवादी दृष्टिकोण से भी कवयित्री ने मानव मात्र के संघर्ष, शोषकों के दमन और प्रशासन के शिकंजों की जकड़ को स्वर दिया है-
नन्हीं तितली
बुरी फँसी जाल में
नोच ली गई।

विदेश में रहने वाले अप्रवासी भारतीयों में अपने देश के लिए एक याद का एक कोना सदा हरा रहता है, भावना जी भी अपने हृदय की गहराई से इसे महसूस करती हैं -
गया विदेश
होगी कोई उसकी
मजबूरी ही।

इस संग्रह के परिप्रेक्ष्य में जो बात मेरे मन को सबसे अधिक प्रभावित करती है, वह है इसकी सहजता। कवयित्री ने सायास कुछ भी नहीं कहा है, जो कहा है -भावों के प्रवाह में निकला है और उस प्रवाह को छिपाने के लिए या गूढ़ बनाकर प्रस्तुत करने के लिए भावना जी ने किसी कृत्रिमता की आड़ नहीं ली है। यहाँ न किसी दर्शन की गूढ़ता है, न अभिजात्य का आवरण-जो कहा है सीधे सपाट शब्दों में कहा है। संभवतः यही कारण है कि उनकी ये छोटी-छोटी कविताएँ भी हृदय की गहरी से गहरी परतों को खोलती चलती हैं और पाठक के अन्दर दबा हुआ कवि-मन मुखर हो उठाता है। लेकिन भावना जी का कवयित्री मन फिर भी संतुष्ट नहीं है। उनमें कुछ और कहने की छटपटाहट है-
कहना चाहूँ
है छटपटाहट
कह ना पाऊँ।

मैं समझती हूँ ये छटपटाहट बनी ही रहनी चाहिए क्योंकि यही साहित्यकार का पाथेय बनती है।
'अज्ञेय' जी ने बहुत पहले कहा था -"शब्द ब्रह्म का रूप है इसे नष्ट मत करो। कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक कहने की कला सीखो।" हाइकु कविताएँ इन विचारों को अक्षरशः सत्य सिद्ध करती हैं।

शिल्प की दृष्टि से हाइकु क्रमशः पाँच, सात और पाँच वर्णों में लिखा जाने वाला लघु छंद है, परन्तु कवयित्री ने इन लघु छंदों में भी रस, बिम्ब और अलंकारों के अस्तित्व को न केवल बनाए रखा है बल्कि विशिष्ट उपमान योजना और प्रतीकात्मक बिम्बों द्बारा उनके सौन्दर्य को उभारा है। 'गुलमोहर' एक ऐसा ही प्रयोग है -
भटका मन
गुलमोहर वन
बन हिरन।

प्रकृति वर्णन में मानवीकरण का प्रयोग प्रचुर मात्रा में हुआ है। भावना जी की भाषा में बौद्धिकता के साथ काव्यात्मक कमनीयता और लय का जो मेल मिलता है, उसका आज के नए लेखकों में प्रायः अभाव है।
पुस्तक की एक और विशेषता है इसकी चित्र योजना। मुखपृष्ठ पर स्वयं भावना जी का चित्र और अन्दर प्रत्येक हाइकु के साथ प्रख्यात चित्रकार बी.लाल के चित्र अपने आप में एक नया प्रयोग है। चित्र योजना में कहीं प्रतीकात्मकता है, जिसमें आधुनिक काल की आड़ी-तिरछी रेखाओं का नियोजन किया गया है, तो कहीं विषयानुसार भावों को अक्षरशः चित्र में उतार दिया गया है।

वस्तुतः 'तारों की चूनर' नामक यह हाइकु संकलन अपने नवीन कलात्मक कलेवर और वैचारिक ताने -बाने के साथ ऐसी सूक्ष्म संवेदनाओं से हमारा साक्षात्कार कराता है जिनसे कई बार हम स्वयं भी अनछुए रह जाते हैं।

डॉ.ऋतु पल्लवी
७ जुलाई २००८

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