हास्य व्यंग्य

अफ़सर का कुत्ता
--संदीप सक्सेना


एक होता है अफ़सर.. तो एक होता है उसका कुत्ता। अफ़सर अफ़सर होता है, तो कुत्ता कुत्ता होता है। अब अफ़सर को इंसान की उत्पाद होने के नाते ग्रेट होने की एक पायदान ऊँची जगह पर बैठाया जा सकता है। पर जनाब, अफ़सर का कुत्ता भी कहीं से कम नहीं बैठता है अपने मालिक से। उसकी अपनी खूबियाँ हैं, एक से एक स्पेशल और सुपर स्पेशल।

अब मसलन एक यही कि कुत्ता होने के बावजूद एक अफ़सरी कुत्ते होने के सारे गुणों को रखता व धारण करता है। सलीके व करीने से उठना-बैठना, रोना-गाना, सुर में बोलना.. आई मीन भौंकना और सभ्य ढंग से बिस्कुट चबाना वगैरह.. वगैरह। कुत्ता होते हुए भी अपने को अन्य कुत्तों से काफी अलग मेनटेन करता है, ठीक वैसे ही जैसे कि एक अफ़सर अपने को अन्य आम इनसानों से। सो जनाब, दोनों ही ग्रेट हैं, इससे आप को एक राय होना ही पड़ेगा। दोपाया अफ़सर चौपाए कुत्ते को पालता है, क्योंकि यह उसकी एक पारंपरिक मजबूरी होती है। अफ़सरियत के तकाज़े को पूरा करने की ख़ातिर वह उसके गले में पट्टा बाँधता है, और चाहते न चाहते हुए भी रोज़ाना उसे चेन पकड़ कर घुमाने ले जाता है तथा रास्ते भर थोड़ी-थोड़ी दूर पर अंग्रेज़ी में डाँटने की महती आवश्यकता को पूरा करता है।

अंग्रेज़ी नामों के बोझ को ढोने की परंपरा को निभाने की जंज़ीरों में कैद अफ़सर उसको एक बेहद समकालीन सा नाम देकर पुत्रवत स्नेह देने की परंपरा को निभाता है। उसकी ज़रा सी छींक, दो-चार खाँसी व जुकाम तथा एक वक्त का खाना न खाने की बात यकीनन ही उनकी दिन-रात का चैन व नींद उड़ा देगी, यह पक्का मान कर चलिए। अब कुत्ते को देखिए कि उसे अपने मालिक की इमेज का मान-सम्मान रखने की ख़ातिर चरित्र से कितना रहस्यवादी होना पड़ता है। आम सड़क छाप कुत्तों की लीक से हटकर उसे चलना होता है। जो नहीं होता है वह है, और जो है वह नहीं हो सकता है, इस जीवन-दर्शन को अपनाते हुए उसे व्यवहार करना पडता है। ऐसा करना उसकी मजबूरी है और स्वामिभक्ति की महत्त्वपूर्ण डिमांड भी। आखिर एक डिप्लोमेट अफ़सर का कुत्ता होने के नाते कुछ तो कीमत चुकाना ही चुकाना है। अफ़सर की अहमियत यकीनन होती है, क्योंकि वह एक अफ़सर जो होता है। सर-सर की ध्वनि की ऑक्सीजन उसके स्वास्थ्य के लिए अपरिहार्य-सी होती है, और कुल मिलाकर उसकी शख्सियत को पहचान का एक जामा पहनाती है। पर, उसके कुत्ते की अहमियत के पीछे भी बहुत कुछ है, और काफी-कुछ ख़ास भी है। कुत्ता तो वैसे बहुत लोग पाल लेते हैं, तमाम ऐरे-गैरे भी इसे अपने पास धर लेते हैं। पर अफ़सर का कुत्ता.. भई अब आप ही समझ लो, क्या कुछ ख़ास-ख़ास है। अक्सर यह कन्फ्यूजन हो जाता है कि अफ़सर ग्रेट कि उसका कुत्ता ग्रेट? किसको किसकी वजह से ग्रेटनेस का तोहफ़ा मिला हुआ है? यह देखने में आया है और आता भी है कि ऐसे तमाम अफ़सर वह कुछ इज़्ज़त, मान-सम्मान पा जाते हैं, जो कि एक बिना कुत्ते के अफ़सर को नहीं मिल पाता है। साहब के कुत्ते को चेन पकड़कर घुमाना, उसको महंगे-महंगे बिस्कुट खिलाना, उसके तरल-पदार्थ से अपने वस्त्रों को भिगवाने का परम सौभाग्य पाना तथा उसकी भौंक व घुर्राहट को बेहद खुशी-खुशी अपना अहोभाग्य व प्रसाद समझकर स्वीकार कर लेना वगैरा... वगैरा, क्या यह अफ़सर भक्ति बिना कुत्ते के अफ़सर को मिल सकती है।

प्राय: यह देखा जाता है कि जब कहीं किसी जगह पर एक नया अफ़सर आता है तो उस पर विचार करने, उसे पढ़कर उसके क़रीब तक पहुँचने के महाअभियान में कुत्ते का पला होना या न होना एक बेहद महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। अगर नए साहब के यहाँ कुत्ता है तो तमाम बांछें खिल जाती हैं, स्कोप सुपरस्कोप बन कर सामने आ जाता है, और कुल मिलाकर संभावनाओं का मुख सुरसा के मुख का रूप ले लेता है खुलने के मामले में। दुनियादारी, व्यावहारिकता तथा भक्ति-भाव वगैरा की कला अपना रंग दिखाना प्रारंभ कर देती है। वह कुत्ता-विशेष एक ख़ास दर्जा पा जाता है और अनायास ही बहुतों की आँखों का तारा बन जाता है। उसके शुभचिंतकों व हितैषियों की संख्या में यकायक ही बढोत्तरी हो जाती है।

तमाम दोपायों की आँखों में उस चौपाए प्राणि-विशेष के लिए प्रेम व स्नेह के रंग छलकने लग पड़ते हैं, कुत्ता प्रेम का पारा अनायास ही काफी चढ़ जाता है। ऐसे में इस प्राणि के तो भाग्य ही जाग पड़ते हैं। बीमार पड़ने पर उसकी तीमारदारी, दवा पिलवाने व इंजेक्शन लगवाने ले जाने के मामले में दोपायों का एक ख़ासा अमला उसके पीछे होता है, और वह शान से अपनी पूँछ ऊँची कर इतरा सकता है क्योंकि ऐसा करने के मामले में उसके पास सॉलिड प्वाइंट जो होते हैं। तीमारदारों व खैर ख्वाहों की एक लंबी कतार देखी जा सकती है इनके पीछे, बिना किसी ख़ास प्रयासों के। यह देख सडक के बेचारे अभागे कुत्तों के दिल पर क्या गुज़रती होगी। अगले जनम में ही सही, अपने दिन ऐसे ही बहुरने की न जाने क्या-क्या और कैसी आस लगाते होंगे। तमाम प्रमोशंस वगैरा अफ़सर के मूड से भी कहीं अधिक उसके कुत्ते के मूड से प्रभावित होती हैं, इस बात को तो अब साहब का कुत्ता भी भली-भांति समझने लगा है, शायद इसीलिए उसने भी अपने भाव बढ़ा दिए हैं और उसके व्यवहार में एक अफसरी-बास-सी आती है।

बहरहाल, कुछ भी हो, होते तो यह भी अफ़सर के कुत्ते ही हैं। सो जनाब, यह कह सकते हैं कि आम कुत्ते इन ख़ास अफ़सरी कुत्तों की पराई ही सही पर चिकनी-चुपडी को देखकर आहें भरते होंगे, मन का मलाल ज़ोर मारता होगा कि हाय... हम क्यों नहीं हुए। और आखिर ऐसा हो भी क्यों न, बात अफसरी-कुत्ते की जो है।

१ सितंबर २००८