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साहित्य संगम

साहित्य संगम के इस अंक में प्रस्तुत है श्रीवल्ली राधिका की
तेलुगू कहानी का रूपांतर- उपहार, रूपांतरकार हैं जी परमेश्वर


उन दिनों बहुत सुंदर थी मैं। कुमुदिनी-दलों सी आँखें और उन आँखों में सैकड़ों सपने...। पता नहीं, कालिदास देखते तो कैसा वर्णन करते पर कॉलेज के लडके, “बापरे, क्या फिगर है?” कहा करते थे। आँखें फाड़-फाड़ कर देखा करते थे।

उनकी बातें सुनकर प्रकट रूप से क्रोध दर्शाती पर भीतर-ही-भीतर प्रसन्न होती थी। लोकमर्यादा का पालन करने सर तो झुका लेती पर शरारत भरी हँसी के साथ होठों पर माणिक की लालिमा छा जाती। हँसते खेलते मेरी पढ़ाई पूरी हो गयी। पूरी हो जाना क्या, मैं ने ही पढ़ाई रोक दी। आगे और पढ़ने का विचार मेरे मन में कभी आया ही नहीं। तब तो ‘विचार’शब्द का अर्थ भी नहीं जानती थी मैं।

सदा खोई-खोई सी घूमती रहती थी। कभी भूल से बैठ जाती तो लगातार बातें करती रहती। रमणी, इंदिरा, जानकी... हम सब कॉलेज से मिलकर लौटती थीं। आराम से
 बातें करते हुए उस चार फर्लांग की दूरी को हम लोग चार घंटे में तय करतीं थीं। सीधे घर पहुँचने की आदत हमारी थी ही नहीं। दो घंटे जानकी के घर में फूल तोड़ने में, रमणी के घर में झूला झूलने में लगा देती थीं। या सब मिलकर मंदिर चली जातीं। हमारे गाँव का शिव मंदिर बहुत ही सुंदर था। मंदिर एक ऊँचे टीले पर बना हुआ था। इतनी सारी सीढ़ियाँ आसानी से चढ़ जाती थीं हम लोग।

कभी-कभी हमारे घर पहुँचने में रात के आठ बज जाते थे । सबके घर आस-पास में ही होने के कारण हम चारों सदा मिलकर रहती थीं। इस कारण हमारे घर के लोग भी कभी चिंतित नहीं होते थे। रमणी वीणा बहुत अच्छा बजाती थी, जानकी गीत बहुत अच्छा गाती थी। इंदिरा के बारे में कहना ही क्या…? वह तो हरफ़न मौला थी। हम से बातें करते समय, मंदिर में सबके साथ बैठी हुई भी या तो स्वेटर बुनती रहती या टोकरियाँ बनाती रहती, बस कुछ-न-कुछ करती ही रहती। केवल मैं ही एक अनाड़ी थी। पर आश्चर्य की बात, सब लोग मुझे ही इम्पॉर्टेंस दिया करती थीं। और नहीं तो क्या? हर किसी को सुंदरता ही न सबसे पहले दिखाई देती है।

बी. ए. पास करना ही मेरे लिये बहुत बड़ा काम था। मेरे पास होने की बात सुनते ही "अरे वह तो सदा से भाग्यशाली रही है" कहते हुए बुआ ने अपनी प्रसन्नता प्रकट की। इसके एक सप्ताह बाद ही मेरे रिश्ते की बात चल पडी और मुझे देखने के लिये आ भी गए। पिता जी से पता चला कि लड़का इंजनीयर है, कहानियाँ भी लिखता है। "लड़के को हमारी बेटी बहुत पसंद आयी है, भावुक जो है।" अंतिम बात बहुत धीमी आवाज में कही थी उन्होंने, फिर भी सबने सुन ली। बुआ ने दुबारा मेरे गालों को चिकोटी लेते हुए कहा "मुझे पता है रे, बड़ी भाग्यशाली है तू।

विवाह के तुरंत बाद मैं उनके साथ हैदराबाद चली आयी। कैसी विचित्र बात है, जिस गाँव में पली-बड़ी हुई, उस गाँव को, अपने दोस्तों को छोड़कर आते हुए मुझे थोड़ा भी दुःख नहीं हुआ। हाँ, माँ को छोड़ते हुए थोड़ा-सा रोना आया। यहाँ आने के बाद भी कुछ दिनों तक बिना किसी उत्तरदायित्व के आजाद पंछी की तरह घूमती रही।

अचानक एक दिन… सिनेमा की कहानियों की तरह मैं चकराकर नहीं गिर पडी। लेडी डॉक्टर ने आकर गंभीरता से यह नहीं कहा "तुम माँ बनने वाली हो।" कुछ हड़बड़ाहट के साथ इस बात को मैं स्वयं जान गयी कि मैं माँ बनने वाली हूँ। बात मैंने उनसे कह दी। अब तक मैं उन्हें ठीक से समझ भी नहीं पायी थी। बताने से पहले सोचा कि सुनते ही बहुत हंगामा कर देंगे। पर सुनकर वे बहुत शांत रहे। लगा कि उन्होंने थोड़ा-सा मुस्कुरा दिया। समझ में आ गया कि प्रसन्न हुए हैं। इससे अधिक प्रतिस्पंदन उनमें दिखाई नहीं दिया। मेरे लिये...मेरे लिये तो यह जीवन परिवर्तन था। मुझे लगने लगा कि अब तक मेरा बिताया हुआ जीवन, जीवन ही नहीं था… वास्तव में, असली जीवन का आरंभ तो अब हो रहा है।
धीरे-धीरे बढ़ता हुआ पेट, पेट में हिलता डुलता प्राणी,… लग रहा था कि मुझे कोई नया पाठ पढ़ा रहा है। और नहीं तो क्या? अब तक छाती पर झूलते हुए मंगल-सूत्र का अनुभव ही ठीक से नहीं कर पाई थी मैं।
अब तक मैं कभी रोई नहीं थी। लेकिन आनंद किसे कहते हैं, इसे तो अभी-अभी जान रही थी।

बहुत डर लग रहा था। नौ महीने पेट पर हाथ फेरते हुए सोचती थी, "क्या यह पेट कभी फ्लैट बनेगा… क्या मैं पहले की तरह सुंदरता की मूर्ति बनकर चल सकूँगी?…
वह डर भी कितना आनंददायक था।
मैं चाहती थी कि लड़की हो.. पर 'सुमंत' पैदा हुआ। 'सुमंत' … यह नाम मैंने ही सुझाया था। उनको देखो तो ऐसा लगता था कि वे जानते ही नहीं कि बच्चों के कुछ नाम भी होते हैं…बड़े बूढ़े सोचकर अपने बच्चों के नाम रखते हैं। फिर अपनी कहानियों के नायक-नायिकाओं को वे नाम कैसे देते थे? नये-नये नाम उन्हें कैसे सूझते थे?

कितनी ही पुस्तकें पढ़कर... ढूँढ कर खोज कर यह नाम रखा था मैंने। उन दिनों 'सुमंत' नाम में एक नयापन था। यदि मैंने अपने जीवन में पहली बार कोई काम श्रद्धा और दीक्षा से किया हो तो वह यही था, नाम चुनने का। कोई भी काम बड़े आराम से करने की आदत थी मेरी, अब तक खा पीकर घूमने के सिवा कुछ जानती ही नहीं थी। फूलों को, प्रकृति को देखकर उनकी सुंदरता से प्रभावित नहीं होती थी, माँ बनते ही कितना बदल गयी मैं! उसके दूध के बोतलों को स्टेरिलाइज करना, स्नान कराना, पाउडर लगाना और फिर उसे चुंबनों के सागर में डुबो देना। उसके लिये रंग-बिरंगे कपड़े खरीदना, गालों पर दिठौनी लगाना, शाम होते ही उसे सैर कराना…

उसे पाठशाला में भर्ती कराना, नयी पुस्तकें खरीदना, उन पर जिल्द चढ़ाना, ओह! सोचकर ही आश्चर्य होता है। क्या कहें उन दिनों को? मेरे जीवन का स्वर्णयुग कहूँ… उन दिनों, प्रतिदिन, प्रति घंटा, प्रति मिनट, मैंने जो कुछ किया, वह सब याद है मुझे। उसके पैदा होने के बाद सारी दुनिया से, सब लोगों से मेरा संबंध ही कट गया। उसका भी यही हाल था। जब तक घर में रहता मेरी उँगली नहीं छोड़ता। मेरे पीछे-पीछे घूमते हुए पता नहीं कैसे-कैसे प्रश्न पूछता। और मैं उसके हर प्रश्न का उत्तर देती।

एक बार उसे लेकर मैं अपने मायके चली गयी।
"अम्मा, हम कहाँ जा रहे हैं?"
"गाँव"
"कौन से गाँव?"
"नाना जी के गाँव"
"क्यों?"
"त्यौहार के लिये, संक्रांति त्यौहार है न! इसलिये।"
"फिर कब लौटेंगे?"
"त्यौहार हो जाने के बाद"
त्यौहार कब हो जाएगा?"
इस प्रकार चार घंटे लगातार हम लोग बातें करते रहे। बस से उतरने के लिये जैसे ही सर उठाकर देखा, तो क्या है…? बस में बैठे सभी यात्री हमारी ही ओर देख रहे थे.. मुस्कुराते हुए। अब उन बातों को सोचती हूँ तो शर्म आती है। लेकिन तब "मेरा बेटा ही मेरा सर्वस्व है" - के गर्व के साथ बस से उतरी थी।

मुझे लगता था कि उसके प्रश्न का उत्तर न देने पर वह नाराज हो जाएगा। बच्चों के मनोभावों पर, उनके फीलिंग्स पर कोई भाषण सुनकर मुझे डर लगता था। सोचती थी - "क्या मैं उसका पालन-पोषण ठीक से कर रही हूँ ?" जब वह बहुत छोटा था तब उसने एक प्रश्न किया था "अम्मा चाँद रात में ही क्यों आता है?" क्या उत्तर देती? न मैंने किसी साहित्य का अध्ययन किया था और न ही बड़ी बुद्धिमती थी।

“चाँद को रात बहुत प्यारी लगती है - बहुत पसंद है, इसलिये" कुछ सोचकर बताया था मैंने। उस समय मेरी बुद्धि के अनुसार यही ठीक उत्तर था। लेकिन उसके बाद कई बार मैंने सोचा। कितना घटिया उत्तर दिया था मैंने ! वही अच्छी, बुद्धिमती माता होती तो शायद और भी बढ़िया उत्तर देती। अभी से यह हाल है, जैसे-जैसे बड़ा होगा तो इसके संदेह कैसे होंगे और प्रश्न कैसे होंगे? उनका मैं क्या उत्तर दूँगी? यह सोचकर मैं डर जाती थी। लेकिन उसके पच्चीस वर्ष पूरे होने तक हमारा बंधन ऐसे ही बना रहा। अब तो उसका एक बेटा भी है - 'हेमंत'।

देखो, अब.. इतने वर्षों के बाद.. बेटा... बहू... मुझ से ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे इनको मेरी जरूरत ही नहीं है। वे तो मुझे अनाड़ी समझते हैं। उनके इस व्यवहार से मुझे बड़ा दुःख पहुँचता है। 'पागल' - 'बुद्धू' उनका तकिया कलाम है मेरे लिये। ठीक ही है, उनके और मेरे सोचने के ढंग में जमीन-आसमान का अंतर है। वे तो इन पच्चीस -तीस वर्षों में गृहस्थी की हर छोटी-सी जिम्मेदारी को मेरे कंधों पर डाल कर निश्चिंत हो गये। स्वयं, विभिन्न ग्रंथों का अध्ययन कर... अपने ज्ञान भंडार को भरते रहे, और मैं, सुमंत, उनका घर, उनकी आवश्यकताएँ, इन्हीं को अपना सर्वस्व मानकर जीती रही।

इसी कारण मुझे उनका "पागल' -'बुद्धू' कहना कभी बुरा नहीं लगा, लेकिन सुमंत की उपेक्षा मुझे पीड़ा पहुँचा रही थी। दफ्तर में उसके एक से बढ़कर एक दोस्त, घर में मेधावी पिता, बतियाने के लिये पत्नी, अब माँ से क्या काम? हर किसी से चिढ़-सी होने लगी थी मुझे...मनुष्यों से ही नहीं, भगवान से भी। कहते हैं अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करनेवालों से भगवान प्रसन्न होते हैं। मैंने अपना उत्तरदायित्व सदा ही श्रद्धा से निभाया है। तब, इस बुढ़ापे में उन्होंने मुझे दिया ही क्या? तिरस्कार और… एकांत…।

जीवन-भर पुस्तक-पठन में ही समय बिताने के कारण, अच्छी पुस्तकों की रचना कर जग को भेंट करने के कारण, मेरे पति को संसार ने सम्मानित किया "मेधावी" की उपाधि से। मैंने भी तो जीवन-भर एक संतान को अपना अपूर्व-प्रेम प्रदान कर एक वैज्ञानिक बनाकर जग को सौंपा है। मेरी क्या पहचान है? काम-से-काम मेरे बेटे की ओर से। बेटा, बहू, पोता, सभी लोग टी.वी. देखते रहते हैं और वे पुस्तकें पढ़ते रहते हैं। अब मेरा काम...अकेली बैठकर इन देवताओं के चित्रपटों को देखना और इनसे प्रश्न करना "हे भगवान, मुझे ऐसा एकाकी क्यों बना दिया?" यही मेरी दिनचर्या है। शेष जीवन में अनुसरण किया जानेवाला टाइम टेबल। वास्तव में इस भगवान से भी मैं क्यों बात करती हूँ?

एक लड़की सपने देखने के अलावा अन्य सभी बातों से अनजान होनेवाली, माँ बनकर तबसे अपने आपको भूलकर, माँ के सिवाय अपने सारे अस्तित्वों को भूलकर, माँ बनकर सेवा करने के सिवाय जैसे उसका कोई निजी जीवन ही नहीं ऐसे सारा जीवन बिताकर, उस तपस्या के बदले भगवान से क्या उपहार प्राप्त हुआ उसे? एकाकीपन, भयंकर एकाकीपन…।

मेरी आँखों में आँसू भर आये... आँखों के सामने बालगोपाल की मूर्ति अस्पष्ट दिखाई दे रही थी… और उसके होंठों पर शरारत भरी मुस्कुराहट थी। तभी हॉल में से कोई आवाज सुनाई दी। पता नहीं क्यों हेमंत लगातार रोए जा रहा था। उसके रोने के साथ-साथ न जाने क्यों सुमंत भी किसी बात को लेकर चीख़ रहा था। मेरे उठने से पहले ही हेमंत दौड़ता हुआ मेरे पास आ गया। उसके पीछे-पीछे मेरे पति, सुमंत और बहू… ।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"बेवकूफ" खीझकर कहा सुमंत ने। "चाँद रात में ही क्यों आता है? -यह उसका प्रश्न है। क्या बताऊँ उसे? 'तुझे मालूम नहीं' कहने पर चीख-चीखकर रो रहा है।"
मेरे पति ने कुछ कहना चाहा। "चाँद रात के समय इसलिये आता है… क्यों कि जब धरती घूमती है… तब… " इतना कहकर वे बगलें झाँकने लगे।

हेमंत ने सबकी ओर निराश होकर देखा और मेरी गोद में बैठते हुए कहा "दादी माँ, तुम बताओ।"
मैंने उसे अपने पास खींचकर बिठाते हुए कहा…
"क्योंकि चाँद को रात बहुत पसंद है… इसलिये।"
मेरा उत्तर सुनकर उसकी आँखें चमक उठीं।
"सच!" उसने कहा।
सबके चेहरे पर मुस्कुराहट फैल गयी। मुझे पता था कि यह मेरा मजाक है। मेरे मूर्खतापूर्ण समाधान को सुनकर सब लोग हँसते हुए चले गये। मुझसे लिपटते हुए हेमंत ने कहा "दादी माँ, इन सबको, किसी को, कुछ भी नहीं मालूम… इनसे मैं कभी बात नहीं करूँगा।"
तब अचानक मेरी समझ में आ गया कि भगवान ने मुझे क्या उपहार दिया।

 

१ दिसंबर २०१५

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