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भारतीय
संस्कृति में
नव संवत्सर
- समीर
श्रीवास्तव
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष
की प्रतिपदा को नव वर्ष संवत्सर के रूप में मनाने की
परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। ब्रह्मा जी
द्वारा सृष्टि का निर्माण इसी तिथि को किया गया था।
इसका उल्लेख ब्रह्म पुराण, अथर्ववेद तथा शतपथ ब्राह्मण
में मिलता है। सृष्टि संचालन का दायित्व भी इसी तिथि
से संभाला गया था। 'स्मृतिकौस्तुभ' के मतानुसार चैत्र
शुक्ल प्रतिपदा को रेवती नक्षत्र के विष्कुम्भ योग में
भगवान श्री विष्णु ने मत्स्यावतार लिया था।
उपरोक्त कारणों से इस
तिथि को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। वैदिक संस्कृति की
ज्योतिष शाखा में काल गणना के अनुसार, चैत्र मास के
शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नए संवत्सर का आरम्भ होता
है। इसी तिथि से चैत्र नवरात्रि का शुभारंभ होता है।
सतयुग का आरंभ इसी दिन से हुआ था। महान सम्राट
विक्रमादित्य ने शकों से भारत भूमि को मुक्त कराया था
और इसी उपलक्ष्य में उनका राज्याभिषेक हुआ था। वह तिथि
भी चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा थी। उनके सम्मान में
ही भारतवर्ष में 'विक्रम संवत' का प्रवर्तन हुआ।
भारत पर कई विदेशी
आक्रमण हुए और आक्रमणकारी राज्य स्थापित कर देश में ही
बस गए। वे सभी भारतीय संस्कृति के अनुसार पर्व और
त्योहार मनाते थे। लेकिन जब अंग्रेजों ने भारत पर शासन
किया, तब उन्होंने भारतीय सामाजिक, धार्मिक,
सांस्कृतिक एवं शिक्षा व्यवस्था में बदलाव कर यूरोपीय
सभ्यता के 'ग्रेगोरियन कैलेंडर' पर आधारित जनवरी माह
के प्रथम दिवस को नव वर्ष घोषित किया।
भारत में कई संस्कृतियों
के रीति-रिवाजों का चलन हुआ। भारतीय संस्कृति ने अपने
विराट महासागर में सभी सांस्कृतिक परंपराओं को
समाविष्ट कर लिया, जो 'विविधता में एकता' को दर्शाता
है। देश में नव संवत्सर को विभिन्न प्रांतों में
अपनी-अपनी आस्था और स्थानीय संस्कृति के अनुसार मनाया
जाता है।
जो इस प्रकार हैं:
नवरेह (जम्मू-कश्मीर), गुड़ी पड़वा (महाराष्ट्र),
चेटीचंड (सिंधी समाज), रोंगाली बिहू (असम), उगादी
(आंध्र प्रदेश और कर्नाटक), विशु (केरल), बैसाखी
(पंजाब) आदि। इसके अतिरिक्त कुछ संवत भी आज तक प्रचलित
हैं, जिनमें शक संवत, विक्रम संवत, पारसी सन, शालिवाहन
शक संवत, राष्ट्रीय शक संवत, ग्रेगोरियन ईस्वी सन् और
वीर निर्वाण संवत प्रमुख हैं।
इसके साथ-साथ पौराणिक
काल के भी संवत्सर हैं, जैसे— कल्पारंभ संवत,
सृष्टिगणारंभ संवत, रामराज्य आरंभ संवत, श्रीकृष्ण
जन्म संवत, युधिष्ठिर संवत और कलियुग संवत। भारतीय
पंचांग के अनुसार कुल 60 संवत्सर होते हैं, जो एक चक्र
बनाते हैं। प्रत्येक वर्ष का एक विशिष्ट नाम होता है
और 60 वर्ष पूरे होने के बाद यह चक्र फिर से शुरू होता
है। ये साठ संवत्सर 20-20 के तीन समूहों में विभाजित
हैं, जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और शिव विंशति कहा जाता
है।
आधुनिक मान्यतानुसार
भारत में मुख्य रूप से दो संवत्सरों को स्वीकार किया
गया है— शालिवाहन शक संवत और विक्रम संवत। भारत सरकार
द्वारा शक संवत को आधिकारिक राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप
में अपनाया गया है, जबकि विक्रम संवत का उपयोग अभी भी
कई भारतीय राज्यों और नेपाल में धार्मिक व पारंपरिक
कार्यों के लिए किया जाता है। विक्रम संवत ईसा पूर्व
57 में राजा विक्रमादित्य द्वारा स्थापित किया गया था।
यह कैलेंडर ग्रेगोरियन
कैलेंडर से सामान्यतः 57 वर्ष आगे रहता है (जनवरी से
अप्रैल के दौरान यह 56 वर्ष आगे होता है)। 30 मार्च
2026 से विक्रम संवत 2083 चल रहा है, जो चैत्र महीने
की प्रतिपदा से शुरू हुआ है। यह हिंदू नववर्ष है और
इसका नाम 'सिद्धार्थ' संवत्सर है। प्रति वर्ष चैत्र
शुक्ल प्रतिपदा के दिन नया संवत्सर प्रारंभ होता है।
नव संवत्सर कैसे मनाएँ?
प्रतिपदा को प्रातः नित्य कर्मों से निवृत्त होकर,
अपनी सामर्थ्यानुसार पवित्र नदियों या तीर्थ स्थानों
में स्नान कर नवीन वस्त्राभूषण धारण करें। अष्टदल कमल
बनाकर उस पर नारियल स्थापित करें और 'ॐ ब्रह्मणे नमः'
मंत्र से ब्रह्मा जी का पूजन करें। उन्हें आसन,
अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंध, दीप,
नैवेद्य, तांबूल, नीराजन, नमस्कार और पुष्पांजलि
अर्पित कर प्रार्थना करें। इसके बाद समस्त देवताओं का
विधि-विधान से पूजन करें। घर पर ध्वजा, पताका, तोरण और
वंदनवार आदि लगाकर सभी जीवों तथा प्रकृति के लिए मंगल
कामना करें। नीम की पत्ती एवं मिश्री का प्रसाद बाँटें
और लोकहित के कार्य करें। इस प्रकार अपनी सामर्थ्य और
सात्त्विकता के साथ नव संवत्सर मनाएँ।
परस्पर कटुता का भाव
मिटाकर समता भाव स्थापित करने का संकल्प लें। जीवन
कड़वे-मीठे अनुभवों का मिश्रण है। धूप-छाँव, हार-जीत और
सुख-दुःख के इस संसार रूपी रंगमंच पर हम सब परमात्मा
के हाथों की कठपुतली हैं। हमारी क्षणभंगुरता ही उस
विराट शाश्वतता में छिपी है। |