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हास्य व्यंग्य

श्मशान घाट का इंडेक्स यमराज के हवाले
अविनाश वाचस्पति


ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने २४०० लोगों पर एक सर्वेक्षण किया और उसके नतीजों का खुलासा करके वही बातें दोहराई हैं जो हमारे बुजुर्ग पहले ही बतला गए हैं कि दूध का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है और रोगों को मानव शरीर के पास फटकने भी नहीं देता है।

परन्तु आज शहरों में खालिस दूध नहीं मिलता है। दूध और इनसे बने उत्पाद इतने ज़हरीले हो चुके हैं कि साँपों को भी शर्म आने लगी है कि हम से अधिक ज़हरीले लोग, नागफनी के काँटे क्या हैं, उनसे अधिक कंटीले लोग। वो लोग जो सिंथेटिक दूध का उत्पादन और व्यापार कर रहे हैं। वो लोग जो जानवरों की हड्डियों से देशी घी बना कर लाभ कमा रहे हैं। उनसे अधिक काँटे इनके सिवाय पब्लिक को और कौन चुभो रहा है?

इनका सेवन करके जब इंसान रोगी हो जाता है तो जो डॉक्टर इलाज के लिए मिलता है, वो फर्ज़ी डिग्रीधारी होता है। दवाई जो ख़रीद कर रोग से बचाव के लिए खानी होती है वो नकली होती है। कब तक और कहाँ तक बचेगा इंसान तू। बचने का उपक्रम मत कर।

उनसे बच गया तो इनसे कैसे बचेगा जो ब्लू लाईन ड्राइवरों का रूप धर कर दिल्ली की धरा पर उतर आए हैं। सड़कों पर यमराज ने और उनके दूतों ने उतर कर मनमानी मचा रखी है। जो बस यात्रियों को विवश, पैदल को खून से लथपथ, कार वालों को शरीर से बेकार, साईकिल वालों को चक्करघिन्नी की तरह घुमा रहे हैं और पब्लिक से पिटने पर भी अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आ रहे हैं।

मौत का खूनी खेल सड़कों पर बदस्तूर जारी रहा तो लोग बीमारी से नहीं मरेंगे, बेरोज़गार ढूँढे नहीं मिलेंगे, बुढ़ापा नहीं सताएगा? आज के बच्चे कल के नेता जिन्हें ये ढूँढ-ढूँढ कर, पैदल या वैन में टक्कर मार-मार कर श्मशान पहुँचा रहे हैं। सबका यही हश्र होना है।

इनसे आजिज़ आकर अखबार वाले मंगल को अमंगलकारी मानने को मजबूर होकर कह रहे हैं कि गति और क्रोध के ब्रेक फेल हो चुके हैं। यही आज की भयावह सच्चाई है। पब्लिक के दिल पत्थर के हो चुके हैं और दिमाग कुंद। वही पब्लिक जिसे अपनी और अपने परिवार की जान से अधिक किसी की परवाह नहीं रही।

एक ज़िंदा हिन्दू आदमी जितना नुकसान अपने समूचे जीवन काल में पर्यावरण को नहीं पहुँचा पाता, उससे अधिक नुकसान तो वो मरने के बाद पहुँचा देता है क्योंकि हिंदू रीति रिवाज के तहत जब उसे जलाया जाता तो जलाने में व्यर्थ हुई लकड़ी और जलने पर बनने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड गैस - दोनों ही पर्यावरण के घोर शत्रु हैं। जो खाक बचती है वो नदियों में बहा दी जाती है - लिहाज़ा तीनों ही स्थितियाँ खतरनाक हैं।

अब तो खाक होने के लिए भी कई विकल्पों के दरवाज़े खुले हुए हैं। जबकि नकली लकड़ी की खोज अभी तक वैज्ञानिक नहीं कर पाए हैं पर असली लकड़ी में मिलाने के लिए जानवरों की हडि्डयों वाला देशी घी देश में बड़े पैमाने पर बनाया जा रहा है। इन दोनों को ही खरीदने पर असली नोट लगेंगे। मन की आँखें खोल रे बंदे। पर्यावरण को और ज़हरीला मत बना।

अपने नेत्रदान करता जा, किसी की आँखों का उजाला बन और लेटेस्ट टेक्नोलॉजी अपनाकर कम्प्रेस्ड नैचुरल गैस (सीएनजी) से अपना अंतिम सफ़र पूरा कर। सीएनजी जीवन के इस हाईवे पर अधिक माईलेज देती है। इसी से सच्ची मुक्ति मिलेगी। कम मात्रा और खर्चे में तुझे सुपुर्दे खाक कर देगी। तेरा समय तो पूरा हो चुका है। तेरा मेला पीछे छूटा राही, चल अकेला। हज़ारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते।

मैं इतना तो जानता हूँ कि जीते जी हम जल पाना चाहते हैं और मरने के बाद जल जाना चाहते हैं। हवा तो हमें जीते जी भी चाहिए और मरने पर भी, हम तभी जलेंगे जब खूब सारी ऑक्सीजन सींच लेंगे।

अब दाह संस्कार के लिए भी जगह कम पड़ रही है। सूत्रों के मुताबिक यह सब चढ़ते पारे का कमाल है जिसने मशान घाट को शवों के जंगल में तब्दील कर दिया है। मरने में चौगुनी प्रगति जारी है। मशान घाट का इंडेक्स तेजड़ियों की चपेट में है। यह तो राजधानी का हाल है। वैसे भी राजधानी के मसले ही सुर्खियों में रहते हैं। अब वो भारत की राजधानी हो या उत्तर प्रदेश की। स्थितियाँ परिस्थितियाँ कमोवेश एक जैसी ही हैं।

५ मई २००८

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