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व्यक्तित्व

अभिव्यक्ति में
माधवराव सप्रे की 
रचनायें  

गौरव गाथा में
कहानी
एक टोकरी भर मिट्टी

 


माधवराव सप्रे  

माधवराव सप्रे का जन्म दमोह जिले के पथरिया गांव (मध्य प्रदेश) में 19 जून सन् 1871 में हुआ। पथरिया गांव एक जंगली गांव है, जहां की जमीन पथरिया नाम के अनुरूप ही पथरीली है। उनकी मातृभाषा मराठी थी।  

प्रारम्भिक शिक्षा घर में। सन् 1887 में मिडिल स्कूल की शिक्षा पूरी की। उसी सन् 1887 में वे रायपुर हाईस्कूल में दाखिल हुए। यहीं उनका सम्पर्क नंदलाल दुबे से हुआ जो उस हाईस्कूल में हेड असिस्टेंट मास्टर थे। दुबे जी ने ही उन्हें साहित्य की ओर प्रेरित किया।

सन् 1889 में माधवराव सप्रे का विवाह हुआ और उन्होंने सन 1890 में एन्ट्रेस की परीक्षा पास की। इसके बाद वे एफ ए की पढ़ाई के लिए गवर्नमेंट कालेज, जबलपुर, में भर्ती हुए और उन्होंने ग्वालियर के विक्टोरिया कालिज में भी अध्ययन किया और अन्ततः सन् 1896 में उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की एफए की परीक्षा पास की।

सप्रे जी ने शुरू से ही यह तय कर लिया था कि वे सरकारी नौकरी नहीं करेंगे और वकील बनकर स्वतन्त्र रहेंगे और देशसेवा करेंगे। एलएलबी का अध्ययन करने के बावजूद वे वकालत की परीक्षा में शामिल नहीं हुए। अंततः सन् 1899 में वे पेंडरा राज्य के राजकुमार को अंग्रेजी पढ़ाने के लिए शिक्षक बन गये, ताकि नौकरी से पैसा कमा के वे एक हिन्दी पत्र निकाल सकें।

सन् 1900 में 'छतीसगढ़ मित्र' (मासिक) का प्रकाशन। इसकी विशेषता यह थी की आम बौद्धिकोंशिक्षितों के लिए इसका मूल्य डेढ़ रूपया था, विद्यार्थियों और पुस्तकालयों के लिए सवा रूपया और राजामहाराजाओं तथा श्रीमान जमीदारों के लिए पांच रूपया।

'छतीसगढ़ मित्र' के प्रकाशन से उनकी जो साहित्य यात्रा शुरू हुई वह अबाध है। मौलिक लेखन, सम्पादन, अनुवाद और हिंदी गद्य की भाषा का परिमार्जन तथा हिंदी समीक्षा की शुरूआत आदि तमाम महत्वपूर्ण साहित्यिक कामों में वे लगे रहे।

वे स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी भी रहे और बाल गंगाधर तिलक के अनन्य शिष्य। 'गीता रहस्य' , 'दास बोध', 'कौंटिल्य का अर्थशास्त्र' आदि तेरह ग्रंथों का उन्होंने हिंदी अनुवाद किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में 'छतीसगढ़ मित्र' के अलावा उन्होंने ' हिंदी केसरी' तथा अन्य दो पत्रों का सम्पादन किया।

सन् 1924 में अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन, देहरादून अधिवेशन की उन्होंने अध्यक्षता की। उनका निधन 1926 में हुआ। हिंदी पुस्तक समीक्षा (बुकरिव्यू) का शुभारम्भ करने वाले इस साहित्य साधक को सहज ही हिंदी की प्रथम मौलिक कहानी लिखने का श्रेय भी सौंपा जा सकता है।

 
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