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नंदलाल
बोस
नन्दलाल बसु (३ दिसम्बर १८८२ – १६ अप्रैल १९६६) भारत के
आधुनिक कलाकारों में अग्रणी थे। वे आधुनिक भारतीय कला के
जनक माने जाते हैं। भारतीय संविधान के २२१ पन्नों के
दस्तावेज में उन्होंने संविधान के हर भाग के आरम्भ में
८x१३ इंच के २२ चित्र बनाए। १९३० में नमक सत्याग्रह के
दौरान उन्होंने गाँधी जी के सफेद लिनोकट प्रिंट पर काली
आकृति बनाई जो काफी चर्चित रही।

नंदलाल बोस का जन्म बिहार के मुंगेर जिले के हवेली खडगपुर
गाँव में स्थापत्य शिल्पी पूर्णचंद्र बोस और क्षेमाणी के
घर हुआ। पैतृक गाँव बंगाल के हुगली में था। पूर्णचंद्र बोस
ऑर्किटेक्ट तथा दरभंगा के महाराजा की रियासत के प्रबन्धक
थे। उन्होंने १९०५ से १९१० के बीच कलकत्ता गवर्नमेंट कॉलेज
ऑफ़ आर्ट में अबनीन्द्ननाथ ठाकुर से कला की शिक्षा ली,
इंडियन स्कूल ऑफ़ ओरियंटल आर्ट में अध्यापन किया और १९२२
से १९५१ तक शान्तिनिकेतन के कलाभवन के प्रधानाध्यापक रहे।
वे टैगोर परिवार और अजंता के
भित्ति चित्रों से प्रभावित थे, उनकी उत्कृष्ट कृतियों में
भारतीय पौराणिक कथाओं, महिलाओं और ग्रामीण जीवन के दृश्यों
के चित्र शामिल हैं।
१९३० के दशक में उनकी रचनाओं
में आकृतियों से परिदृश्य चित्रण की ओर बदलाव आया। विभिन्न
शैलियों को अपनाते हुए, बोस ने टेम्पेरा चित्रों की एक
शृंखला बनाई, जिन पर उत्तर-प्रभाववादी और अभिव्यंजनावादी
चित्रणों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। भारतीय
राष्ट्रीय कांग्रेस की बैठकों के लिए उनके 'पोस्टर' और
अन्य कलाकारों के साथ मिलकर भारत के संविधान के लिए बनाए
गए उनके चित्रों ने भारत के लिए एक नई कला के निर्माण में
उनके योगदान को मान्यता दी।
वे
टैगोर परिवार और अजंता के भित्ति चित्रों से प्रभावित थे,
उनकी उत्कृष्ट कृतियों में भारतीय पौराणिक कथाओं, महिलाओं
और ग्रामीण जीवन के दृश्यों के चित्र शामिल हैं। आज, कई
आलोचक उनके चित्रों को भारत के सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक
चित्रों में गिनते हैं। १९७६ में, भारत सरकार के संस्कृति
विभाग के भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने उनकी कृतियों को उन
"नौ कलाकारों" में शामिल किया, जिनकी कृतियों को, "पुरातन
वस्तु न होने के कारण", उनके कलात्मक और सौंदर्य मूल्य को
ध्यान में रखते हुए "कला खजाने" के रूप में माना जाना था।
चित्रकारी और कला अध्यापन के अतिरिक्त उन्होंने तीन
पुस्तकें रूपावली, शिल्प कला और शिल्प चर्चा भी लिखीं और
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान
दिया।
उन्होंने हरिपुरा के आसपास के गाँव का दौरा किया और
ग्रामीण भारत के जीवन को दर्शाते हुए कुछ आर्ट कैनवास
बनाये। इस अनमोल कलाकारी की २०१९ में प्रसिद्ध कला
प्रदर्शनी वेनिस बिनाले में जबरदस्त चर्चा हुई थी।
१ जुलाई २०२५
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