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शहर
में नए साल का स्वागत हमेशा शोर से होता है। रात के ठीक
बारह बजे पटाखों की आवाज़ें आसमान को चीरने लगती हैं,
आतिशबाजियों के छूटते ही अँधेरा डर कर सिमट जाता है।
सड़कों पर गाड़ियों के हॉर्न, बालकनियों से उड़ती हँसी,
मोबाइल पर आती शुभकामनाओं की कतार—सब मिलकर यह साबित करने
में लगे रहते हैं कि समय बदल गया है।
वह खिड़की के पास खड़ी थी।
यह वही खिड़की थी जिसके पास खड़े होकर उसने साल भर मौसम
देखे थे—बारिश की पहली बूँद, धूप की थकी किरणें, धुंध में
लिपटी सुबहें। आज वही खिड़की नए साल का गवाह बनने वाली थी।
बाहर रंगीन आतिशबाज़ी खिल रही थी, और भीतर कमरे में हल्का
सा अँधेरा था—साफ़, शांत, लगभग अनसुना।
दीवार पर टँगा कैलेंडर अभी भी पुरानी तारीख़ दिखा रहा था।
उसने हाथ बढ़ाकर उसे पलटना चाहा, फिर रुक गई। अचानक लगा कि
साल को यों जल्दी विदा करना ठीक नहीं। हर साल की तरह यह
साल भी चुपचाप नहीं गया था। इसने बहुत कुछ दिया था—कुछ
यादें, कुछ चोटें, कुछ ऐसे वाक्य जो मन में अटक गए और कभी
पूरे नहीं हो पाए।
मोबाइल फिर बजा। “नया साल मुबारक हो।”
उसने स्क्रीन देखी, मुस्कराई और मोबाइल साइलेंट पर रख
दिया।
उसे याद आया—पिछले साल भी उसने कई संकल्प लिए थे। ज़्यादा
लिखने का, कम शिकायत करने का, अपने लिए समय निकालने का।
कुछ पूरे हुए, कुछ अधूरे रह गए। कुछ संकल्पों का बोझ ऐसा
था कि पूरा साल उन्हें ढोते-ढोते थक गई थी। आज उसने तय
किया—इस बार स्वयं से कोई भारी वादा नहीं करेगी।
घड़ी ने बारह बजाए।
बाहर शोर और तेज़ हो गया। खिड़की के शीशे थरथराए। उसने
धीरे से खिड़की खोली। ठंडी हवा भीतर आई और कमरे में जैसे
कुछ बदल-सा गया। उस हवा में न कोई माँग थी, न कोई शर्त। बस
एक नई शुरुआत की सादगी थी।
उसने कैलेंडर पलटा।
नई तारीख़ सामने थी—साफ़, उजली, बिना किसी टिप्पणी के। उसे
लगा जैसे नया साल उससे कुछ कह रहा हो—“पुराना सब भूलने को
नहीं कहता हूँ, बस उसे बोझ मत बनने देना।”
उसने खिड़की के बाहर देखा। आतिशबाज़ी अब भी थी, पर उसकी
चमक कम हो चली थी। बाहर का शोर धीरे धीरे कम हो रहा था।
उसे एहसास हुआ कि नया साल शोर में नहीं, उस छोटे से निर्णय
में होता है—खुद के साथ ईमानदार रहने के निर्णय में।
उसने कोई संकल्प नहीं लिया।
बस अपने भीतर एक जगह बनाई—थोड़ी उम्मीद, थोड़ी करुणा और
बहुत-सी साँस लेने की जगह के लिए।
नया साल चुपचाप भीतर आ गया।
१ जनवरी
२०२६ |