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जलजीरा
स्वाद, स्मृति और साहित्य
- पूर्णिमा वर्मन


गर्मी की दोपहरों में जब हवा भी थककर किसी पेड़ की छाया में बैठ जाती है, तब एक गिलास जलजीरा केवल प्यास नहीं बुझाता—वह भीतर तक उतरकर स्मृतियों को भी तर कर देता है। पुदीने की सोंधी गंध, जीरे की हल्की-सी तिक्तता और काले नमक की चुटीली उपस्थिति—ये सब मिलकर जैसे किसी पुराने किस्से का स्वाद रचते हैं। आश्चर्य नहीं कि हिंदी साहित्य ने भी इस साधारण-से पेय को यूँ ही नहीं गुजरने दिया; कहीं यह गाँव की चौपाल में ठंडक का बहाना बना, तो कहीं शहर की भागदौड़ में ठहराव का संकेत। दरअसल, जलजीरा सिर्फ पेय नहीं, एक सांस्कृतिक बिंब है—जो शब्दों में भी अपनी खट्टी-मीठी छाप छोड़ जाता है।

सुरेन्द्र वर्मा के उपन्यास 'मुझे चाँद चाहिए' में जलजीरे का उल्लेख एक अत्यंत स्वाभाविक, लगभग अनायास-से संवाद में आता है-
“आप एपिटाइज़र में क्या लेंगी?” चारुश्री ने मेन्यू उसकी ओर बढ़ाया।
“जो आप पसंद करें।”
“मुझे यहाँ का जलजीरा बहुत पसंद है।” चारुश्री मुस्कुरायी, “चलेगा?”
“जरूर।” (पृष्ठ २६७)
इस छोटे-से संवाद में जलजीरा केवल एक पेय नहीं रह जाता, बल्कि वह उस पूरे परिवेश की सांस्कृतिक सहजता और रुचि-बोध को व्यक्त करता है। औपचारिक ‘एपिटाइज़र’ के बीच उसकी उपस्थिति जैसे आधुनिकता के बीच परंपरा की एक हल्की-सी, मुस्कुराती हुई रेखा खींच देती है।

खान-पान की इस परंपरा में जलजीरा कभी एपिटाइज़र की तरह खाने के पहले आता है, तो कहीं बाद में भी इसके दर्शन होते हैं। गुरुदत्त के उपन्यास 'ममता' में इसे खाने के बाद परोसने का वर्णन मिलता है- “काहन ने उसको बुलाकर समझा दिया। पहले रसमलाई आई। फिर बंगाली चमचम आया। फिर पाने के बताशे और अंत में कुल्फी। कुल्फी के बाद जलजीरा।” (पृष्ठ ५९) ऐसा लगता है कि बीसवीं सदी में भोजन-स्थलों पर मद्यपान के साथ-साथ जलजीरे की व्यवस्था भी रहती थी। जो लोग नशा करना पसंद नहीं करते थे, वे जलजीरे का चुनाव करते थे। यही कारण है कि अनेक साहित्यिक रचनाओं में इसका उल्लेख मद्यपान के साथ आता है।

कर्तार सिंह दुग्गल अपने उपन्यास 'जल की प्यास न जाए' में एक स्थान पर लिखते हैं- "कोई भांग पीता था और कोई सुलफा।" "लेकिन मुझे तो यह कहीं नहीं दिखाई देता," मैंने झुँझलाकर कहा। "दिखाई दे जाएगा साहब। आपको फील्ड ड्यूटी से यहाँ आए दिन ही कितने हुए हैं।" बैरा यह कहते हुए चल दिया। उसे बस इस बात का ज्ञान था कि मैं अधिक से अधिक जलजीरा पीता हूँ। पान खाकर मुझे नशा हो जाता है। चक्कर आने लगते हैं। मेरी उँगलियों के पोरों में जैसे कोई चुटकियाँ काट रहा हो। (पृष्ठ १४६)

कमलेश्वर के आत्मपरक संस्मरणों के संग्रह 'आधारशिलाएँ- जलती हुई नदी' में एक प्रसंग आता है- “अपने दोस्तों के साथ पंजाब की एक चौपाल में खाना खाने के लिए बैठ गया था। यह नई तर्ज़ का ‘एथनिक’ होटल था। हर प्रदेश के ग्रामीण वातावरण में स्कॉच या पार्टी के साथ-साथ वहीं सस्ता-सा जलजीरा भी मिलता था… बाजरा या मक्के की रोटियाँ मिलती थीं, मेवे या अनाज का पुदीना मिलता था…” (पृष्ठ १७१)

यहाँ जलजीरा एक व्यापक सांस्कृतिक परिदृश्य का हिस्सा बनकर उभरता है। यहाँ वह पंजाब की एक चौपाल-सदृश ‘एथनिक’ व्यवस्था में उपस्थित है, जहाँ विभिन्न प्रदेशों के ग्रामीण जीवन का स्वाद एक साथ संजोया गया है। इस संदर्भ में जलजीरा केवल एक पेय नहीं, बल्कि लोक-स्वाद की सहज उपलब्धता का प्रतीक है—जो स्कॉच जैसे ‘आधुनिक’ पेयों के साथ भी बिना किसी संकोच के उपस्थित है। यह सह-अस्तित्व अपने आप में बहुत अर्थपूर्ण है; जैसे भारतीय जीवन में परंपरा और आधुनिकता एक ही थाली में परोसी जाती हों। जलजीरा यहाँ उस सादगी और सर्वसुलभता का प्रतिनिधि है, जो किसी विशेष वर्ग की नहीं, बल्कि पूरे जनजीवन की साझी धरोहर है।

रामविलास शर्मा द्वारा संपादित 'जहाज और तूफान' नामक लेख-संग्रह में कादंबरी शर्मा अपने ललित निबंध 'हमारी वह गली' में जलजीरे वाले की पुकार का बड़ा ही स्वाभाविक वर्णन करते हुए लिखती हैं- “तुर्कमान गेट का मकान था। कमरे के पीछे की लंबी-पतली गली। गली कल्याणपुरा निरंतर चलती। याद आती है गर्मी की भरी दोपहरी में जलजीरे वाले की आवाज़ और उसका खनकता हुआ गीत— जलजीरे की आ गयी बहार हमारी गली वाला... जलजीरा पानी वाला जिसके पीते ही आए डकार हमारी गली वाला... ठेले पर रखा घड़ा लाल कपड़े में लिपटा। घड़े के गले में गेंदे के फूलों की माला, ठेले पर नीबू व गिलास, जलजीरे का पानी निकालने की लंबे डंडे वाली घंटी, घंटी के हैंडल पर घुँघरू। गीत के साथ वह इन घुँघरुओं को बजाता था— छन-छन-छन।” (खंड २, पृष्ठ ६७८) )

गली-गली घूमते हुए जलजीरा बेचने वाले फेरीवालों का वर्णन अनेक पुस्तकों में मिलता है। मोहनदास नैमिषारण्य अपनी पुस्तक 'दलित उत्पीड़न की परंपरा और वर्तमान' में एक स्थान पर लिखते हैं- “तंत्र-मंत्र का यह जानकार भागीरथ घूम-घूमकर जलजीरा बेचता है। घर पर उसने एक कमरे में माँ काली की तस्वीर टाँगकर बाकायदा एक उपचार कक्ष बना रखा है। इलाके के लोगों की आसमानी मुसीबतें टालने का उसका धंधा ठीक-ठाक चल रहा था।” (पृष्ठ १०५)

जब जलजीरा उत्तर भारत की तपती गर्मियों का एक अनिवार्य सांस्कृतिक दृश्य रहा है—गली-चौराहों से लेकर आँगनों और चौपालों तक—तो यह मान लेना कठिन है कि साहित्य उसके स्पर्श से अछूता रह गया होगा। दरअसल, जो कुछ जीवन में इतनी सहजता से घुला-मिला हो, वह शब्दों में भी अपना रास्ता बना ही लेता है। इसीलिए हिंदी साहित्य में जलजीरा कभी सीधे उल्लेख के रूप में, तो कभी संकेतों और प्रसंगों में, उस ठंडक और विराम का बिंब बनकर उभरता है, जिसकी तलाश हर तपती हुई दोपहर करती है।

गिरिराज किशोर के उपन्यास 'लोग' में जलजीरा घर-आँगन के उस जीवंत दृश्य के साथ उपस्थित होता है, जहाँ दोपहर की थकान, लोगों की आवाजाही और रसोई की हलचल एक साथ घुल-मिल जाती है-
“दोपहर को बाबा और बाबू साथ ही लौटे काका साहब जनाने-सहन में जलजीरा बनाने में लगे हुए थे।
....
"जलजीरा बन रहा है बाबू जी ने संक्षिप्त सा जवाब दिया। काका साहब की आवाज सुनाई पड़ी, बाहर दीना से कह रहे थे बस ऐसा चुखारदार बना है... सुरग एक अंगुल दूर रह जाएगा। बाबा दाँत कुरेदते कुरेदते मुस्कुरा दिये।
....
"काका साहब बड़ों को चाट खिलाने और जलजीरा पिलाने लगे थे। कुँवर साहब जलजीरा पीते थे और कहते थे ' चौबे जी की .... 'हम सब कहते थे' जय' । …”
यहाँ जलजीरा केवल एक पेय नहीं, बल्कि पूरे घर की सक्रियता और आत्मीयता का केंद्र बन जाता है। “बस ऐसा चुखारदार बना है… सुरग एक अंगुल दूर रह जाएगा”—इस तरह के संवाद उस स्वाद की अतिशयोक्ति भर नहीं हैं, बल्कि उस आनंद के संकेत हैं, जो सामूहिकता में ही संभव होता है। आगे जब “काका साहब बड़ों को चाट खिलाने और जलजीरा पिलाने लगे थे” और “कुँवर साहब जलजीरा पीते थे…” जैसे प्रसंग आते हैं, तो यह दृश्य और भी विस्तृत हो उठता है। यहाँ जलजीरा एक सामाजिक रस्म-सा बन जाता है—जहाँ पीना ही नहीं, साझा करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। “हम सब कहते थे ‘जय’”—इस छोटे-से वाक्य में उस सामूहिक उल्लास की झलक है, जो साधारण-सी चीज़ों को भी उत्सव में बदल देता है। (पृष्ठ ६०)

रवीन्द्र कालिया अपनी आत्मकथा गालिब छुटी शराब” में जलजीरे का उल्लेख एक तीखे, किंतु सहज व्यंग्य के रूप में सामने आता है। कालिया लिखते हैं कि जिनके पास कॉफी का बिल चुकाने की क्षमता नहीं होती, वे जलजीरा या काँजी का सहारा लेते हैं- वे टी हाउस वाले समय की बात करते है जब वहाँ साहित्य के धुरंधर अपने प्रशंसकों के साथ जमघट लगाते थे। साहित्य के धुरंधरों को वे कवि, कथाकार और संपादक के रूप में विभाजित करते हैं और उन्हें कप्तान का नाम देते हैं। उनका मानना है कि जो लोग कॉफी का बिल चुकाने के पैसे नहीं होते वे जलजीरा या काँजी पीते हैं।
 
"छह बजते-बजते सभी टीमें मैदान में उतरी नजर आती हैं। कप्‍तानों के चेहरों पर जलाल आता जाएगा और वे बढ़-बढ़ कर कॉफी का आर्डर देते जाएँगे। जब तक कप्‍तान बिल अदा नहीं कर देंगे।... शायद यही कारण है कि बहुत-से फ्री लांसर परिश्रम करने के बावजूद कप्‍तान-पद प्राप्‍त करने में असमर्थ रहते हैं और टी-हाउस में जलजीरा (अब काँजी भी) पीने की लत डाल चुके हैं। वे अपनी टीम भी नहीं जुटा पाते क्‍योंकि जलजीरा और काँजी का आकर्षण टीम-भर लोगों को नहीं खींच पाता। आपातकालीन स्‍थिति में या मंदी के दिनों में इक्‍के-दुक्‍के विश्वविद्यालय के छात्रों की बात अलग है।"

यहाँ जलजीरा केवल ठंडक देने वाला पेय नहीं, बल्कि एक प्रकार की साहित्यिक स्थिति का सूचक बन जाता है। कॉफी और जलजीरे के बीच का यह अंतर दरअसल प्रतिष्ठा और संघर्ष के बीच की दूरी को रेखांकित करता है। साहित्य की दुनिया में भी स्वाद केवल जिह्वा का नहीं, सामाजिक स्थिति का भी द्योतक होता है।

मुरारी लाल त्यागी अपनी पुस्तक 'अटूट बंधन' में एक पुलिस चौकी का वर्णन करते हुए कहते हैं- “आदमी पढ़ने से नहीं गुनने से बनता है। हमको हर तरह के आदमी से बोलना पड़ता है। देखते नहीं हो कोई न कोई सरकारी अफसर पड़ा ही रहता है हमारे पास। पुलिस वालों की तो ज़बान को जलजीरा यहीं मिलता है जब जी चाहा दौड़े चले आते हैं।” यहाँ जलजीरा केवल शाब्दिक अर्थ में नहीं बल्कि अन्य अनेक अर्थों में व्यापक उपस्थिति देता है। (पृष्ठ २५)

कुछ संस्मरणात्मक पुस्तकों में जलजीरे के व्यक्तिगत और आत्मीय उल्लेख भी मिलते हैं। रमेश चंद्र द्विवेदी अपनी पुस्तक 'फिराक साहब' में लिखते हैं- “फिराक साहब का मुँह दिनभर चलता रहता था। वह कुछ न कुछ ज़रूर खाया करते थे। हालाँकि खाते थे बहुत ही कम। टॉफी से लेकर जलजीरा भरे बताशे, कुछ न कुछ चलता ही रहता था।” (पृष्ठ ५६)

'पंत के दो सौ पत्र बच्चन के नाम' में संकलित एक पत्र में सुमित्रानंदन पंत लिखते हैं- “तुम्हारा पत्र अभी मिला। मैं तो वहाँ १-२ दिन से अधिक नहीं ठहर पाऊँगा—कारण मिलने पर बताऊँगा। पर तुम छुट्टी लेने का प्रबन्ध कर रखना और मेरे साथ २४ तारीख को कालका मेल से लौटने की तैयारी कर लेना। इसीलिए यह कार्ड डाल रहा हूँ। जलजीरा कोई महाशय तुम्हारे लिए रख गए हैं, ले आऊँगा। २१ की शाम को कालका-मेल से दिल्ली पहुँचूँगा—स्टेशन पर भेंट होगी। शेष मिलने पर।” (पृष्ठ ३४)

साहित्य में जलजीरा का उपस्थिति अनगिनत स्थानों पर देखी जा सकती है लेकिन इन चुने हुए विविध प्रसंगों को एक साथ रखकर देखने पर स्पष्ट होता है कि जलजीरा हिंदी साहित्य में केवल एक पेय के रूप में उपस्थित नहीं है, बल्कि वह जीवन के अलग-अलग रंगों को जोड़ने वाला एक सूक्ष्म सूत्र है। कहीं वह आत्मीय संवाद की सहजता है, कहीं घर-आँगन की सामूहिक चहल-पहल, तो कहीं साहित्यिक दुनिया की विडंबनाओं पर हल्की-सी मुस्कान। दरअसल, जलजीरा अपने खट्टे-मीठे स्वाद की तरह ही साहित्य में भी एक संतुलन रचता है—जो जीवन की तपिश को कम करता है, पर उसकी सच्चाइयों को फीका नहीं पड़ने देता। शायद इसीलिए, जब भी किसी रचना में जलजीरे का उल्लेख आता है, वह केवल प्यास बुझाने का प्रसंग नहीं रहता, बल्कि एक पूरे अनुभव, एक पूरे परिवेश को जीवित कर देता है।

१ मई २०२६

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