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एकालाप

एकालाप के क्रम में लघुकथों के अंतर्गत प्रस्तुत है
निवेदिता श्रीवास्तव निवि का एकालाप- आत्मबोध


अहा केशव! आज सुबह-सुबह पांचजन्य की ध्वनि सुना कर तुमने मुझको शुभ संदेश दिया था और मैंने भी तुमको गंगनाभ की ध्वनि से प्रणाम किया था। तभी आभास हो गया था कि आज महाभारत के दसवें दिन कुछ विशेष करोगे तुम।

सनातनी परम्परा के अनुसार दसवाँ दिन, अर्थात मन की मुक्ति का दिन ... इसीलिए तुमने मेरे प्रिय अर्जुन के रथ का सारथी, स्त्री रूपधारी शिखंडी को बनाया और अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार निःशस्त्र हो गया था मैं। कभी तो अपने कर्मो के फल के सम्मुख समर्पण करना ही था मुझको।

शिखंडी की ओट से, अर्जुन के गाण्डीव से छूट कर मेरे शरीर में विश्राम करता प्रत्येक बाण मानो मुझसे हर उस पल का हिसाब माँग रहा था, जब-जब अपनी प्रतिज्ञा और राजधर्म का वास्ता देकर, चुप रहकर अपने साथ-साथ कुरु वंश को भी विनाश के दलदल में समाता गया। पितृ मोह में किये गए मेरे कृत्य ने ही मेरे लिए अपराध माला का निर्माण प्रारम्भ कर दिया था और मेरे शरीर में चुभे ये सारे बाण उन्हीं की याद दिला रहे हैं।

अपने पिता शांतनु का विवाह सत्यवती से करवाने के लिए आजन्म ब्रम्हचर्य की शपथ लेना, मुझको उस प्रजा का अपराधी बना गया, जिनके संवर्धन के लिए परमात्मा ने मुझको इस धरा पर भेजा था। अपने अनुज चित्रवीर्य एवं विचित्रवीर्य के विवाह के लिए काशी नरेश की तीनों पुत्रियों का अपहरण कर के हस्तिनापुर लाना और विवाह के लिए विवश करना, मेरी इस शरशय्या का मार्ग प्रशस्त करना ही था।

मैं सिर्फ़ यही तक नहीं रुका, अपितु ज्योतिहीन पौत्र धृतराष्ट्र का गांधारी से विवाह भी तो मैंने गांधार नरेश सुबल को विवश कर के ही किया था और उपहार में उसके पूरे जीवन को काँटों से भर दिया था।

आह! शरीर में चुभा हुआ यह तीर सबसे अधिक दाहक पीड़ा दे रहा है। तुम सोचोगे कि मुझ जैसा योद्धा इतनी पीड़ा अनुभव कर रहा है। पर जानते हो इस तीर को चलाते हुए अर्जुन के नेत्रों में उसकी आत्मा का आक्रोश ताण्डव कर उठा था क्योंकि यह मेरे पूरे जीवन का सबसे बड़ा पाप था कि उस द्यूत-सभा में शकुनि की बिछाई चौसर को मैंने क्यों नहीं रोका .... युधिष्ठिर के द्वारा द्रौपदी को दाँव पर क्यों लगने दिया! इतनी सामर्थ्य होते हुए भी उस के चीर-हरण को रोक कर हस्तिनापुर की अस्मिता को क्यों नहीं बचा लिया? सच कहूँ तो अपनी इस चुभन देती अन्तिम शय्या का चुनाव उसी पल कर लिया था मैंने।

कुरुक्षेत्र की यह धरती... क्या कहूँ इसको... बहुत पावन कहूँ या घातिनी है कहूँ, सुरसा के समान न जाने कितने राजवंशों को, उनके नौनिहालों को उदरस्थ कर गयी... और मुझ जैसे हतभागे अस्त्र-शस्त्र के चक्रव्यूह में उलझे व्यक्ति, उनको इस युद्ध यज्ञ की समिधा बनाते गए।

इतना विनाश देख कर भी अपने वरदान की सामर्थ्य से अपने प्राण नहीं निकलने दे रहा हूँ केशव ... जानते हो क्यों? अपने इस जन्म की सारे पाप कर्मो के फ्लस्वरूप अपने कुरु-वंश का समूल नाश भी तो देखना है मुझको ...
अभी तुम मेरे सम्मुख नहीं हो परन्तु सूर्य के उत्तरायण में आ जाने पर, तब साँसों के बंधन से मुक्ति देने आ जाना माधव!

१ अगस्त २०२६

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