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 ललित निबंध

 

बरसाल की वह शाम
- हरिहर झा


सूखी पत्तियों की आवाज अब भी कानों में गूंज रही थी। बादल अठखेलियां कर रहे थे। मन कोपल बन कर फूट रहा था। आकाश देख कर मेरी यह पंक्तियाँ दिमाग में बादलों की तरह छा रही थी-
“छा गए लो बादल आकाश में;
प्यास धरती को नल आकाश में”
अभी आकाश से कोई नल खुलने में देरी थी। गर्मी के मारे दम घुटा जा रहा था। मन उखड़ा उखड़ा था और भीतर कोई ज्वाला जल रही थी। मोती कुत्ता पास में लेटा हुआ था। उसकी आँखे सहज रूप में कुछ कहना चाहती थी पर उसकी भाषा समझने के लिए उसकी समझ और उसकी वृत्ति मुझमें नहीं थी।

तारे छुप रहे थे “छिन ली साड़ी तारों भरी; द्रौपदी रोई छल आकाश में” बूंदाबांदी शुरू हो चुकी थी। आसपास मेढक टर्रा रहे थे। तब अनुभव हुआ हम मानव भी प्रकृति के मेंढक ही तो हैं। टर्रा टर्रा कर आसमान में छा जाते हैं पर हमारी सभी दौड़ धूप बस टर्राना ही तो है। यहाँ पर इसे देखने के लिए भारी भरकम दर्शन-शास्त्र की जरूरत नहीं; स्वत: दिखाई पड़ता है; अनुभव में आ जाता है।

मैंने सामने देखा। वह सहमी हुई थी। उसने मेरी ओर देखा। सभी नदियों की सरगम उसके सरोवर में मिल रही थी। उसकी नजरें उठी थी फिर झुक गई। इसका अर्थ क्या हो सकता है? वह तो आसमान की बिजली थी; जमीन पर उतरी। ता थैया करते हुए उसकी कजरारे नैनो की चितवन इठलाते हुए मेरी ओर देख रही थी। फिर बस आँखे तरेर कर भाग गई। मेरा अस्तित्व झनझना उठा। हृदय की तंत्रियाँ राग भैरवी गाने लगी। मेरा अहं झुलस रहा था। थर्राते हुए इस खूंखार आक्रमण से हुए अपने रक्त-प्रवाह पर मेरा ध्यान गया जो बाहर से दिखता नहीं था।

आँखे तरेरने का भी कोई अर्थ था पर मैं बूझ नहीं पाया। एक धमाल जो हुआ और निकल गया। बस, मैं संभाले संभल नहीं रहा था; अस्तित्व की बाढ़ में बह रहा था। खुद को सह रहा था। बिखरा, बिखरा! अपने मरुस्थल को समेटने की व्यर्थ कोशिश में। इस गर्मी में मेरी देह ठिठुरती हुई काँप रही थी। मन की सतह अपनी गहराई को घुड़की दे कर नियंत्रण करना चाहती थी जो लावा बन कर फूट रही थी।
लोग कहते हैं बारिश में मौसम कितना रोमांटिक हो जाता है! चारों ओर हरियाली! पर यह तो सुखद है या दुखद पता नहीं चल रहा। पूरा सावन भीग रहा है और और इसके जल में बदन भीगा जा रहा है। हिमालय अपनी जगह, गगन अपनी जगह और मैं अपनी जगह और इस अव्यक्त भाव में कैद हो कर बहुत अचरज से मैं एक पंछी की तरह क्षितिज की ओर देख रहा था।

वह पहले भी मिली थी। साइकिल की चाबी भाई साहब को देने के लिए कह कर चली गई। उसके भाई साहब उसके अधिक निकट थे फिर भी मेरे द्वारा दिए जाने का अर्थ मुझे कुछ समझ में न आय़ा। पता नहीं उसके भाई साहब का मिजाज कुछ और समझ कर भड़का तो मुझे गुनाहगार समझ कर न फँसा दें। उन्होने तीरछी निगाह से देखते हुए मुझसे चाबी ले ली। मेरे उजड़े हुए विचारों ने स्वयं को संयत होने के लिए धमकाया।

उसने ऐसा क्यों किया? पर मुझे क्या? बस अपनी एक झाँकी दिखा कर चली गई। मैंने कुछ मदद कर दी इसका मुझे एहसास हुआ। फिर मिली जब उसने नया कुत्ता खरीदा था। मुझे देखते ही अपने कुत्ते को प्यार से सहलाने लगती। पर इसका अर्थ क्या? कभी बिजली सी मुस्कान फेंकते हुए तो कभी हँसते हँसते ही निकल जाती। पता नहीं वह किसे चाहती है और क्या चाहती है? और पहला प्रश्न तो यही कि वह किसे चाहती है? फिर सपने में इतराती हुई झूला झूलती दिखाई देती।

दिल की फुलवारी अब मेरे लिए सिमट गई है जो थोड़ी सी आहट से काँपने लगी है। किसी तूफान के अंदेशे ने मेरे उपर जुल्म कर डाले। मेरी पवित्र चेतना पर बिच्छु ने डंक मार दिया। डंक लगने पर प्रसन्नता कैसे हो सकती है? सुख दुख से परे का अजीब अर्थ मेरी समझ में आ रहा था। चिल्लाना अभी मूर्खता की श्रेणी में आ जाता है और मौन काटने दौड़ता है।

एक एक क्षण का बोझ मैं सहन कर रहा था। आइंस्टीन महोदय! मैं मान गया आपकी बात। समय सापेक्ष होता है। पर इस बोझिल समय को वापस ले कर वही पुराना प्यारा सा निरपेक्ष समय वापस दे दिजिए। आपकी गणित की दुरूहता आपको मुबारक हो।

मेरा तन मन वाचाल हो उठा था। पर जिव्हा कुछ बोल नहीं पा रही थी। सुनसान निरवता मुझे खाए जा रही थी। शाम रात्री के आगोश में जाकर ठहर गई थी।

१ जुलाई २०२६

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