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लंदन
की शामें अक्सर सर्द होती हैं, पर आज मेघा को शहर कुछ
ज़्यादा ही ठंडा लग रहा था। पिछले दो सालों से वह यहाँ
सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम कर रही थी। ऑफिस में
अंग्रेज़ी, सुपरमार्केट में अंग्रेज़ी, पड़ोसियों से अंग्रेज़ी
– जीवन का हर पल एक विदेशी धुन में बज रहा था। उसे अपनी
मातृभाषा, हिंदी, में खुलकर बात किए हुए उसे एक युग बीत
गया था। कभी-कभी माँ को फ़ोन करती, तो कुछ पल की राहत
मिलती।
आज शाम वह ग्रोसरी स्टोर से दूध और अंडे लेने आई थी। लंबी
कतार में खड़े-खड़े उसकी आँखें आस-पास घूम रही थीं। तभी,
उसके कानों में एक परिचित ध्वनि पड़ी। "ये मिर्च ज़्यादा
तीखी तो नहीं होंगी?"
मेघा के पूरे शरीर में जैसे बिजली सी दौड़ गई। शुद्ध,
निर्दोष हिंदी! वह तेज़ी से आवाज़ की दिशा में मुड़ी। एक अधेड़
उम्र का व्यक्ति, शायद उसकी माँ की उम्र का, मिर्च के
पैकेट को गौर से देख रहा था। उसके चेहरे पर वही असमंजस था,
जो अक्सर खरीदारी करती भारतीय गृहिणियों के चेहरे पर होता
है।
मेघा का दिल खुशी से उछल पड़ा। बिना कुछ सोचे, वह उसके पास
गई और बड़े संकोच से पूछा, "नमस्ते अंकल, आप भारतीय हैं?"
उस व्यक्ति ने चौंका कर देखा, फिर उसके चेहरे पर एक हल्की
मुस्कान आ गई। "हाँ बेटी। आप भी?"
"जी हाँ!" मेघा की आवाज़ में इतनी खुशी थी कि उसे अपने
भारतीय होने पर यकीन ही नहीं हुआ। मैं यहाँ दो साल से हूँ,
आज पहली बार किसी को हिंदी में बात करते सुना है।"
"मैं प्रकाश हूँ अपनी बेटी के पास कुछ महीनों के लिए आया
था।" बातों ही बातों में पता चला कि वे दोनों एक ही इलाके
में रहते हैं, बस दो गलियों का फ़ासला है। सुपरमार्केट की
कतार कब खत्म हुई, उन्हें पता ही नहीं चला। वे दोनों
ग्रोसरी स्टोर से बाहर आ चुके थे, और बातों का सिलसिला अभी
भी जारी था।
"आज शाम आप चाय पर हमारे घर आइएगा," प्रकाश अंकल ने सहर्ष
न्योता दिया। "मेरी बेटी को भी बहुत ख़ुशी होगी आपसे
मिलकर।"
मेघा की आँखों में चमक आ गई। "जी, ज़रूर! मुझे बहुत अच्छा
लगेगा।"
उसे एक पल में सिर्फ एक दोस्त नहीं, बल्कि अपनेपन का एक
अहसास मिला था, जो उसने लंबे समय से महसूस नहीं किया था।
आज लंदन उसे इतना ठंडा नहीं लग रहा था। आज उसे यहाँ अपनेपन
की गर्माहट महसूस हो रही थी।
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