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संस्कृति


भगवा का महत्व
पूर्णिमा वर्मन


भगवा (केसरिया) रंग हिंदू धर्म, संस्कृति और आध्यात्मिकता में त्याग, बलिदान, पवित्रता और निस्वार्थ सेवा का सर्वोच्च प्रतीक है। यह अग्नि की ज्वालाओं और उगते सूर्य का रंग है, जो ज्ञान, वीरता और मोह-माया से मुक्ति का बोध कराता है। प्राचीन ऋषियों से लेकर योद्धाओं तक, यह रंग भारतीय संस्कृति में श्रद्धा और प्रेरणा का शाश्वत स्रोत रहा है। भारतीय संस्कृति का अनादि प्रतीक परम पूज्यनीय आदरणीय भगवा रंग इस संस्कृति के भौतिक, मानसिक, आध्यात्मिक, तथा बौद्धिक दृष्टिकोणों की पराकाष्ठा के कारण ही पूज्यनीय है। भारतीयों द्वारा अन्य रंगों में केवल भगवा को चुनने के कारण अनेक हैं।

आध्यात्मिक त्याग
संन्यासी और साधु भगवा वस्त्र पहनकर सांसारिक सुखों के परित्याग और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का संदेश देते हैं। भारतीय संस्कृति में जन्मे सभी पंथों सनातनी, बौद्ध, सिख सभी ने भगवा को परम पवित्र रूप में स्वीकार्य किया। नन्द, गुरुगोबिन्द सिंह महात्मा बुद्ध, आदि गुरु शंकराचार्य से लेकर सभी धर्मों के भिक्षुकों ने अपने जीवन में इस रंग को स्थान दिया।

बलिदान और वीरता
यह रंग शौर्य और साहस का प्रतीक है। छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप जैसे वीरों ने इसे अपने ध्वज में स्थान देकर धर्म और स्वाभिमान की रक्षा का संदेश दिया। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, सम्राट विक्रमादित्य, सम्राट अशोक जैसे अनेक ऐतिहासिक व्यक्तियों के ध्वज भगवा थे। महाभारत से रामायण; रामायण से आज तक भारतीयों ने भगवा को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार्य किया। इस प्रकार प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक भगवा रंग भारतीय अस्मिता का प्रतीक बना रहा है।

ज्ञान और पवित्रता
यह मंदिरों और आश्रमों में, जो हिंदू धर्म की आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र हैं, यह रंग आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक मानकर पताका के रूप में फहराया जाता है। अग्नि की भाँति, यह रंग अज्ञानता को जलाकर ज्ञान और शुद्धि का संचार करता है। यज्ञ में अग्निदेव को आहुति देकर ही अनुष्ठान संपन्न सम्पन्न किये जाते है, यह परम पवित्र अग्नि भी भगवा आभा लिए होती है। अग्नि का यह भगवा रंग ज्ञान स्वरूप है, जो अनुष्ठान के स्वीकार कर, अंतरात्मा को तृप्त कर देता है। चक्षुओं में एक अभूतपूर्व आनन्द व प्रेरणा का अनुभव कराता है।

सांस्कृतिक पहचान
भारतीय ध्वज (तिरंगे) की सबसे ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग सर्वोच्च बलिदान और भारतीयता का प्रतीक है। भारतीय परंपरा सिंदूर जो भगवा आभा लिये होता है, वैवाहिक और धार्मिक महत्व रखता है। यह कथा अत्यंत प्रचलित है कि एक बार हनुमान जी ने सीता से पूछा कि आप सिंदूर क्यों लगाती हैं। सीता ने कहा कि यह श्री राम के प्रिय है इसीलिये। इसे सुनकर हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया। कहते हैं कि तभी से भगवान हनुमान को भी सिंदूर अर्पित करने की परंपरा प्रचलित है, जो भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एएस) ने भी भगवा ध्वज को गुरु के रूप में स्वीकार किया है, जो राष्ट्र-सेवा और समर्पण का प्रतीक है।

ऊर्जा और सकारात्मकता
यह रंग ऊर्जा और उत्साह स्रोत माना जाता है। सूर्य को भारतीय परंपरा में गुरु का स्थान प्राप्त है। उसकी प्रथम किरण जीवन में नई स्फूर्ति भरती है। यह किरण भी भगवा है। सूर्य की उपासना का प्रमुख कारण यह भगवा प्रकाश ही है जो पूरे विश्व में ऊर्जा का संचार करता है। विश्व की प्राचीन सभ्यताओं—जैसे मिश्र, माया और सिंधु घाटी—में भी सूर्य-पूजा के प्रमाण मिलते हैं। यह रंग अंधकार को दूर कर प्रकाश और सकारात्मकता का संचार करता है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी सूर्य से प्राप्त ऊर्जा (जैसे विटामिन डी) जीवन के लिए आवश्यक है। तम अर्थात अंधकार को हरने वाली प्रकाश किरण भगवा ही होती है जो जीवन में नयी स्फूर्ति व उत्साह को जन्म देती है। भगवान द्वारा दी गयी प्रथम किरण होने के कारण यह किरण भगवा कहलायी। आधुनिक समय में भगवा किरण वही स्फूर्ति व उत्साह विटामिन डी के रूप में देती है इसी कारण भारत अर्थात प्रकाश की खोज में लगे रहने वाले भारतीय भगवा को परम पवित मानते हैं।

रंगों का विज्ञान
डॉ. चंद्रशेखर के अनुसार, सात मूल रंग हमारे शरीर के सात चक्रों से जुड़े होते हैं—लाल, केसरिया/नारंगी, पीला, हरा, नीला, जामुनी (इंडिगो) और बैंगनी। प्रत्येक रंग की अलग तरंगदैर्ध्य (वेवलैंथ) होती हैं। जब हम उन्हें देखते हैं या उन पर ध्यान केंद्रित करते हैं तब वे हमारे मन पर अलग-अलग प्रभाव डालती हैं। केसरिया या भगवा रंग स्वाधिष्ठान चक्र का रंग माना गया है। स्वास्थ्य की दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण चक्र है। यह बृहदान्त्र, मूत्राशय, गुर्दे और प्रजनन तंत्र आदि से संबन्धित है। वास्तव में, यह रंग उस आध्यात्मिक चक्र से जुड़ा है, जिसमें अद्भुत उपचार क्षमता (हीलिंग पावर) निहित मानी जाती है।

यह रंग न केवल आँखों को एक अपूर्व राहत व शांति देता है बल्कि मानसिक रूप से संतुलन बनाने के साथ यह क्रोध पर नियंत्रण करते हुए प्रसन्नता को बढ़ाता है. यही कारण है कि इस रंग पर ध्यान केंद्रित करने से मानसिक और शारीरिक—दोनों स्तरों पर अनेक लाभ मिल सकते हैं। बौद्ध परंपरा में भी भगवा रंग को आनंद का प्रतीक माना जाता है।
प्रकृति में यह रंग केसर से प्राप्त होता है, इसलिये इसे केसरिया भी कहा जाता है। यद्यपि सामान्य बोलचाल में कभी कभी इसे नारंगी कह दिया जाता है, परंतु दोनों में सूक्ष्म अंतर है। यही भगवा रंग हमारे तिरंगे में भी है, जो राष्ट्र के आदर्शों का प्रतिनिधित्व करता है।

आज भी भारतीय जनमानस में भगवा रंग गहराई से रचा बसा है। यह केवल एक रंग नहीं, बल्कि आस्था, ऊर्जा और आत्मिक चेतना का प्रतीक है—जो अतीत में था, वर्तमान में है और भविष्य में भी बना रहेगा।
 
अखण्ड भारतवर्ष के परमपूजनीय भगवा ध्वज की जय !

१ अप्रैल २०२५

 
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