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दोपहर
जैसे जल रही थी। हवा भी मानो थककर कहीं छुप गई थी।
राघव दरवाज़ा खोलकर अंदर आया—कंधे झुके हुए, चेहरा
तपता हुआ।
“माँ… बहुत गर्मी है…” उसने धीमे से कहा।
रसोई से माँ की आवाज़ आई—“बैठो, अभी लाई…”
कुछ ही देर में वे एक काँच के गिलास में आम का पना लेकर
आईं। गिलास के किनारों पर जमी
हल्की-सी भाप, जैसे अपने भीतर ठंडक का कोई राज़ छुपाए हो।
राघव ने गिलास थामा। पहला घूँट जैसे सीधे दिल तक
उतर गया। आँखें अपने आप बंद हो गईं।
“माँ… बिल्कुल बचपन जैसा स्वाद है…”
माँ हल्के से मुस्कुराईं—“क्योंकि वही हाथ हैं… और वही
इंतज़ार भी।”
राघव ने माँ की ओर देखा।
उन्हीं आँखों में वही पुरानी छाया थी—चिंता, स्नेह, और
बिना कहे समझ लेने वाली शांति।
“याद है माँ,” वह बोला, “जब मैं खेलकर आता था, आप ऐसे ही
पना देती थीं… और कहती थीं ‘सारी थकान उतर जाएगी।”
माँ ने धीमे से सिर हिलाया—“तब तुम गिरते थे तो घुटना
छिलता था… अब ज़िंदगी छील देती है।”
राघव कुछ पल चुप रहा। फिर गिलास को दोनों हाथों से पकड़ लिया—जैसे सिर्फ पना
नहीं, कुछ और थाम लिया हो। उसने महसूस किया— इस खट्टे-मीठे स्वाद में सिर्फ कच्चे आम
नहीं हैं…इसमें माँ के हाथों की ठंडक है, उनके इंतज़ार की
छाँव है, और वह सुकून है, जो दुनिया कहीं और नहीं देती।
बाहर धूप अब भी उतनी ही तेज़ थी—
पर भीतर, एक गिलास पने ने मौसम बदल दिया था।
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