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वैश्विक धरातल पर
उत्सवों का उल्लास
- शशि पाधा
विश्व भर में त्योहारों का स्वरूप भिन्न होता है।
इन्हें मनाने की विधियाँ अलग हैं परन्तु इन सभी
त्योहारों का मूल उद्देश्य एक है----- समस्त विश्व जन
को एक सूत्र में पिरोए रखना। सभी त्योहार लोगों को
जीवन के प्रति उत्साह, खुशी व भाई-चारे का संदेश देते
हैं। भारत में हमारे त्योहार सामाजिक, धार्मिक,
सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक, हर दृष्टि से महत्वपूर्ण
हैं। ये हमारी संस्कृति का गौरव हैं और हमारी पहचान
भी।
भिन्न देश, भिन्न दिशाएँ, विभिन्न संस्कृतियाँ, यहाँ
तक कि प्राकृतिक एवं भौगोलिक अंतर भी इतना कि इन देशों
में कई समंदरों की दूरी, दिन और रात का भी अलग-अलग
समय, चाँद और सूरज के आने-जाने का भी समय अलग है।
किन्तु, इन असमानताओं के बावजूद कोई भी विभाजन विश्व
संस्कृति को विभाजित नहीं कर सकता। मानव मात्र की
कामना, उनकी भावना, उनके सपने एक हैं। सत चित आनन्द की
प्राप्ति और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए विश्व भर
में कई प्रकार के पर्व और उत्सव मनाए जाते हैं।
भारत कृषि प्रधान देश होने के साथ-साथ त्योहारों,
रंगों और मेलों का देश है। भारत में अलग-अलग समय पर
फसलें उगाई जाती हैं और इन्हीं फसलों के आधार पर कई
उत्सव और त्योहार मनाये जाते हैं। फसलों की कटाई की
खुशी में विश्व भर के लोग उत्सव मनाते हैं। लेकिन इस
प्रसन्नता के द्योतक दो त्योहार ऐसे हैं जो विभिन्न
देशों में एक ही प्रकार के रीति-रिवाजों के साथ मनाए
जाते हैं। दोनों त्योहारों को मनाने की प्रक्रिया में
इतनी समानता है कि एक बात स्पष्ट हो जाती है कि संसार
चाहे जितना भी बड़ा हो, समंदर चाहे जितनी भी दूरियाँ
बढ़ाएँ, मानव की प्रकृति और पारस्परिक संस्कृति आपस में
हमें जोड़े रखती है - पूर्व से पश्चिम तक, उत्तर से
दक्षिण तक।
उत्तरी भारत में जो त्योहार ‘लोहड़ी’ के नाम से जाना
जाता है, कुछ-कुछ वैसा ही त्योहार पश्चिम देशों में
‘हेलोवीन’ के नाम से जाना जाता है। भारत में लोहड़ी का
त्योहार फसलों की कटाई एवं सर्दी के आगमन की तैयारी के
रूप में मनाया जाता है। उत्तरी भारत में फरवरी के
महीने में मनाए जाने वाला यह पर्व पंजाबी तथा हरियाणवी
लोगों का प्रमुख त्योहार माना जाता है। इसे पंजाब,
हरियाणा, दिल्ली, जम्मू काश्मीर और हिमाचल में धूम-
धाम तथा हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं। इसे मकर
संक्रांति से एक दिन पहले, हर वर्ष १३ जनवरी को मनाते
हैं।
लोहड़ी से संबद्ध परंपराओं एवं रीति-रिवाजों से ज्ञात
होता है कि प्रागैतिहासिक गाथाएँ भी इससे जुड़ी हुईं
हैं। दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि-दहन की
याद में ही यह अग्नि जलाई जाती है। इस अवसर पर
विवाहिता पुत्रियों को माँ के घर से 'त्योहार'
(वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फल आदि) भेजे जाते हैं।
लोहड़ी से २०-२५ दिन पहले ही बालक, बालिकाएँ 'लोहड़ी'
के लोकगीत गाकर लकड़ी इकट्ठी करते हैं। संचित सामग्री
से चौराहे या मुहल्ले के किसी खुले स्थान पर आग जलाई
जाती है। मुहल्ले या गाँव भर के लोग अग्नि के चारों ओर
आसन जमा लेते हैं। घर और व्यवसाय के कामकाज से निपटकर
प्रत्येक परिवार अग्नि की परिक्रमा करता है। रेवड़ी
(और कहीं कहीं मक्की के भुने दाने) अग्नि को भेंट किए
जाते हैं तथा ये ही चीजें प्रसाद के रूप में सभी
उपस्थित लोगों को बाँटी जाती हैं। घर लौटते समय
'लोहड़ी' में से दो चार दहकते कोयले, प्रसाद के रूप
में, घर पर लाने की प्रथा भी है। रात के समय आग जलाने
का एक कारण यह भी है कि आग से गर्मीं में पैदा होने
वाले सभी कीट –पतंगों का नाश हो जाता है।
जिन परिवारों में लड़के का विवाह होता है अथवा जिन्हें
पुत्र प्राप्ति होती है, उनसे पैसे लेकर मुहल्ले या
गाँव भर में बच्चे रेवड़ी माँगते और बाँटते हैं।
लोहड़ी के दिन या उससे दो चार दिन पूर्व बालक बालिकाएँ
बाजारों में दुकानदारों तथा पथिकों से पैसे माँगते
हैं, इनसे लकड़ी एवं रेवड़ी खरीदकर सामूहिक लोहड़ी में
प्रयुक्त करते हैं। लोहड़ी पर अनेक लोक-गीतों के गायन
का प्रचलन है। इस अवसर पर बच्चे घर–घर जाकर जब पैसे
मांगते हैं तो साथ में एक सामूहिक गीत भी गाते हैं
'सुंदर-मुंदरिए, तेरा कौन विचारा - दुल्ला भट्टी
वाला...' शायद सबसे लोकप्रिय गीत है जो इस अवसर पर
गाया जाता है। पूरा गीत इस प्रकार है-
सुंदर मुंदरिए - हो तेरा कौन बेचारा-हो
दुल्ला भट्टी वाला-हो, दुल्ले ने धी ब्याही-हो
सेर शक्कर पाई-हो, कुडी दे बोझे पाई-हो
कुड़ी दा लाल दुपट्टा-हो, कुड़ी दा शालू पाटा-हो
शालू कौन समेटे-हो, चाचा गाली देसे-हो
चाचे चूरी कुट्टी-हो, जिमींदारां लुट्टी-हो
जिमींदारा सदाए-हो. गिन-गिन पोले लाए-हो
इक पोला घिस गया जिमींदार वोट्टी लै के नस्स गया - हो!
यह गीत दुल्ला भट्टी वाले का यशोगान करता है। किंवदंती
प्रचलित है कि दो अनाथ कन्याओं; सुंदरी और मुंदरी की
जान बचाकर, उनकी जबरन होने वाली शादी को रुकवाकर
दुल्ला भट्टी नें उनका कन्यादान किया था। यह विवाह
जंगल में आग जलाकर, बहुत सरल ढंग से एक सेर शक्कर देकर
सम्पन्न किया गया।
शाम
होते ही बच्चों की टोलियाँ जिनमें अधिकतर लड़के होते
हैं, उक्त गीत गाकर लोहड़ी माँगते हैं और यदि कोई
लोहड़ी देने में आनाकानी करता है तो ये मसख़रे बच्चे
उनकी इस तरह ठिठोली भी करते हैं---
'हुक्के उत्ते हुक्का, ए घर भुक्का!' यानी यह घर तो
भूखों का है। शहरों के शरारती लड़के दूसरे मुहल्लों
में जाकर 'लोहड़ी' से जलती हुई लकड़ी उठाकर अपने
मुहल्ले की लोहड़ी में डाल देते हैं। यह 'लोहड़ी
ब्याहना’ कहलाता है। कई लोगो का मानना हैं कि यह
त्यौहार जाड़े की ऋतु आने का द्योतक हैं। आधुनिक युग
में यह लोहड़ी का त्योहार सिर्फ पंजाब, हरियाणा,
दिल्ली, जम्मू कश्मीर और हिमाचल में ही नहीं अपितु
बंगाल तथा उड़िसा में भी मनाया जाता है।
संयुक्त
राज्य अमेरिका, कनाडा, न्यूज़ीलैंड आयरलैंड और विश्व के
अन्य देशों में भी, लगभग ऐसे ही रीति रिवाजों के साथ
फसलों की कटाई के बाद उत्सव मनाया जाता है। केवल समय
और महीना भिन्न होता है। इन देशों में फसलों की कटाई
अक्टूबर मास तक हो जाती है अत: इस पर्व को अक्टूबर के
अंतिम दिन यानी ३१ अक्टूबर को मनाया जाता है। पश्चिमी
देशों में उन्हीं दिनों सर्दी की आहट होती है और लोग
फसलों की कटाई के बाद निश्चिन्त होकर सामूहिक रूप से
इसे भरपूर मौज मस्ती से मनाते हैं। वातावरण आनन्दमय हो
जाता है।
संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में इस पर्व को
‘हेलोवीन’ का नाम दिया गया है। इन देशों में हेलोवीन
मनाने की परम्परा भारत में लोहड़ी मनाने की परम्परा
जैसी ही है। बच्चे कई दिन पहले ही विभिन्न ऐतिहासिक या
लोक कथाओं पर आधारित चरित्रों की वेश भूषा खरीदते हैं
और हेलोवीन के दिन पहनकर टोलियों में अपने गली मोहल्ले
में घर-घर जाकर द्वार खटखटाते हैं। आस-पास के पड़ोसी
पहले से ही घर में उनके लिए कई प्रकार के उपहार लाकर
रखते हैं। यह उपहार लोग या तो दरवाज़े के पास रख देते
हैं या दरवाज़ा खोलकर उन्हें भेंट करते हैं। कई व्यस्त
लोग अगर कैंडी या अन्य छोटे उपहार आदि नहीं ला सकते
हैं तो वे इन बच्चों को पैसे भी देते हैं। बच्चे
दरवाज़े की घंटी बजाकर इस तरह का गाना गाकर अपने आने की
सूचना देते हैं -----
ट्रिक और ट्रीट, स्मेल माई फीट
गिव मी समथिंग, गुड टु ईट
इफ़ यू डोंट, आई डोंट केयर
आई विल पुलडाउन योर अंडरवियर
यानी अगर उन्हें उपहार नहीं मिलते हैं तो वो नाराज़
होने का खेल खेलते हैं और इस गीत को ऊँची आवाज़ में
गाते हैं। घर-घर से इकट्ठी की हुई लूट (कैंडी, पेंसिल,
चवन्नी आदि) का आनंद बच्चे हफ्तों लेते हैं और अगले
वर्ष का इंतजार शुरू हो जाता है।
एक और मिलती-जुलती प्रथा है जिसमें हमारी तरह अग्नि
जलाना भी शामिल है। जैसे भारत में लोहड़ी की शाम अग्नि
जलाकर लोग उसके आस-पास बैठकर आनन्द उठाते हैं। अमेरिका
और केनेडा में भी ठीक वैसे ही लोग कद्दू को काटकर
उसमें मुँह, आँख आदि जैसे सुराख बनाकर और उनके बीच में
मोमबत्ती या दीया बड़े-बड़े पीले कद्दू में आँख -मुँह
काटकर उसके अन्दर मोमबत्ती या दीया जलाकर घर के बाहर
सजा देते हैं। इस अवसर पर कद्दू में तरह-तरह के अन्य
डिजाइन बनाने का भी चलन है।
हैलोवीन के मौके पर लोग सजते भी हैं। अब यह तैयार होना
या सजना कुछ-कुछ भारत में आयोजित होने वाले फ़ैन्सी
ड्रेस के जैसा है। यहाँ पर होने वाली सजावट
हल्की-फुल्की से लेकर बहुत चमत्कारी और भयानक भी हो
सकती है। जिसमें राजकुमारी स्नो वाइट से लेकर चुड़ैल,
भूत, बैट मैन, चमगादड़ या फिर जहाँ तक आपकी कल्पना जा
सकती है वैसी सजावट हो सकती है। बच्चे सज-धजकर हाथ में
बैग / बास्केट लेकर पास पड़ोस में ट्रिक और ट्रीट के
लिए जाते हैं और एक सामूहिक गीत गाते हैं जिसका मतलब
कुछ ऐसा है कि या तो जल्दी से मेरा मुँह मीठा करवाएँ
नही तो... कुछ –कुछ ऊपर दिया हुआ गीत गाकर हँसी-ठिठोली
करते हैं।
आयरलैंड में भी आग जलाकर सभी पड़ोसी आस पास बैठते हैं
और छोटे बच्चों को फल, लघु चॉकलेट आदि भेंट के रूप में
देते हैं।
इसी संदर्भ में होली भी वैश्विक त्योहार है चाहे भिन्न
देशों में इसका स्वरूप भिन्न हो। भारत में रंगों से
होली खेलने का प्रचलन है तो स्पेन में टमाटरों के साथ
होली खेली जाती है। कैरिबियाई देशों में होली को फगुआ
नाम से जाना जाता है। १९वीं सदी के आस-पास बहुत से
भारतीय लोग जीविका कमाने के लिए इन देशों में बस गये
थे। उनके साथ ये त्योहार, उत्सव मेले भी इन देशों में
पहुँच गये। इसी प्रकार गुआना, ट्रीनीडाड, सूरीनाम आदि
देशों में भी भारतीय त्योहार पूरी सांस्कृतिक परम्परा
के साथ मनाये जाते हैं।
इन त्योहारों की समानता को देखकर यह कह पाना कठिन है
कि किस संस्कृति पर किस दूसरी संस्कृति का प्रभाव है।
मानव चाहे किसी भी समाज में, किसी भी देश में रहे,
उसका मौलिक स्वभाव भिन्न नहीं होता। मानव तो संसार में
शान्ति से, आनन्दमय वातावरण में, मिल-जुलकर जीना चाहता
है। किन्तु कई हिंसक तत्व उनकी शांति में विघ्न डालते
हैं। प्रश्न यह है कि क्यों लोग ‘वसुधैव कुटुम्बकं’ के
शान्ति मंत्र को भूलते जा रहे हैं? |