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नेपाली
दुश्मन
“हटो ज़रा! मुझे झाड़ू लगानी है,” हमारे घर काम करने वाली सोलह
साल की नेपाली लड़की, पूनम ने आदेश दिया।
मैं 'सुपर मारियो ब्रदर्स' वीडियो गेम में पूरी तरह डूबा हुआ
था—१९८८ के जालंधर का हाई-टेक मनोरंजन।
“तंग मत करो, पेंचो,” मैंने आठ साल के बच्चे की पूरी तुनक के
साथ पंजाबी में उसे गाली दी। “मैं अपना फ़र्श ख़ुद साफ़ कर
लूँगा!”
मेरी गाली पूनम के लिए मुझे मुसीबत में डालने का सुनहरा मौक़ा
थी।
“आंटी! इधर आइए। राजू मुझे काम नहीं करने दे रहा, और उसने बहुत
गंदी गाली दी है।”
माँ रसोई से निकलीं, मुझे ज़ोर का थप्पड़ मारा, और फिर वापस
खाना बनाने चली गईं। मेरी आँखों में आँसू छलक आए और पूनम के
चेहरे पर विजयी मुस्कान फैल गई।
“साली पूनम!” मैं सिसकते हुए बोला। “मैं बदला लूँगा। मैं
तुम्हें सबक सिखाऊँगा!”
उसने जीभ चिढ़ाई और फिर से झाड़ू लगाने लगी।
“पेंचो पूनम, अपने ही देश में रहो—नेपाल में। यह इंडिया है!”
“मैं जहाँ चाहूँगी रहूँगी। तुम मुझे रोक नहीं सकते।”
उसने फिर जीभ चिढ़ाई—जो किसी काले नाग के डंक से भी ज़्यादा
चुभने वाली थी।
हमारी सरकारी हाउसिंग कालोनी के छोटे-छोटे घरों में भी कोई न
कोई कामवाली आ ही जाती थी—बर्तन माँजती, झाड़ू-पोंछा करती,
कपड़े धोती। इन ग़रीब महिलाओं को बहुत कम पैसे मिलते थे, लेकिन
भूख से बचने का यही एक साधन था। मेरे जैसा लड़का तब इस आर्थिक
व्यवस्था की जटिलता को नहीं समझ पाता था। मुझे ये कामगार लोग
हमारे घर में घुसपैठिए लगते थे। जब वे मुझसे कहते कि मैं हट
जाऊँ या जगह खाली करूँ—ख़ासकर जब मैं संगीत सुन रहा होता या
अपने कुत्ते जॉनी के साथ उछल-कूद कर रहा होता—तो मुझे बहुत
गुस्सा आता। माँ को घरेलू मदद की सख़्त ज़रूरत थी। वह एनीमिया
से पीड़ित थीं और उन्हें भयंकर एलर्जी थी। पानी, साबुन और
डिटर्जेंट के संपर्क में आते ही उनके हाथ सूज जाते और दर्द
करने लगते।
सुबह का काम निपटाने के बाद पूनम नाश्ता करती और हमारे बेडरूम
में टीवी देखती। मेरा और पूनम का रिश्ता कड़वे भाई-बहन के
झगड़े जैसा था। अगर मैं उसे ज़रा भी नीचा दिखाता, तो वह मुझे
चिढ़ा-चिढ़ाकर माँ से पिटवा देती। मेरा बड़ा भाई मेरी इस
परेशानी में कोई रुचि नहीं रखता था। वह ज़्यादातर घर से बाहर
आवारा-सा घूमता रहता।
मैंने अपने दोस्तों के बीच पूनम—जिसे मैं “दुष्ट नौकरानी” का
दर्जा दे चुका था—के ख़िलाफ़ एक तरह का दुष्प्रचार अभियान छेड़
दिया।
“वह साली पूनम,” मैंने रूबल कपूर से कहा, जो मुझसे चार साल
बड़ी थी। रूबल की माँ को डिप्रेशन और सिज़ोफ़्रेनिया जैसी
मानसिक बीमारियाँ थीं, जिन्हें समाज में कलंक माना जाता था।
बहुत से लोग मज़ाक करते कि वह पागल हैं, या उनमें भूत-प्रेत आ
गया है। इसी वजह से रूबल का परिवार आस-पड़ोस के लोगों से दूरी
बनाए रखता था। मैं उन गिने-चुने बच्चों में से था जो उनके
फ़्लैट में जा सकता था। रूबल और मैं एक-दूसरे पर भरोसा करने
लगे थे—अपनी निजी बातें और शिकायतें साझा करते थे। कितनी सुंदर
थी वह—बॉब कट में काले बाल, तीखे नैन-नक़्श। एक बार मैंने पूछ
लिया कि वह रंग गोरा करने की कौन-सी क्रीम इस्तेमाल करती है,
तो वह बहुत हँसी थी। मन ही मन, मैं उससे बहुत प्यार करने लगा
था। रूबल के सामने पूनम पर लगाए मेरे आरोप बड़े भोंडे लग रहे
थे।
“उस पेंचो पूनम को लगता है कि घर उसी का है और मुझे बेघर हो
जाना चाहिए!”
“राजू, गाली मत दो!” रूबल गुर्राई। “मेरी बेचारी माँ सुन लेंगी
और उन्हें फिर पैनिक अटैक आ जाएगा।”
रोआँसा होकर मेरे होंठ काँपने लगे, तो उसने सुझाव दिया, “एक-दो
घंटे उसे शांति से काम करने दो, जब तक वह चली न जाए।”
“रूबल, तुम समझती नहीं! वह मेरी दुश्मन है!”
मैं रूबल को कैसे समझाता कि पूनम से शांति करना मेरे लिए हार
मान लेने जैसा था—यह तो आख़िरी चीज़ थी, जो मैं चाहता था।
मेरे प्यारे पापा भी इस मामले में किसी काम के नहीं थे। जब भी
मैं उनसे पूनम की शिकायत करता, वे “द ट्रिब्यून” अख़बार से
नज़रें हटाकर मुझे काठमांडू और पशुपतिनाथ मंदिर की अपनी पुरानी
यात्राओं के क़िस्से सुनाने लगते। पापा बेहद आकर्षक व्यक्तित्व
के स्वामी थे। वे दफ़्तर के लिए बेहतरीन सूट पहनते थे। साहित्य
व कविता के प्रेमी थे। मैं अक्सर हैरान होता था कि इतने गुणी
और न्यायप्रिय होने के बावजूद, वे यह क्यों नहीं देख पा रहे थे
कि पूनम मुझे प्रताड़ित कर रही है।
गृहयुद्ध
एक दिन मैं अपने तीन कमरों वाले घर से सटे बगीचे में खड़ा,
पूनम से बदला लेने की योजना बना रहा था। सरकारी कर्मचारियों की
यह कालोनी शहर की भीड़-भाड़, कचरे और शोर-शराबे से दूर एक शांत
इलाक़े में थी। जॉनी पास आकर घास पर बैठ गया—शायद एकजुटता
दिखाने के लिए। वह सफ़ेद जापानी स्पिट्ज़ बगीचे की छिपकलियों
को भी दूर रखता था, जिनसे मैं डरता था। बसंती हवाओं में गुलाब
और गेंदे की ख़ुशबू घुली हुई थी। तितलियाँ और मधुमक्खियाँ
मंडरा रही थीं। एक फ़ाख़्ता ऊँचे पॉपलर के पेड़ पर बैठकर सब
देख रही थी। नीचे छोटी-छोटी गौरैयाँ झाड़ियों और क्यारियों के
बीच फुदक रही थीं। हमारे माली छेदी लाल (जो उत्तर प्रदेश से
थे) ने इस जगह को रंग-बिरंगे फूलों और सुगंधों का स्वर्ग बना
दिया था। उनकी नई देन थीं—लाल, पीले, सफ़ेद और नारंगी
स्नैपड्रैगन।
मैंने हाल ही में बाहर मुरझा रही एक शहतूत की पौध को बचाकर
बगीचे में अच्छी धूप वाली जगह पर रोपा था। छेदी लाल उसे
फलता-फूलता देखकर बेहद ख़ुश हुए—मुस्कुराकर सिर हिलाया, मानो
बता रहे हों कि मैं भी बाग़बानी की बिरादरी का ही हूँ।
“भौं-भौं!” जॉनी कालोनी की दीवार पर बैठी एक बड़ी धूसर बिल्ली
पर भौंका। हफ़्तों से मैं उसे उस चालाक जंगली बिल्ली को पकड़ने
की नाकाम कोशिशें करते देख रहा था। जब बिल्ली ने तिरस्कार भरी
नज़र से जॉनी को देखा, तो मुझे पूनम की याद आ गई। मैं
सब्ज़ियों की क्यारी—जिसमें पुदीना, बैंगन, भिंडी, टमाटर,
करेला और हरी-लाल मिर्च उगे थे—के पास टहलता रहा। बैंगनी
वायोला (जिन्हें छेदी लाल “तितली फूल” कहते थे) देखते हुए मेरे
दिमाग़ में पूनम से बदला लेने की एक ज़बरदस्त योजना सूझी। मैं
रसोई में गया। माँ उबलती दाल के बर्तन में चम्मच चला रही थीं।
वे गहरे हरे रंग की साड़ी में बेहद शालीन लग रही थीं। पंजाबी
महिलाओं के आम सलवार-कमीज़ के बजाय, वे घर में और सामाजिक
अवसरों पर ज़्यादातर साड़ी ही पहनती थीं।
“मम्मी, यह साड़ी बहुत सुंदर है!” मैंने सच-सच कहा।
माँ पिघल गईं। “हाँ, डिज़ाइन अच्छा है।”
उनका खिला चेहरा देखकर मैंने घोषणा की, “आज से घर का सारा काम
मैं करूँगा। फिर किसी पूनम जैसी को पैसे देने की ज़रूरत नहीं
पड़ेगी।”
“भाग यहाँ से! मैं बिज़ी हूँ!” उन्होंने मेरी शैतानी योजना
भाँप ली। वैसे भी उन्हें पता था कि मैं घर के काम में बिल्कुल
निकम्मा हूँ।
रविवार की सुबह दूरदर्शन पर 'रामायण' आती थी। पूनम हमारे
बेडरूम में बैठकर नाश्ता करते हुए पूरी श्रद्धा से देखती थी।
उसके लिए उस धारावाहिक का हर दृश्य पुण्य से भरा होता था। वह
कुर्सी पर बैठी राम और हनुमान को एकटक देखती, डिजिटल चमत्कारों
पर विस्मय से बुदबुदाती। मैं बिस्तर पर बैठकर उसके इस पवित्र
समय में खलल डालने का आनंद लेता। जब राम का कोई भावुक दृश्य
आता, मैं बेहूदा गाना गाने लगता।
“बंद करो!” वह झल्लाती। “मुझे शांति से देखने दो!”
“तो किसी और के घर जाकर देख लो,” मैं मुस्कुराकर सुझाव देता।
वह माँ को बुलाती। “आंटी! राजू मुझे 'रामायण' नहीं देखने दे
रहा!”
माँ मुझे मारने की धमकी देतीं और मैं चुप हो जाता। जैसे ही
पूनम फिर भक्ति-भाव में डूबती, मैं टीवी पर देवताओं को देखकर
अजीब-अजीब मुँह बनाता। १९८९ में दूरदर्शन पर राष्ट्रीय एकता का
गीत आता— “मिले सुर मेरा तुम्हारा…” विज्ञापनों के बीच यह गीत
चलता, अलग-अलग भाषाओं और नस्लों के लोग होंठ हिलाते दिखते।
मेरा पसंदीदा हिस्सा वह था जब पूर्वोत्तर भारत के लोग नाचते
दिखते। मैं चुटकी लेता—
“देखो! ये पूनम के भाई-बहन हैं!”
यह टिप्पणी उसे बहुत चुभती थी।
“आंटी!” वह चिल्लाती। “राजू मेरा मज़ाक उड़ा रहा है!”
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो अपनी निर्दयता और क्रूरता से
विचलित हो जाता हूँ। जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, दुनिया को समझा,
पूनम को देखने का नज़रिया भी बदल गया।
एक आपबीती
पूनम हमारे साथ एक साल से ज़्यादा रह चुकी थी।
मैंने जो शहतूत का पौधा लगाया था, वह मुझसे तीन गुना लंबा हो
चुका था और उसकी छतरी हरी-भरी थी। एक गिलहरी उस पेड़ पर
ऊपर-नीचे दौड़ना अपना खेल बना चुकी थी। एक-दो साल में मैं उसकी
मज़बूत डालियों पर बैठकर अपनी कालोनी के बाहर की गलियों को
निहार सकता था। कभी-कभी मम्मी, पूनम के काम करने के दौरान,
मुझे घर से बाहर भेज देती थीं। एक शाम मैं खेल के मैदान में दो
लड़कों के साथ इसी निष्कासन पर बड़बड़ा रहा था। विक्की मेरी ही
उम्र का था और काला हमसे तीन साल बड़ा। विक्की ने मुझ पर ज़रा
भी तरस नहीं खाया।
“अरे, कम से कम तुम्हारे घर में कामवाली तो है! मेरे पापा तो
बस सरकारी क्लर्क हैं। हमें अपना सारा काम ख़ुद करना पड़ता
है।”
“हाँ, तो क्या,” मैंने पलटकर कहा, “तुम्हारे पास दो बहनें हैं,
जिनकी मुफ़्त की मज़दूरी तुम रोज़ निचोड़ते हो। और तेरे जैसा
आलसी दिन-ब-दिन मोटा हो रहा है।”
विक्की ने मेरा कॉलर पकड़ लिया। “अरे पेंचो, मेरी बहनों को बीच
में मत ला।”
पल भर में हम सूखी घास और मिट्टी पर आपस में भिड़ गए। काला, जो
हमसे लंबा और मज़बूत था, उसने झगड़ा छुड़ाया। उसने हमसे हाथ
मिलवाया और पंजाबी मर्दों की एकजुटता पर लंबा भाषण दिया। हम
तीनों ज़मीन पर बैठ गए—ब्रूस ली और जैकी चैन की एक्शन फ़िल्मों
पर चर्चा करते हुए, मच्छरों के अनगिनत डंकों को सहते हुए।
सूरज ढलते ही साँझ गहराने लगी, और अँधेरे में पास की झाड़ी में
जुगनुओं की झिलमिलाहट दिखाई देने लगी। हवा में तले हुए प्याज़,
लहसुन, अदरक, जीरा, धनिया-बीज, गरम मसाला और ताज़ी रोटियों की
ख़ुशबू फैल रही थी। दूर आवारा कुत्ते भौंक रहे थे और अदृश्य
झींगुर अपनी तीखी टर्राहट से रात का ऐलान कर रहे थे।
प्लेग्राउंड के आसपास ट्यूब लाइटें टिमटिमाकर जल उठीं और सफ़ेद
रोशनी बिखेरने लगीं। चमगादड़ों का एक झुंड हमारे ऊपर झपट्टे
मार रहा था—ख़तरनाक रूप से क़रीब आता, फिर भी टकराता नहीं—जैसे
हमें वहाँ से चले जाने को कह रहा हो।
मैंने अपनी गुलाबी रबर स्ट्रैप वाली टाटा टाइटन घड़ी पर नज़र
डाली—पूनम की ड्यूटी ख़त्म होने ही वाली थी। मैं तेज़ी से घर
की ओर भागा। मेरे कमरे का रास्ता रसोई के दरवाज़े के पास से
होकर जाता था। घर में उस समय सिर्फ़ मम्मी और पूनम थीं, और वे
रसोई में किसी ज़रूरी बात पर चर्चा कर रही थीं। पूनम पर जासूसी
करने की मेरी आदत के कारण, मैं दरवाज़े के ठीक बाहर रुक गया।
इस बार मैंने सुना कि पूनम सड़कों पर होने वाले यौन उत्पीड़न
के बारे में बता रही थी। खाना पकने के शोर और चम्मच के बर्तनों
से टकराने की आवाज़ के बीच, मैं बातचीत के टुकड़े पकड़ पाया—जो
हमारे समाज में खुलेआम मौजूद स्त्री-विरोधी गंदगी को उजागर कर
रहे थे। सब कुछ पाँच मिनट के भीतर सुना—मेरा दिल तेज़ी से
धड़कने लगा, गला भर आया और त्वचा पर अजीब-सी झनझनाहट दौड़ गई;
ये ऐसी भावनाएँ थीं जिन्हें मैं पहचान नहीं पा रहा था। मैंने
झुककर एक पल के लिए देखा—पूनम एक छोटे स्टूल पर बैठी थी, दोनों
हाथों से चाय का कप थामे, उदास-सी; और मम्मी गैस वाले चूल्हे
के पास खड़ी थीं।
पूनम ने चाय की चुस्की ली और माँ से अपना दुख साझा करते हुए
कहा, “पिछले कुछ दिनों से ऐसा हो रहा है। जब मैं सड़क पर चलती
हूँ, तो लड़के—कारों, मोटरसाइकिलों और स्कूटरों पर—मेरा पीछा
करते हैं। वे मेरे शरीर के बारे में भद्दी बातें करते हैं,
मुझसे उनके साथ सोने का रेट पूछते हैं, और फिर हँसते हैं।”
माँ उसकी इस पीड़ा पर विचलित हो उठीं और गुस्से में बुदबुदाते
हुए गालियाँ देने लगीं— “हरामज़ादे! गंदे कुत्ते!” मैं पूनम की
आपबीती को बॉलीवुड की बिगड़ी हुई समझ के भीतर फ़िट करने की
कोशिश कर रहा था। जब कुछ गुंडे हीरो की बहन या प्रेमिका को
सताते थे, तो हीरो चाकू या गोली से उन्हें सज़ा देता था और हम
ताली-सीटी बजाते थे। लेकिन जब वही हीरो किसी लड़की के साथ ऐसी
हरकत करता, तो उसे रोमांटिक मानकर हम हँस देते थे।
पूनम सड़कों पर पैदल चलती थी, क्योंकि उसके पास अलग-अलग घरों
में काम करने के लिए साइकिल तक ख़रीदने के पैसे नहीं थे। उसकी
नेपाली शक्ल उसे और भी असुरक्षित बना देती थी। भारत में नेपाली
महिलाओं की तस्करी आम बात थी। आने वाले दिनों में मैं इन तमाम
जानकारियों की कड़ियाँ जोड़ता गया—और पूनम ने जो कुछ माँ से
कहा था, उसका सच मेरे दिमाग़ में और भी भयावह होता चला गया।
माँ और पूनम की आवाज़ें सुनकर जॉनी गलियारे में आ गया और मुझे
वहाँ खड़ा देखकर चौंक गया। मैंने गंभीर चेहरा बनाकर उसे चुप
रहने का इशारा किया, और उसने अपनी गर्दन तिरछी करके मुझे
हैरानी से देखा।
उधर मम्मी पूनम को सावधान रहने की सलाह दे रही थीं और कह रही
थीं कि आगे से ऐसी घटनाएँ हों, तो वह उन रसूखदार लोगों को बताए
जिनके यहाँ वह काम करती है। सीधे पुलिस के पास जाना बेकार
था—वे उसे हल्के चरित्र की औरत समझकर हँस देते। मम्मी ने नल
खोलकर चम्मच धोया। पूनम ने चाय ख़त्म की और कुछ देर की भारी
चुप्पी के बाद जाने के लिए उठी। जॉनी भौंकता हुआ मुझ पर
खेल-खेल में झपटा, जिससे रसोई में मौजूद दोनों का ध्यान मेरी
ओर चला गया। मैंने अपनी घबराहट छुपाने के लिए बनावटी खाँसी की
और सीधा अपने कमरे की ओर बढ़ गया। उस रात और उसके बाद कई दिनों
तक, मैं जो कुछ सुन चुका था उसी के बारे में सोचता रहा—बिना
किसी से एक शब्द कहे।
नया दौर
अगले कई हफ़्तों तक मैं यही सोचता रहा कि और कितनी लड़कियों के
साथ ऐसा होता होगा। क्या मेरी प्यारी रूबल को भी कभी ऐसा
उत्पीड़न सहना पड़ा होगा? यह इतना असहज सवाल था कि मैंने रूबल
से कभी पूछने की हिम्मत नहीं की। मैं पूनम की लाचारी और
असुरक्षा को अब पूरी तरह महसूस कर चुका था। बचपन की कड़वाहट और
प्रतिद्वंद्विता पीछे छूट गई थी। मैंने पूनम को अपनी बड़ी बहन
और दोस्त की तरह देखना शुरू कर दिया—एक ऐसी भावना, जो समय के
साथ और गहरी होती गई।
पूनम और मैं कला और कहानियों के ज़रिये एक-दूसरे से जुड़े। उन
दिनों भारत में मनोरंजन का मतलब मुख्य रूप से दूरदर्शन के
कार्यक्रम, बॉलीवुड फ़िल्में और रेडियो या ऑडियो कैसेट पर बजने
वाले गाने ही हुआ करते थे। एक बार मैं अपने कमरे का दरवाज़ा
आधा बंद करके, स्टीरियो पर बजती बॉलीवुड डिस्को और तबले की
धुनों पर पूरे जोश से नाच रहा था। फ़िल्म 'ख़ुदग़र्ज़' (१९८७)
का गाना “आप के आ जाने से” उन दिनों बहुत मशहूर था। बर्फ़ से
ढके हिमालय के सामने गोविंदा और नीलम का वह चपल नृत्य देख मैं
भी गोविंदा के स्टेप्स की नकल कर रहा था। मेरी कल्पनाओं में
मेरे साथ रूबल नाच रही थीं।
नाचते-नाचते मेरी नज़र दरवाज़े पर पड़ी। पूनम ने दरवाज़ा
थोड़ा-सा खोलकर अंदर झाँका था। वह हाथ में झाड़ू लिए, आँखों
में हैरानी भरे, कुछ देर से मुझे देख रही थी। मैं सकपका गया और
तुरंत संगीत बंद कर दिया। मुझे लगा शायद वह मम्मी-पापा की तरफ़
से आवाज़ कम करने की चेतावनी लेकर आई है।
“क्या बात है, पूनम?”
अब मैं उससे पंजाबी की गालियों के बजाय शिष्ट हिंदी में बात
करता था। ज़्यादातर शहरी पंजाबियों की तरह मैं बचपन से ही
द्विभाषी था। हिंदी को तब ज़्यादा सभ्य माना जाता था; आमतौर पर
लड़के अपनी उम्र की या बड़ी लड़कियों से सम्मान और अपनापन
दिखाने के लिए हिंदी में ही बात करते थे।
“मुझे माफ़ करना,” उसने कहा, “दरवाज़ा खुला था, तो बस देखे
बिना रह नहीं पाई।”
“कोई बात नहीं,” मैं झेंपते हुए मुस्कुराया—अब भी हाँफता और
पसीने से तर।
“सच बोलूँ तो तुम बहुत अच्छा नाचते हो!”
“सच? तुम्हें अच्छा लगा?” मैंने संकोच से पूछा।
“बहुत ही सुंदर,” उसने सिर हिलाते हुए, आँखें फैलाकर कहा।
“ओह… अच्छा,” मेरे मुँह से एक शर्मीली हँसी निकल गई।
हम दोनों प्यार से मुस्कुराए। अब हम एक-दूसरे के प्रति कितने
सम्मानजनक हो गए थे!
उन दिनों काम के बाद, जब पूनम चाय पीती, तो मैं उसके पास बैठकर
बातें करने लगता। पूनम को बॉलीवुड के बारे में मुझसे कहीं
ज़्यादा पता था। उम्र में बड़ी होने के कारण उसने ज़्यादा
फ़िल्में देखी थीं और कथानकों, गानों व अभिनेताओं का मानो एक
चलता-फिरता विश्वकोश थी। जब पूनम और मैं अच्छे दोस्त बन ही रहे
थे, तभी उसे बेहतर रोज़गार की तलाश में किसी और शहर जाना पड़ा।
लेकिन कहाँ? कौन-सा रोज़गार? एक बार हमारे घर में वह एक चमकदार
हिंदी पत्रिका को हैरानी से पलट रही थी। एक पन्ने की ओर इशारा
करके उसने मुझसे पूछा,
“राजू, इसमें क्या लिखा है?”
तभी मुझे एहसास हुआ कि वह पढ़ना-लिखना नहीं जानती थी।
हम सब मुसाफ़िर
जब पूनम आख़िरी बार विदा लेने आई, तो घर में मैं अकेला था।
मैंने घंटी सुनी और दरवाज़ा खोला। काम के कपड़ों के बजाय उसने
सलीकेदार सलवार-कमीज़ पहन रखी थी। सँवारे हुए लंबे बाल उसकी
पीठ पर लहरों की तरह गिर रहे थे। उसका गोरा, आकर्षक चेहरा
हल्के मेकअप से दमक रहा था और उसके पतले होंठों पर गुलाबी
लिपस्टिक चमक रही थी।
“आंटी कहाँ हैं?”
“बाज़ार गई हैं,” मैंने कहा। “अभी लौट ही आएँगी।”
हम दोनों खाने की मेज़ पर बैठकर सिनेमा हॉल में लगी और वीडियो
पर आई नई फ़िल्मों की बातें करने लगे। उसने कई हालिया फ़िल्में
देखी थीं और वह उत्साह से मुझे उनके बारे में बता रही थी। उसने
मिथुन चक्रवर्ती की फ़िल्मों का ज़िक्र किया, और 'राम लखन',
'चाँदनी' व 'त्रिदेव' जैसे ब्लॉकबस्टरों की कहानियाँ भी
सुनाईं। मम्मी आ गईं और चाय बनाने रसोई में चली गईं। फ़िल्मों
की बातों में हम इतने डूब गए कि लगातार खिलखिलाते और गुनगुनाते
रहे। जब मम्मी मेज़ पर आकर बैठीं, तो उन्हें बोलने का मौक़ा ही
नहीं मिला।
मम्मी हमें इतने अच्छे से घुलते-मिलते देखकर ख़ुश थीं।
“देखो तो सही—एक ही थैली के चट्टे-बट्टे! पहले कैसे लड़ते रहते
थे!”
यह सुनकर हम दोनों शरमा गए।
ताजमहल चाय और ब्रिटानिया बिस्कुट के साथ थोड़ी और गपशप के बाद
पूनम चली गई—और फिर मैं उसे कभी नहीं देख पाया।
सस्ते फ़ोन कॉल और इंटरनेट से पहले के ज़माने में, लोगों का
यूँ चले जाना किसी अंतिम विदाई जैसा होता था। शहर बदलते ही
पुराने रिश्ते अक्सर धुंधले पड़कर टूट जाते थे। लेकिन उस वक़्त
मैं दूरी और समय के इस क्रूर सच को समझने के लिए बहुत छोटा था।
हफ़्तों तक मैं मम्मी से पूछता रहा कि पूनम फिर कब आएगी। उनका
यह कहना कि—“पूनम बहुत दूर चली गई है और अब उसे अपनी ज़िंदगी
में आगे बढ़ना होगा”—मेरी समझ से परे था।
एक खिली हुई धूप वाली दोपहर, मैं अपने बगीचे में टहल रहा था,
अपने भीतर उमड़ते अनंत प्रश्नों से जूझते हुए। पूनम
आख़िर
गई कहाँ? वह फिर वापस मिलने क्यों नहीं आ सकती? जिसे आप प्यार
करते हैं, वह बिना कोई निशान छोड़े भला यूँ कैसे ग़ायब हो सकता
है? आख़िर इस ज़िंदगी का मतलब क्या है? हम सब इस पृथ्वी पर
क्या कर रहे हैं?
तभी मेरी आँखों के सामने एक रहस्यमय दृश्य घटित हुआ। न जाने वह
किसी उज्ज्वल भविष्य का संकेत था या मेरे व्याकुल सवालों का
कोई दैवीय उत्तर। जॉनी और वह जंगली बिल्ली—जो कभी एक-दूसरे के
जानी दुश्मन हुआ करते थे—आज कुछ ही फ़ासले पर बैठे एक-दूसरे की
आँखों में खोए हुए थे। मैं विस्मय भरी मुस्कान के साथ उन्हें
निहारता रहा। उनकी पूँछें एक धीमी और सुंदर लय में किसी
जुगलबंदी की तरह हिल रही थीं; मानो दो अनजान आत्माओं का मिलन
हो रहा हो। |