मुखपृष्ठ

पुरालेख-तिथि-अनुसार -पुरालेख-विषयानुसार -हिंदी-लिंक -हमारे-लेखक -लेखकों से


लघुकथाएँ

लघुकथाओं के क्रम में महानगर की कहानियों के अंतर्गत प्रस्तुत है
पूर्णिमा वर्मन की लघुकथा- एक गिलास ठंडक


दोपहर जैसे जल रही थी। हवा भी मानो थककर कहीं छुप गई थी। राघव दरवाज़ा खोलकर अंदर आया—कंधे झुके हुए, चेहरा तपता हुआ।
“माँ… बहुत गर्मी है…” उसने धीमे से कहा।
रसोई से माँ की आवाज़ आई—“बैठो, अभी लाई…”

कुछ ही देर में वे एक काँच के गिलास में आम का पना लेकर आईं। गिलास के किनारों पर जमी हल्की-सी भाप, जैसे अपने भीतर ठंडक का कोई राज़ छुपाए हो। राघव ने गिलास थामा। पहला घूँट जैसे सीधे दिल तक उतर गया। आँखें अपने आप बंद हो गईं।

“माँ… बिल्कुल बचपन जैसा स्वाद है…”
माँ हल्के से मुस्कुराईं—“क्योंकि वही हाथ हैं… और वही इंतज़ार भी।”
राघव ने माँ की ओर देखा।
उन्हीं आँखों में वही पुरानी छाया थी—चिंता, स्नेह, और बिना कहे समझ लेने वाली शांति।

“याद है माँ,” वह बोला, “जब मैं खेलकर आता था, आप ऐसे ही पना देती थीं… और कहती थीं ‘सारी थकान उतर जाएगी।”
माँ ने धीमे से सिर हिलाया—“तब तुम गिरते थे तो घुटना छिलता था… अब ज़िंदगी छील देती है।”
राघव कुछ पल चुप रहा। फिर गिलास को दोनों हाथों से पकड़ लिया—जैसे सिर्फ पना नहीं, कुछ और थाम लिया हो। उसने महसूस किया— इस खट्टे-मीठे स्वाद में सिर्फ कच्चे आम नहीं हैं…इसमें माँ के हाथों की ठंडक है, उनके इंतज़ार की छाँव है, और वह सुकून है, जो दुनिया कहीं और नहीं देती। बाहर धूप अब भी उतनी ही तेज़ थी—
पर भीतर, एक गिलास पने ने मौसम बदल दिया था।

१ मई २०२६

1

1
मुखपृष्ठ पुरालेख तिथि अनुसार । पुरालेख विषयानुसार । अपनी प्रतिक्रिया  लिखें / पढ़े
1
1

© सर्वाधिका सुरक्षित
"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक
सोमवार को परिवर्धित होती है।