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 ललित निबंध

 

संगम पर सरस्वती के साधक
- ओम निश्चल


मैं वहीं बैठ जाना चाहता था—भीगी रेत पर। असंख्य पदचिह्नों के बीच अपनी भाग्यरेखा को बाँधता हुआ। पर यह असंभव था। मेरे आगे-पीछे अंतहीन यात्रियों की कतार थी—शताब्दियों से चलती हुई, थकी, उद्भ्रांत, मलिन, फिर भी सतत प्रवाहमान। पता नहीं, वे कहाँ जा रहे हैं, किस दिशा में, किस दिशा को खोज रहे हैं—एक शती से दूसरी शती की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए? कहाँ है वह कुंभ-घट, जिसे देवताओं ने यहीं कहीं बालू के भीतर दबा कर रखा था? न जाने कैसा स्वाद होगा उस सत्य का—अमृत की कुछ तलछटी बूँदों का—जिसकी तलाश में यह लंबी, यातना-भरी, धूल-धूसरित यात्रा शुरू हुई है। हज़ारों वर्षों की ‘लॉन्ग मार्च’, तीर्थ-अभियान, सूखे कंठ की अपार तृष्णा—जिसे इतिहासकार भारतीय संस्कृति कहते हैं! यह हैं हिंदी के कथाकार निर्मल वर्मा।

मेरी कहानी में पं. जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है—“मैंने संगम में स्नान कर, भारद्वाज आश्रम में आने वाले यात्रियों को देखा है। इनमें तरह-तरह के लोग थे, जो वास्तव में पूरे हिंदुस्तान का नमूना थे। वास्तव में यह समग्र भारत था, जिसका दर्शन प्रयाग के कुंभ-पर्व पर होता था और आज भी होता है।” कैसा आश्चर्यजनक और प्रबल है यह विश्वास, जो हज़ारों वर्षों से इनको और इनके पूर्वजों को भारत के कोने-कोने से खींचकर गंगा के पावन जल में स्नान के लिए ले आता रहा है।

सुना जाता है, कुष्ठ-रोग से मुक्ति के लिए कवि पद्माकर ने गंगा की महिमा को लेकर अनेक छंदों की रचना की। संस्कृत के जाने-माने कवि पंडितराज जगन्नाथ ने तो गंगा-स्तवन में गंगालहरी ही लिख डाली। रत्नाकर ने गंगावतरण में गंगा की महिमा गाई। प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत ने गंगा का कितना मोहक चित्र खींचा है—

सैकत-शैया पर दुग्ध-धवल
तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म-विरल,
लेटी है श्रांत, क्लांत, निश्चल।

कविवर उमाकांत मालवीय ने एक ही गीत में गंगा के शिशु-रूप से लेकर उसके तारुण्य, युवावस्था और ममतामयी वात्सल्य तक के रूपों का भव्य अंकन किया है। वे लिखते हैं—

गंगोत्री में पलना झूलें,
आगे चले बकइयाँ;
भागीरथी घुटुरुवन डोले,
शैल-शिखर की छैयाँ।

हिंदी के प्रख्यात कवि त्रिलोचन के मन में भी कुछ ऐसा ही आकर्षण था, जो उन्हें कुंभ-मेले में खींच ले गया। उन दिनों शमशेर तो वहाँ थे ही; त्रिलोचन बनारस में रहते थे। सो वे प्रयाग आए और कुंभ में कई दिनों तक प्रवास करते रहे। इस दौरान उन्होंने अपने पच्चीस सॉनेटों में महाकुंभ को समेटा—उसके हर पहलू पर एक-एक सॉनेट। रामविलास शर्मा ने इन सॉनेटों को हिंदी भाषा का लघुत्तम महाकाव्य कहा था।

निबंधकार विद्यानिवास मिश्र प्रायः गंगा-यमुना के संगम-तट पर भागवत-कथा सुनते और माह-भर संगम-तट पर ठिठुरती शीत में स्नान किया करते थे। उन्होंने लिखा है—१९४२ से कल्पवास की साधना का अभ्यासी मन ‘चल मन, गंगा तीरे’ कहता हुआ निकल पड़ता था। सारी सांसारिकता को दरकिनार कर पंडितजी कल्पवास में लीन रहते थे, जिसे उन्होंने अंत तक नहीं छोड़ा। शमशेर की कविताओं में भी इलाहाबाद और गंगा की कुछ स्मृतियाँ हैं। टूटी हुई-बिखरी हुई में इसके कुछ चित्र मिलते हैं।

कुंभ-यात्रा के एक रोमांचक वृत्तांत में कथाकार रामदरश मिश्र ने लिखा है कि कैसे वे अपनी माँ और दो अन्य बुज़ुर्ग स्त्रियों के साथ प्रयाग पहुँचे और एक पंडे के यहाँ रहने का ठीहा जुगाड़ किया। वे लिखते हैं—यात्रियों के पास चादर या दरी के अलावा होता ही क्या है? माघ में सील-भरी ज़मीन पर चादर या दरी बिछाकर सोना कितना मुश्किल होता है!… लेकिन कुछ मुश्किल नहीं होता, जिसके भीतर गंगा-मइया के प्रताप से मुक्ति की आकांक्षा भरी हो।

पूर्ण कुंभ का ऐसा ही एक अनुभव कथाकार विवेकी राय का भी है—एक अनुभव : कुंभ का। विवेकी रायजी पर अपनी माँ सहित दो अन्य बूढ़ी माताओं को स्नान कराने का ज़िम्मा आन पड़ा था। इस मेले में उनकी देखभाल के बावजूद एक माँजी नहाते समय कहीं खो गईं और फिर दूसरे दिन तड़के किसी तरह वापस मिल सकीं। मेले की भीड़ में कहीं बैठने का जोग नहीं, ठीहा नहीं। सो वे एक ईंट ही झोले में भरकर चलते-फिरते रहे। जहाँ थकान महसूस होती, ईंट निकालकर बैठ जाते। इस यात्रा का बेहद रोमांचक खाका खींचते हुए अंत में उन्होंने लिखा है—तकिए की जगह वही ईंट का प्रिय टुकड़ा कुछ कपड़ों के साथ रखा जाता और ऊनी चादर पर कट जातीं महाकुंभ की रातें।

कुंभ की महिमा गंगा से जुड़ी है। तुलसी, पद्माकर, भारतेन्दु हरिश्चंद्र आदि ने गंगा को अपनी कविता का विषय बनाया है। पर आधुनिक कवि गंगा पर लिखने से कतराते हैं—इस भय से कि कहीं उन्हें आस्थावादी या हिंदुत्ववादी न मान लिया जाए। त्रिलोचन पर प्रगतिशीलों की ऐसी भृकुटियाँ तनी थीं कि वे भीतर से कहीं हिंदुत्ववादी तो नहीं हो गए हैं। इस सबसे बेपरवाह ज्ञानेंद्रपति ने अपने संग्रह का नाम गंगातट ही रखा, जिसमें गांगेय संस्कृति के मौजूदा और बदलते स्वरूप के साथ-साथ वैश्विक परिवर्तनों की आहट भी सुनाई पड़ती है।

निर्मल वर्मा कुंभ से लौटते लोगों को देखकर कहते हैं—“सबके हाथों में गीली धोती-तौलिये हैं, गगरियों और लोटों में गंगाजल भरा है। मैं इन्हें फिर कभी नहीं देखूँगा। कुछ दिनों में वे सब हिंदुस्तान के सुदूर कोनों में खो जाएँगे, लेकिन एक दिन हम फिर मिलेंगे—मृत्यु की घड़ी में। आज का यह गंगाजल, उसकी कुछ बूँदें, उनके चेहरों पर छिड़की जाएँगी।” ऊन के गोले की तरह खुलते सूरज से लेकर मेले में फहराती पताकाओं, शिविरों, बुझी आवाज़ों में गाते कीर्तनियों, ऋग्वेद की ऋचाओं के शुद्ध उच्चारण में पगी सुर-लहरियों, नंगे निरंजनी साधुओं, खुली धूप में पसरे हिप्पियों, युद्ध की छोटी-मोटी छावनियों से तने तंबुओं के इस वातावरण से बावस्ता निर्मल वर्मा ने यहाँ अपने भीतर के निर्माल्य का खुला परिचय दिया है।

याद आता है समरेश बसु का उपन्यास अमृत कुंभ की खोज में, जिसमें उन्होंने कुंभ-मेले को आधार बनाकर पूरा गल्प रच डाला है। हिंदी कहानी की नींव रखने वाली बंगला लेखिका राजेंद्रबाला घोष की एक कहानी कुंभ में छोटी बहू भी है, जिसमें छोटी बहू की कुंभ-स्नान की इच्छा का मार्मिक निरूपण है।

१ फरवरी २०२५

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