मुखपृष्ठ

पुरालेख-तिथि-अनुसार -पुरालेख-विषयानुसार -हिंदी-लिंक -हमारे-लेखक -लेखकों से


 ललित निबंध

 

मर्यादा में बसते राम
- कल्पना मनोरमा


राम उसी को मिलेंगे,जिसे मिला हो सत्य। रघुनंदन को प्रिय रहे, मर्यादित सातत्य।।

समय का अपना परिमाप होता है,अपने वृत्त और त्रिज्याएँ होती हैं, अपनी स्थितियाँ और अवरोध होते हैं, और जीवन के उत्थान-पतन के अपने कारण और समाधान होते हैं। जिस प्रकार इंसान अपने को सुधरता रहता है, उसी तरह समय अपने को स्वत: परमार्जित करने के टूल इजात करता रहता है। संस्कृति-सभ्यता का खेल बहुत सूक्ष्म, मार्मिक और विस्फ़ोटक होता है।

जहाँ संस्कृति में परंपरागत रूढ़ियाँ आकार लेते हुए हाशिये भी निर्मित करते हुए चलती हैं, वहीं सभ्यता पारदर्शी नव चेतना के माध्यम से कुंद पड़ी परम्पराओं और समाजगत धारणाओं में एकत्र हुई जड़ता पर अपने ढंग से प्रहार करते हुए जीवन-मूल्यों को निरंतर परमार्जित करती है। सभ्यता ही समय की व्याख्या करते हुए नवयुग की संरचना करती है।

आधुनिक समय शुभेच्छाओं और आशीषों का समय है। उजले घटाटोप में शाश्वत उजास का पवित्र समय न चाहते हुए द्वारे-द्वारे आ पहुँचा है। ‘राम’ से बड़ा ‘राम’ के नाम की मान्यता है। इसे सीधा जपो या उल्टा ध्वनि राम ही निकलती है। जीवन की वैज्ञानिकता को राम के नाम-आलोक में समझने-समझाने का यह सलोना वक्त आधुनिकता की भर्त्सना करते हुए, वैदिक कालीन संस्कृति जो सुस्त पड़ गयी थी, का मार्ग प्रशस्त करने को हमारे सामने प्रस्तुत हुआ है। मनुष्य की श्रेष्ठताएँ, संकल्पनाएँ एवं धारणाएँ जो युगों-युगों से सार्वभौमिकता-समन्वय सापेक्ष रही थीं, जो किसी कारण वश निर्जीव होकर आँखों से उझल हुई थीं या मनुष्य मति भ्रम में आ चुका था, पुनर्वालोकन का श्रुत्य वक्त वैज्ञानिता के सम्मुख आकर खड़ा हो गया है।

वैदिक तपोभूमि से जुड़ी रामकथा और उससे जुड़े एक-एक पात्र के अपने-अपने निर्मल त्याग है। राम, राम न बनते हैं, अगर उनके तीनों भाई आगे बढ़कर राम के त्यागों में अपने प्रेमिल समर्पण न जोड़ देते। राम प्रत्येक जीव के लिए प्रेमाश्रय हैं। आधुनिक समय में जब हम पाश्चात्य संस्कृति के चंगुल में लगातार फँसते जा रहे हों, ऐसे में रामकथा मानवीय आग्रह में कर्म, श्रद्धा,कर्तव्य,आस्था,आदर्श,सम्बन्ध और सम्बंधियों की दीर्घजीवी प्राकट्य है। अनुशासन व सद्भावना का प्रेमिल कोलाज है। समर्पण का जिवंत हस्ताक्षर है। रामकथा बताती है कि सीमाओं के विघटन, मर्यादाओं के उल्लंघन विध्वंसक होते हैं। हमारी नव पीढ़ी के सामने सनातन समृद्धशाली अतीत का आना आवश्य था। तकनीकी समय इस कार्य हेतु वरदान साबित हुआ है।

चौदह वर्षों के अरण्य की बात भावुकता वश हमें भले बुरी और दुखदायी लगती है लेकिन राम का एक परिवार वन में था,जिनसे मिले बिना वे अपना जीवन कैसे सफल मान सकते थे। राम ने देव, दनुज, मानव, नर किन्नर सबसे प्रेम किया। सभी को सम्मान दिया। राम का दाय प्रकृति का दाय है। वनांचल समृद्धि को प्राप्त होता है जब राम अपने सुकोमल पद दे वहाँ की भूमि का स्पर्श करते हैं। वही हाल तब होता है जब वनवास काट कर राम अयोध्या आये तब जो उल्लास हुआ होगा, वह अवध और उसके आस-पास के क्षेत्रों तक ही सीमित रहा होगा लेकिन वर्तमान दौर तकनीक और इंटरनेट का है। अब समस्त भारतवासी एक साथ, एक ही समय में अपने-अपने राम के भुवन-निर्माण, उनकी स्थापना की ख़ुशी में सराबोर हैं। राम, मर्यादा पुरुषोत्तम दीन-हितकारी हैं। इस पृथ्वी पर प्रत्येक प्राणी के अपने-अपने राम हैं। राम का जीवन-दर्शन सहिष्णुता, त्याग और प्रेम से भरा है। इसके बाद भी राम का स्वरूप हर एक व्यक्ति की समझ के दायरे में भिन्न हो सकता है मगर उनके त्यागपूर्ण एवं तटस्थ जीवन की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं होगी।

कुबेरनाथ राय कहते हैं– “राम कथा का विकास वैदिक मनुभूमि से हुआ है। इस कथा के स्नायु मंडल में वैदिक भावधार के तत्व हैं। भारत को छोड़कर अन्य किसी देश में इस महाकाव्य की रचना संभव नहीं थी। राम कथा में राम ही नहीं राम से जुड़ा प्रत्येक पात्र सूर्य के तेज और प्रकृति को धारण किए हुए है। प्रत्येक ही सूर्य की भांति अपने हृदय को जलाकर निरंतर तप कर रहा है, जिससे सृष्टि मधुमय हो सके। इस रामायण महाकाव्य का प्रथम शब्द ही ‘तप’ है। प्रत्येक चरित्र अपनी आकृति की सीमा में तेजस्वी है। वाल्मीकि ने मनुष्य की महिमा के सारे रूपों को एक साथ लाकर उपस्थित कर दिया है। किसी प्रकार की सामाजिक राजनीतिक या आर्थिक व्यवस्था में सही परिवार, सही पत्नी, सही पति, सही भाई, सही बंधु और सही सेवक की आवश्यकता । इसके बिना कोई भी व्यवस्था दीर्घजीवी और स्वस्थ नहीं रह पाएगी।”

अनुशासन,संवेदना, मर्यादा, समर्पण और त्याग सभी तात्विक गुण एक प्रेम में समाविष्ट हैं। यदि प्रेम की सिर्फ एक भावना को अपने हृदय में पोषित-पल्लवित कर लिया जाए तो समस्त भावनाएँ स्वत: समृद्धिशाली बनकर परमार्थ में तत्पर हो सकती हैं। वहीं ये भी सच है कि सिर्फ अकेले ‘प्रेम’ को यदि खत्म कर दिया जाए तो अन्य सारे गुण ऐसे विलुप्त हो जाते हैं जैसे– हिरण के सिर से सींग। बिजली के तार में जिस प्रकार करेंट प्रवाहित होता है, वैसे ही प्रेम संसार के सूक्ष्म से सूक्ष्म घटक में प्रवाहित होता है। प्रेम के दाय में राम अपना रामत्व सर्वव्यापी बनाकर सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय हेतु वन-वन भटकने के लिए सहज ही मान जाते हैं। प्रेम के वशीभूत होकर लक्ष्मण अपने माता-पिता को अर्धमूर्क्षित अवस्था में छोड़ भाई राम और भाभी सीता के साथ वन चले जाते हैं। क्यों? क्योंकि उन्हें अपने बड़े भाई से प्रेम था। भरत राम के प्रेम के वशीभूत होकर राजमहल त्याग कर नंदीग्राम में भाई की चरण-पादुकाओं में अपने राजा के दर्शन करते हुए कठिनाई भरा जीवन यापन करते हैं।

प्रेम नगाड़े की चोट नहीं। बल्कि नगाड़े पर पड़ने वाली चोट के पीछे गुँजित अनहद नाद है। प्रेम मधुर तरंग है। रसों में राजा, प्रेम है। समर्पण में, प्रेम सेवक है। प्रेम की अभिव्यक्ति नैसर्गिक है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम का चरित्र प्रेम और त्याग की प्रतिमूर्ति है- राम उसी को मिलेंगे, जिसे मिला हो सत्य। रघुनंदन को प्रिय रहे, मर्यादित सातत्य।

गोस्वामी तुलसी दास ने रामचरित मानस में परस्पर स्नेह, सम्मान, कर्त्तव्य-परायणता के साथ अयोध्या में राम और अन्य पात्रों के माध्यम से बीते वक्त और वर्तमान की सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन के सूत्रपरक सुझाव दिए हैं। कोई भी व्यक्ति कितना भी रूपवान, गुणवान क्यों न हो जब तक उसके भीतर मानवीय गुणों के साथ कर्मों में शुचिता नहीं आएगी, उसे सुसभ्य पहचान मिलना असंभव है। भगवान राम इसलिए पूजित नहीं, क्योंकि वे विष्णु के अवतारी हैं, बल्कि उन्होंने कठोर से कठोरतम व्रत लेकर मानव मात्र के मान-सम्मान और वैदिक सनातन संस्कृति की स्थापना के लिए कठिन से कठिन तप किये और सदगुणों-सदकर्मों के कारण मर्दाया पुरुषोत्तम कहलाए। करुण हृदय राम पिता के वचन कहीं मिथ्या न हो जाएँ, कहीं सत्य पराजित न हो जाए इसलिए एक क्षण में राज-पाठ छोड़ चौदह वर्षों का कंटकाकीर्ण वनवास स्वीकार्य कर लिया- “रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्राण जाई पर बचन न जाई।” को उन्होंने सार्थकता प्रदान की।

देखा जाए तो राजा रघु का वंश नीति में जीवन देखने का आग्रही था, जीवन में नीति को नहीं। उनके यहाँ धर्म की रक्षा करना, प्राण-रक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण और सम्माननीय माना जाता था। रघुकुल में सत्य, दया, करुणा, धर्म और मर्यादा के मार्ग पर चलते हुए जीवन यापन की गहरी उत्कंठा और लालसा देखी जाती है। वरना राजा दशरथ ने तो सिर्फ राम को ही चौदह वर्षों का वनवास दिया था, सीता और लक्ष्मण भी अपनी मर्जी से उसी जद आ गये और इधर अयोध्या में पूरा परिवार इस त्रासदी भोगने लगा। राम का मन इतना विशाल था कि उन्होंने वनवास भेजने वाली माँ कैकेई के प्रति भी अपनी भावनाओं को दूषित न करते हुए सम्मान दिया।

राम के भाई लक्ष्मण, भरत, शत्रुध्न और उनकी पत्नीयाँ सीता, मांडवी, उर्मिला और श्रुतकीर्ति ने अपने पतियों का साथ देकर स्त्री के करुण रूप में रघुकुल-धर्म और मर्यादाओं की स्थापना की थी। किसी को राम से दूर रहकर वियोग में रहना पड़ा तो किसी को उनके सानिध्य का सुख मिला। राम वन न गए होते तो वन्य जीवों और जन-जातियों को उनके दर्शन कहाँ से होते हैं?

जहाँ लक्ष्मण राम-सीता के सानिद्ध्य में रहते हुए वन-वन विचरण करते रहे,वहीं लक्ष्मण की पत्नी अपनी बहनों मांडवी और श्रुतकीर्ति के संरक्षण में उर्मिला अपने पति के प्रति अनन्य प्रेम और त्याग लिए अपने एकांत को सार्थक करती रहीं। कहने को शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति साथ-साथ महल में रहे लेकिन एक साथ रहकर भी एक दूसरे के साथ को महसूस नहीं कर पाए क्योंकि अयोध्या के राजमहल में राम के वियोग में मूर्क्षित प्रिय जनों की सेवा शुश्रूषा करना ही उनका कर्तव्य है वे दोनों ही इस भावना में समर्पित हो अपने को भूले रहे। अवध में सबके त्याग अपने-अपने तरह से कठिन से कठिनतम बने रहे लेकिन किसी ने हार नहीं मानी। तीनों राजमाताओं के साथ-साथ नंदीग्राम में बैठे भरत और महल में पति के विछोह में तड़पती मांडवी के तप-त्याग भी वर्णन योग्य हैं। शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति उन दो विरही जनों को चौदह वर्ष मन से सजाते-सँवारते हुए राम के वियोग को सहते रहे। कैसा मंजर रहा होगा? सोच भी पूरी तरह उस त्याग की जंगम परिधि को भेद नहीं पाती है।

मान्यता है कि भरत भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का अवतार थे। राम के वन गमन के बाद सबके बार-बार आग्रह के बाद भी भरत ने राज्य स्वीकार नहीं किया। वहीं भरत की पत्नी मांडवी देवी रति की अवतारी मानी जाती हैं। इन दो वियोगियों का वियोग तब और ज्यादा कष्टकारी और असहनीय बन गया, जब कुछ दूरी पर रहने के बाद भी चौदह साल भरत और मांडीव मिल नहीं पाते हैं। एक तरफ महल में बजता सन्नाटा और दूसरी ओर नंदीग्राम में भाई राम के अवध लौट आने की प्रतीक्षा में लीन, भाई की पादुकाओं के साहारे जीवन-यापन करते भरत का दुःख, जिसे शब्द देने में शायद तुलसीदास को भी असमर्थता लगी होगी, तभी उनसे जुड़े प्रसंग को उतना नहीं लिख सके,जितने अन्य पात्रों को कवि ने लिखा है- “तुलसी काया खेत है, मनसा भयौ किसान। पाप-पुन्य दोउ बीज हैं, बुवै सो लुनै निदान”

गोस्वामी जी ने इस दोहे के माध्यम से कहा है कि मानव का शरीर एक खेत के समान है और मन किसान के समान। मनुष्य के जीवन में मन रूपी किसान के पास पाप-पुण्य रूपी बीज हमेशा रहते हैं। शरीर द्वारा जो जैसे कर्म करता है, मन, पाप-पुण्य के बीज बोता रहता है। यानी जिसने जो किया है, उसे उसका प्रतिफल भोगना ही पड़ेगा। राजा दशरथ ने अनजाने में ही सही किन्तु श्रवण कुमार की हत्या की थी और उनके माँ-बाप से श्राप पाया था, परिणाम स्वरूप अपने चौथेपन में उन्होंने अपनी सबसे प्रिय सन्तान को वन गमन का आदेश देकर स्वयं अपने प्राण त्याग दिए थे। राजा दशरथ के परलोक जाने के बाद उसके माताओं के दुःख को भला कौन वर्णित कर सकता है, जिन्होंने अपनी ढलती उम्र में पुत्रों को गोद में देखा और पलक झपकते महल के सुख छोड़कर सहज ही उनके कुछ बच्चे वन चले गये।

यह विधि का विधान था। रावण जैसे अन्य कुवृत्तियों वाले राक्षसों से धरती कैसे मुक्त हो पाती? राम ने अपने त्याग के पीछे सनातन संस्कृति और मानवता की शुभता के लिए वन जाना स्वीकार कर लिया था। इसलिए राम का चरित्र हमेशा प्रासंगिक बना रहेगा और ये बताता रहेगा कि असली विकास विध्वंसात्मक सभ्यता में न होकर समन्वयकारी संवेदनशीलता में निहित है।

राम ने संसार की क्षणभंगुरता को जानते हुए निर्विकार भाव से मनुष्यता को सर्वोपरी स्थापित किया। आधुनिक प्रबुद्ध समय निर्माण में तत्पर हो, राम की मूर्ति में न देखते हुए राम की भव्यता को उनके आचरण में देखने का समय हमारे सामने है- राम नाम वह सत्य है, जिसमें रमते राम। पृथ्वी के हर कथ्य में, बसते राजाराम।।

१ अप्रैल २०२५

1

1
मुखपृष्ठ पुरालेख तिथि अनुसार । पुरालेख विषयानुसार । अपनी प्रतिक्रिया  लिखें / पढ़े
1
1

© सर्वाधिका सुरक्षित
"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक
सोमवार को परिवर्धित होती है।