|
वसंत
का मौसम था। खेतों में नई फसल की खुशबू तैर रही थी और पूरे
गाँव में उत्सव की हलचल शुरू हो चुकी थी। हर घर में
साफ-सफाई, रंगोली और भक्ति का रंग चढ़ा हुआ था। गाँव के एक
कोने में रहने वाली कुम्हार की बेटी रमा इस बार बहुत
उत्साहित थी। उसने तय किया था कि इस नवरात्र में वह खुद
अपने हाथों से माँ दुर्गा की मूर्ति बनाएगी।
रमा के पिता मिट्टी के बर्तन बनाते थे, पर इस बार उनके पास
काम कम था। घर की हालत भी ठीक नहीं थी। इसलिये उसने पिता
की मदद करने की ठानी। वह नदी किनारे से चिकनी मिट्टी लाई
और रोज़ स्कूल से लौटकर मूर्ति गढ़ने में लग जाती।
धीरे-धीरे मिट्टी का एक आकार बनने लगा—माँ की आँखें, उनके
हाथ, उनका सिंह… सब कुछ रमा के छोटे-छोटे हाथों में जैसे
जीवंत हो रहा था।
चैत्र नवरात्र में मूर्तियों वाले पंडाल की उतनी माँग होती
नहीं जितनी कि शारदीय नवरात्र में। एक दिन गाँव के कुछ लोग
वहाँ से गुज़रे। उन्होंने रमा की मूर्ति देखी और हँस पड़े—
“अरे, ये दुर्गा क्यों बना रही हो? यह चैत्र के नवरात्र
हैं, कोई पंडाल सजाने नहीं जा रहा है।”
रमा का मन टूट गया। वह उदास हो गई। उसने सोचा, “अगर मूर्ति
बन भी गयी तो शायद कोई खरीदेगा नहीं।”
उसकी आँखों में आँसू आ गए और उसने मूर्ति को ढँक दिया।
शाम को उसके पिता घर लौटे। उन्होंने रमा को उदास देखा और
कारण पूछा। रमा ने सब कुछ बता दिया।
पिता ने मुस्कुराते हुए कहा— “बिटिया, मूर्ति कोई खरीदे या
नहीं, यह तुम्हारे अभ्यास का समय है। अगर तेरे मन में
सच्ची श्रद्धा है, तो मूर्ति सुंदर बनेगी और उसे पंडाल में
सजाने वाले भी मिल ही जाएँगे।”
पिता की बात सुनकर रमा ने आँसू पोंछे और अगले दिन फिर से
मूर्ति के पास बैठ गई। इस बार उसने किसी बात की चिंता नहीं
की—बस अपने प्रेम और विश्वास से माँ का रूप पूरा किया।
शाय़द लगन इसी को कहते हैं। रमा मूर्ति को निहारे जा रही
थी। और मन ही मन बुदबुदा रही थी - "माँ मुझ पे कृपा करना,
माँ मुझ पे दया करना?"
धीरे धीरे नवरात्र का पहला दिन आया और उसकी मूर्ति तैयार
हो गयी। जो उसे देखता वही प्रशंसा करता। एक दिन दो गाँव
वाले आए और मूर्ति देखकर बोले- कितनी सुंदर प्रतिमा है
हमें पंडाल लगाकर पूजा के लिये स्थापना करनी चाहिये। गाँव
के अन्य लोग भी वहाँ इकट्ठा होने लगे। वे रमा की मूर्ति का
रूप रंग देखकर मुग्ध थे।
किसी ने कहा—“अत्यंत भक्ति से रची गयी है यह प्रतिमा!
कितनी भावपूर्ण दुर्गा माँ अवतरित हुई हैं! हमें पंडाल
बनाकर देवी की स्थापना करनी चाहिये।”
गाँव में पंडाल बना और रमा की बनाई हुई मिट्टी की दुर्गा
के सामने सबने सिर झुकाया।
रमा की आँखों में चमक थी— उसे मूर्ति का उचित मूल्य मिला
और पिता की सहायता करने की उसकी इच्छा पूरी हुई। |