मुखपृष्ठ

पुरालेख-तिथि-अनुसार -पुरालेख-विषयानुसार -हिंदी-लिंक -हमारे-लेखक -लेखकों से


 ललित निबंध

 

जन्मे हैं प्यारे कृष्ण कन्हैया
- श्रीरामपुकार शर्मा


भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष की महाअष्टमी तिथि। रोहिणी नक्षत्र की काली अंधियारी रात्रि-बेला। उसी के अनुरूप आकाश में चारों ओर घने कजरारे बादल। निरंतर मूसलाधार घनघोर वर्षा। उसी के बीच रह-रहकर बिजली की चकाचौंध चमक और दसों दिशाओं को प्रकंपित करने वाली भीषण मेघ-गर्जना। किसी भौतिक अनहोनी घटना की प्रबल संभावना।

मथुरा के प्रबल नरेश कंस के सुदृढ़ राजकीय बंदीगृह की विभिन्न गलियों में, उसकी दृढ़ प्राचीरों पर जलते प्रकाश-दंड भले ही उन गलियों को प्रकाशित किए हुए हैं, पर उसके सभी बंदी-कक्ष गहन अंधकार में अगोचर ही हैं। चारों ओर घोर सन्नाटे का विस्तृत साम्राज्य पसरा हुआ है। बंदीगृह के लगभग सभी बंदीजन घोर निद्रा के आगोश में बेसुध हैं। इसी तरह बंदीगृह के अधिकांश पहरेदार भी अपनी रक्तिम आँखों को जबरन खोले हुए, निद्रा के मद में चूर हैं। चारों ओर भय उत्पन्न करने वाला घोर सन्नाटा व्याप्त है।

मथुरा के इस सुदृढ़ बंदीगृह का एक अस्त-व्यस्त बंदी-कक्ष। उसमें दीये के क्षीण प्रकाश के बीच कठोर प्राचीर से लगकर एक बैठी और दूसरे लेटे हुए—दो बंदीजनों की आँखों से आज निद्रा हजारों योजन दूर चली गई है। दोनों आगत घटना और उसके परिणाम को स्मरण कर घोर चिंतित हैं। अचानक उस बंदी-कक्ष में जलते दीये के क्षीण प्रकाश के बीच से ही एक अद्भुत, तेज प्रकाश-बिंब उत्पन्न हुआ, जो क्रमशः बंदी-कक्ष की छत तक जा पहुँचा। फिर उसमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए दिव्य चतुर्भुज भगवान श्रीनारायण जी प्रकट हुए। उस दिव्य अलौकिक प्रकाश के आलोक में सब कुछ स्पष्ट हो गया। बंदीगृह के सभी पहरेदार गंभीर निद्रा में लीन हैं। बंदीगृह के केवल उन्हीं दोनों सशंकित बंदीजनों ने उस परम अलौकिक दिव्य स्वरूप को अपनी आँखों के माध्यम से अपने हृदय में चिर-स्थापित किया।

वे दोनों बंदीजन 'माता देवकी और वसुदेव' जी ही हैं। बाकी सभी तो गंभीर निद्रा के आगोश में समाए बेसुध पड़े हैं। श्रीनारायण जी की अमृत-तुल्य पावन ध्वनि भी केवल उन्हीं दोनों सशंकित बंदीजनों के कानों में गुंजित हुई— "हे देवी देवकी! मैं तुरंत ही तुम्हारे गर्भ से एक नवजात शिशु के रूप में जन्म ग्रहण करूँगा। हे देव-पुरुष वसुदेव! वर्तमान परिस्थितियों की चिंता किए बिना ही आप तुरंत मेरे उस शिशु-रूप को गोकुल ग्राम में अपने मित्र नंद जी के घर ले जाइएगा। वहाँ देवी यशोदा के गर्भ से महामाया शक्ति ने शिशु-कन्या के रूप में जन्म लिया है। उसके स्थान पर मुझे रखकर उस नवजात कन्या-शिशु रूपी महामाया शक्ति को आप यहाँ अतिशीघ्र ले आइएगा।" और देव-आदेश पूर्ण होते ही वह दिव्य प्रकाश-पुंज क्रमशः मद्धिम होते हुए पूर्णतः लुप्त हो गया।

दोनों बंदीजनों को दीये के मद्धिम प्रकाश में कुछ भ्रम का आभास हुआ—कहीं उन्होंने कोई दिव्य स्वप्न तो नहीं देखा? दोनों ने एक-दूसरे की मौन और निराशाजनक आँखों में झाँककर अपनी शंका को निर्मूल करना चाहा। परंतु उस दिव्य प्रकाश-पुंज के लुप्त होते ही माता देवकी की मधुर प्रसव-पीड़ा अचानक बढ़ने लगी और जैसे ही मध्य-रात्रि की बेला हुई, ठीक तभी श्रीनारायण जी ने माता देवकी के गर्भ से एक साधारण नवजात शिशु के रूप में जन्म ग्रहण किया। तभी आकाशीय मेघ-चपला भी तीव्र चमक उठी, जिसकी तेज चमक में श्यामल गात वाले नवजात शिशु का मनोभावन मुख-मंडल भी चमक उठा। चंचल चपला सहित गगन-मंडल के काले मेघ भी तेज नगाड़े बजाकर श्रीनारायण के उस दिव्य शिशु-स्वरूप के धरती पर आगमन का स्वागत करने लगे। तभी दिव्य नवजात शिशु-स्वरूप ने अल्प, परंतु अति कर्णप्रिय मधुर क्रंदन-ध्वनि व्यक्त की, जिसने केवल माता देवकी और पिता वसुदेव के कानों में अमृतरस प्रवाहित किया। उस कर्णप्रिय अमृत-ध्वनि को सुनते ही उस दुखियारी माता की सारी प्रसव-पीड़ा जाती रही। कुछ काल के लिए पिता को भी परम सुख की अनुभूति हुई।

नवजात दिव्य शिशु-स्वरूप ने उन दोनों बंदीजनों के मन में उत्पन्न सभी आशंकाओं को निर्मूल कर दिया कि वह कोई स्वप्न न होकर यथार्थ सत्य ही है; अर्थात् नवजात शिशु कोई और नहीं, बल्कि स्वयं श्रीनारायण जी ही हैं। ऐसे में पिता वसुदेव की चिंता बढ़ गई कि इन मजबूत धातु-निर्मित जंजीरों से बँधे होने और प्रबल पहरेदारों के रहते हुए, मैं देव-आदेश का पालन भला कैसे कर पाऊँगा? पर यह क्या! तुरंत ही मजबूत धातु-निर्मित जंजीरें स्वतः ही खुल गईं और पिता वसुदेव पूर्णतः मुक्त हो गए। बंदीगृह के दरवाजे भी एक-एक कर स्वतः ही खुलते गए। सभी पहरेदार पहले से ही गंभीर निद्रा के आगोश में बेसुध पड़े हुए थे। तत्काल बंदीगृह में कोई उपयुक्त वस्तु न पाकर, लाचार पिता वसुदेव ने देव-आदेश के पालन हेतु अपनी भार्या सद्यःप्रसूता देवकी के ही वस्त्र के एक अंश में अपने नवजात ईश्वरीय शिशु को लपेटकर, फलों के लिए रखी हुई एक पुरानी डलिया में सावधानीपूर्वक रखा।

बेचारी सद्यःप्रसूता माता तड़पकर रह गई; अपने जने कलेजे के टुकड़े को एक बार भर-निगाह देख भी तो न पाई थी। पर अपने शिशु-पुत्र की जीवन-रक्षा और ईश्वरीय आदेश में विधाता के विशेष मंतव्य को समझकर माता देवकी अपनी ममता के स्रोत पर निष्ठुरता का कठोर पत्थर रखकर उसे अवरुद्ध कर देती हैं और अपनी शिशु-संतान की मंगल-कामना करते हुए उसे पिता के संग विदा करती हैं। यही तो मातृत्व है! अपनी संतान के क्षणिक सुख की उम्मीद में भी माता का विशाल हृदय बड़े से बड़े कष्टों को सहने के लिए सदैव तत्पर रहता है। देवी देवकी भी तो एक व्यथित माता ही हैं, जिनका हृदय अपने सात नवजात अबोध पुत्रों की निर्मम हत्या से बुरी तरह आहत है। अविलंब उस डलिया को अपने माथे पर रखकर पिता वसुदेव अत्यंत सचेत होकर गोकुल ग्राम के लिए चल दिए।

वसुदेव जी, भाद्रपद मास के अतुलित जल-स्राव को धारण किए गर्व से उफनती यमुना के तट पर अपने नवजात शिशु-पुत्र के साथ पहुँच गए। यमुना के जल-प्लावन करने को उद्यत इस भयंकर स्वरूप को देखकर वे उसके तट पर ही ठिठक गए। उन्हें स्वयं की तो ज़रा भी चिंता न थी, पर नवजात शिशु के भविष्य की चिंता तो थी ही, जिसमें ईश्वरीय हेतुक भी निहित था। उधर यमुना अपने पति श्रीनारायण जी को वसुदेव जी के माथे पर डलिया में शिशु-रूप में देखकर उन्हें बहुत दूर से ही पहचान गई। इतने करीब होने पर अपने स्वामी की चरण-धूलि से अपनी माँग सजा लेने की उसकी इच्छा प्रबल हो गई। अभी तो पति ने भूमि पर चरण रखा ही नहीं था, तो भला धूल कहाँ से सुलभ होती? पर इस समय चरण-धूलि न सही, अपने स्वामी के चरणों के स्पर्श की तो अधिकारिणी वह थी ही। अतः अपने स्वामी श्रीनारायण के शिशु-स्वरूप के कोमल चरणों को स्पर्श करने के लिए वह प्रतिपल मतवाली और व्यग्र होने लगी। यमुना की इस व्यग्रता को भला व्यथित पिता वसुदेव कैसे और क्या जान पाते? फलतः उसके अशांत रूप को देखकर उनका विचलित होना स्वाभाविक ही था।

तभी श्रीनारायण जी की वही पूर्व ध्वनि उनके कानों में फिर से गुंजित हुई— "वर्तमान परिस्थितियों की ज़रा भी चिंता न कर आगे बढ़ते जाएँ।" और फिर वसुदेव जी, त्रिलोक के स्वामी श्रीनारायण जी—जो शेष-शय्या के स्वामी हैं—उन्हें आज एक साधारण डलिया में रखकर, अपने माथे पर धारण किए हुए यमुना की उफनती जलधारा में प्रवेश कर गए।

श्रीनारायण जी के आत्मीय सेवक शेषनाग जी भी शायद उस देव-निर्धारित योजना के अनुकूल अपने प्रभु की सेवा के लिए पहले से ही यमुना-जल में तैयार बैठे थे। अपने प्रभु के पास आते ही वे तुरंत छत्र-सा तनकर प्रभु-सेवा में लग गए। पर बेचारी यमुना जी क्या करे? इतने करीब होकर भी अपने स्वामी के चरण-स्पर्श से दूर! उसकी विवशता ने व्यग्रता का रूप धारण कर लिया, जो व्यग्र ऊर्ध्व लहरों के रूप में बदलने लगी। फिर भी वह अपने स्वामी का चरण-स्पर्श करने में सफल न हो पाई। तब उसकी व्यग्रता जल-स्तर को बढ़ाने लगी, जो वसुदेव जी को क्रमशः डुबोने का उपक्रम करने लगी। पहले कमर, फिर छाती, फिर कंधा डूबा और फिर मुँह, नाक तथा आँखें भी डूब गईं। अब तो उनका सिर भी जल-स्तर में डूबने लगा।

कहीं नवजात ईश्वरीय शिशु को यमुना का जल डुबो न दे—यह शंका वसुदेव जी को बहुत परेशान किए जा रही थी। पर यमुना जी अपने उद्देश्य को समीप देखकर और भी ऊँची उछाल भरने लगीं। शायद डलिया में अठखेलियाँ करता नटखट देवकीनंदन शिशु उन दोनों की परीक्षा ही तो ले रहा था! लेकिन भौतिक परीक्षाओं की भी अपनी एक सीमा होती है। तब ईश्वरीय शिशु-स्वरूप ने अपनी प्रिय यमुना की व्यग्रता को शांत करने के लिए अपने कोमल गुलाबी चरणों को धीरे से डलिया में से बाहर निकालकर नीचे लटका दिया। अपने स्वामी के नाजुक, गुलाबी, कोमल चरणों को स्पर्श कर यमुना जी का व्यग्र मन तृप्त हो गया। फिर उनकी व्यग्रता और प्रबलता—दोनों में क्रमशः ह्रास होने लगा। पिता वसुदेव जी के मार्ग पर अब वह निरंतर अपने जल-स्तर को घटाती हुई उन्हें अति सुगम मार्ग प्रदान करने लगीं। व्यथित पिता वसुदेव इस रहस्य का एकांश भी न समझ सके। इस समय उस रहस्य को समझने की उनकी कोई उत्कंठा भी न थी; उनकी उत्कंठा तो अतिशीघ्र गोकुल ग्राम पहुँचने की ही थी।

यमुना को पार कर वसुदेव जी ने उसे मन ही मन धन्यवाद अवश्य दिया। यमुना ने भी अंतःभाव से ही पितृतुल्य वसुदेव जी को प्रणाम किया तथा शिशु-स्वरूप अपने स्वामी श्रीनारायण जी से पुनः दर्शन देने का अंतःनिवेदन किया। नटखट शिशु ने डलिया में लेटे तिरछी नज़र से देखते हुए, मंद-मंद मुस्कुराकर उसे आश्वस्त किया—"तुम्हारे बिना तो मेरी भौतिक लीलाएँ अधूरी ही रह जाएँगी, प्रिये! मैं तुम्हारे बहुत समीप ही अपनी समस्त बाल-क्रीड़ाओं को करते हुए तुम्हें आत्मीय सुख पहुँचाऊँगा।"

उस काली अंधियारी बरसती भीषण रात्रि में वसुदेव जी पानी में भीगते, गिरते-पड़ते गोकुल में अपने मित्र नंद के द्वार पर पहुँचे। वहाँ के भी सभी बंद दरवाजे स्वतः ही खुलते गए। उनके मित्र नंद जी प्रसूति-गृह के बाहर ही एक कक्ष में गंभीर निद्रा के वश में दिखाई दिए। उन्होंने अपने निद्रित मित्र को मन ही मन प्रणाम किया और 'प्रभु-कार्य' हेतु अविलंब प्रसूति-गृह में निःशब्द प्रवेश किया।

सद्यःप्रसूता यशोदा जी भी गंभीर निद्रा में बेसुध पड़ी हुई दिखाई दीं। उनके पास ही श्रीनारायण जी द्वारा पूर्व-संकेतित महामाया शक्ति शिशु-कन्या के रूप में अपने कोमल, गुलाबी, लघु हाथ-पैर हिलाती दिखाई पड़ीं। उन्होंने अपनी मित्र-भार्या यशोदा जी को भी मन ही मन प्रणाम किया। फिर अविलंब अत्यंत सावधानीपूर्वक उन्होंने अपने शिशु-पुत्र को महामाया शक्ति-रूपी यशोदा-नंदिनी के पास रख दिया। महामाया शक्ति शिशु-कन्या अपनी कोमल, चंचल आँखों को मटकाती हुई उस आगत शिशु को एक पल के लिए देखने लगीं और शिशु-रूप में भी श्रीनारायण जी को पहचानकर मन ही मन उन्हें प्रणाम किया तथा प्रभु-कार्य में स्वयं को भागी बनाए जाने के लिए उन्हें सादर धन्यवाद ज्ञापित किया। वे सभी कार्य देव-गति से अतिशीघ्र संपन्न हुए, जिसे व्यथित पिता वसुदेव न देख पाए और न समझ ही पाए।

वसुदेव जी ने उस महामाया यशोदा-नंदिनी को अपनी गोद में उठा लिया। एक बार मन हुआ कि अपने शिशु-पुत्र को मन भरकर देख तो लें, पर पुत्र-प्रेम बढ़ने और विलंब होने से प्रभु-कार्य में विघ्न उत्पन्न होने की आशंका से उन्होंने उससे अपना मुख मोड़ लिया और महामाया-पुत्री को ही निज संतान-स्वरूप अपने हृदय से लगाए द्रुत गति से उस प्रसूति-गृह से निकल गए।

बरसाती रात्रि में वे एक बार फिर यमुना जी के तट पर पहुँचे। यमुना जी तो पहले से ही इस विशेष देव-सुलभ अवसर की प्रतीक्षा में बेचैन प्रतीत हो रही थीं, जिसकी वह स्वयं भी प्रत्यक्षदर्शी थीं। वसुदेव जी की अंक में महामाया शक्ति देवी को शिशु-रूप में भी पहचानकर उन्होंने मन ही मन उन्हें प्रणाम किया और वसुदेव जी को पुनः सुगम मार्ग प्रदान कर कुछ आश्वस्त हुईं। गिरते-बचते वे पुनः मथुरा के बंदीगृह में पहुँच गए।

वसुदेव जी मन ही मन सोचते रहे कि उनके भीगे और कीचड़ से सने वस्त्रों से उनकी और ईश्वर की चाल कहीं पकड़ न ली जाए। बंदीगृह के सभी दरवाजे अभी भी खुले ही पड़े थे। पर एक-एक कर दरवाजों को वे पार करते गए और दरवाजे भी एक-एक कर स्वतः ही बंद होते गए। बंदीगृह में पहुँचते ही महामाया शक्ति-रूपी यशोदा-नंदिनी को उन्होंने जैसे ही देवी देवकी की सूनी गोद में रखा, वैसे ही बंदीगृह की मजबूत धातु-बेड़ियाँ पुनः उनके हाथों-पैरों को जकड़ गईं। उनके वस्त्र पूर्व की भाँति सूखे और कीचड़हीन हो गए। उस मुख्य बंदीगृह का दरवाजा भी स्वतः ही बंद हो गया, मानो कुछ हुआ ही न हो! फिर उस बंदीगृह में उस नवजात शिशु की कर्णप्रिय मधुर क्रंदन-ध्वनि गूँज उठी, जिससे बंदीगृह के पहरेदार भी गंभीर निद्रा से अचानक जाग गए।

सभी अपनी आँखें मलने लगे। बंदीगृह का रक्षक-प्रमुख दौड़ पड़ा—अपने महाराज कंस को देवकी की संतान के जन्म की सूचना देने के लिए। कुछ ही समय में अपनी निज बहन देवकी के सात पुत्रों का हत्यारा, मथुरा का नरेश निर्मम व अत्याचारी कंस उस बंदीगृह में विकराल काल के रूप में प्रकट हुआ। उसके हिंसक कठोर चेहरे और अपनी नवजात कोमल सात संतानों के खून से रंगे उसके निष्ठुर हाथों को देखकर माता देवकी और पिता वसुदेव दोनों ही काँप गए। उस अभिमानी पापी ने अपनी बहन देवकी की गोद से उस नवजात शिशु को पूर्व की भाँति ही जबरन छीन लिया। पर शिशु से संबंधित उसे कुछ विशेष शंका हुई, जिसका निवारण कर वह कुछ आश्वस्त होना चाहता था।

उसकी शंका निर्मूल भी न थी। आशा के विपरीत यह तो नवजात कन्या-शिशु थी! वह कुछ पलों के लिए चिंतित हुआ, पर उससे हत्यारे को क्या? उसे तो बस आकाशवाणी का वही कथन स्मरण था—'देवकी का आठवाँ पुत्र ही तेरा काल है।' इस कार्य में उसे देवताओं के षड्यंत्र का आभास हुआ। उसने विधाता पर क्रूर अट्टहास किया—"तो बहन देवकी की आठवीं संतान! अर्थात् मेरा काल! तू अपना रूप बदलकर आया है।" पर वह पापी-हत्यारा कंस क्या उस बालिका-रूपी अपने संभावित काल को छोड़ने की मूर्खता कर सकता था? कदापि नहीं! वह जानता था कि इस नवजात कन्या-शिशु की मृत्यु ही उसके संभावित अमरत्व का आधार है।

अतः हत्यारा कंस अपने पूर्व अभ्यास के अनुसार उस शिशु-कन्या को भी पास की चट्टान से निर्मित कठोर प्राचीर पर पटककर मार डालने के लिए उस पर ज़ोर लगाकर फेंकने लगा। पर यह कैसी विडंबना हुई! वह शिशु-कन्या प्राचीर की ओर न जाकर ऊर्ध्वमुखी उठती ही चली गई। फिर गगनभेदी कठोर ध्वनि में वह बोली— "पापी, हत्यारे कंस! तुम्हारा काल जन्म ले चुका है। वह शीघ्र ही तुम्हें तुम्हारे पापों का उचित दंड देगा। बचा सकते हो तो बचा लो अपने आप को!" और वह महामाया शक्ति-शिशु अगले ही पल अंतर्धान हो गई।

हतभागा कंस अब क्या करता! अट्टहास के स्थान पर अंतःभय ने विजय प्राप्त कर ली थी। पर उस अहंकारी और बहुरूपिया कंस ने अपने भय को भीतर ही छिपा लिया और पराजय के क्रोध में अपने पैरों को पटकते हुए उस बंदीगृह से बाहर निकल गया। उसके अनुचर भी उसी के साथ चले गए।

व्यथित माता देवकी और पिता वसुदेव ने उस परम अदृश्य महामाया शक्ति देवी का स्मरण कर हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। उस परम महामाया शक्ति के कारण ही उनका एकमात्र नवजात पुत्र इस भौतिक लोक में जीवित रहकर अत्याचारी कंस से अपने अग्रजों की निर्मम हत्या का प्रतिशोध लेगा और अपने माता-पिता को उस काल-कोठरी से मुक्त करवाएगा। वह कंस सहित अनगिनत दुष्टों का दलन भी करेगा। वह एक नया इतिहास लिखेगा और अमरता को प्राप्त करेगा।
‘श्रीकृष्णचंद्र कृपालु भजु मन, नंद-नंदन यदुवरम्।
आनंदमय सुखराशि ब्रजपति, भक्तजन-संकटहरम्॥
हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम, हरे राम, राम राम हरे हरे॥’

१ अगस्त २०२६

1

1
मुखपृष्ठ पुरालेख तिथि अनुसार । पुरालेख विषयानुसार । अपनी प्रतिक्रिया  लिखें / पढ़े
1
1

© सर्वाधिका सुरक्षित
"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक
सोमवार को परिवर्धित होती है।