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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में प्रस्तुत है
भारत से सुशील कुमार शर्मा की कहानी- धूप प्यास और वैदिक जलजीरा


जेठ की सुबहें दरअसल सुबह नहीं होतीं, वे रात की शेष बची हुई थकान का विस्तार होती हैं। सूरज उगते ही नहीं, जैसे आकाश पर अधिकार कर लेते हैं। उस दिन भी ऐसा ही था। क्षितिज पर लालिमा की एक पतली रेखा उभरी ही थी कि उसकी तपिश ने हवा को बदलना शुरू कर दिया।

गाडरवारा शहर के उस पुराने घर का आँगन अभी-अभी धोया गया था। मिट्टी में पानी के छींटे पड़ते ही जो सोंधी गंध उठती है, वह किसी भी इत्र से अधिक गहरी होती है। तुलसी चौरे के पास धूपबत्ती जल रही थी और भीतर रसोई में जीवन अपनी सबसे सच्ची लय में चल रहा था।

दादी चौकी पर बैठी थीं। सामने कच्चे आमों का ढेर—हरे, ताजे, भीतर खटास का पूरा संसार समेटे हुए। पास ही पुदीने की पत्तियाँ, भुना हुआ जीरा, काला नमक, हींग की डिबिया, सब जैसे किसी अनुष्ठान की तैयारी में हों।

परंपरा की महक और दादी का संसार गाडरवारा के उस पुराने घर का आँगन केवल एक हिस्सा नहीं, बल्कि स्मृतियों का एक जीवित संग्रहालय था। जेठ की सुबह जब सूरज अभी आकाश पर अपना पूर्ण अधिकार जमाने की तैयारी ही कर रहा होता, तभी दादी का दिन शुरू हो जाता था। आँगन में पानी छिड़कते ही जो सोंधी गंध उठती, वह आदित्य के लिए किसी जादुई संकेत की तरह थी—मानो घर ने एक लंबी नींद के बाद अंगड़ाई ली हो।

दादी चौकी पर जिस मुद्रा में बैठती थीं, वह किसी तपस्या से कम नहीं था। उनके सामने रखे कच्चे आमों का ढेर केवल फल नहीं, बल्कि जेठ की दोपहरों का अमृत था। आदित्य ने ध्यान से देखा, दादी के हाथों की झुर्रियों में न जाने कितने सालों का अनुभव और कितनी गर्मियाँ सिमटी हुई थीं। वे एक आम उठातीं, उसे गौर से देखतीं जैसे उसकी आत्मा को पढ़ रही हों, और फिर उसे छीलना शुरू करतीं।

"दादी, क्या हर आम का स्वाद एक जैसा होता है?" आदित्य ने पास बैठते हुए पूछा।
दादी ने अपना चश्मा नाक पर टिकाया और धीमी मुस्कान के साथ कहा, "नहीं बेटा, जैसे हर इंसान का स्वभाव अलग होता है, वैसे ही हर आम की अपनी जिद होती है। कोई खट्टा होता है तो कोई भीतर से मीठा होने का ढोंग करता है। पना (जलजीरा) बनाने के लिए हमें इनकी जिद को पिघलाना पड़ता है।"

सिलबट्टे पर जब दादी ने पुदीना और जीरा पीसना शुरू किया, तो उसकी ध्वनि किसी धीमी-सी कविता की तरह फैलने लगी। यह केवल मसाला पीसने की आवाज नहीं थी, बल्कि एक संगीत था जो पीढ़ियों से इस रसोई में गूँजता आ रहा था। दादी का हाथ एक लय में चलता—न बहुत तेज, न बहुत धीमा। पुदीने की ठंडी महक जब हवा में हींग और काले नमक के साथ घुली, तो आदित्य को लगा जैसे घर के भीतर का तापमान अचानक कुछ डिग्री कम हो गया है।

दादी कहती थीं, "बेटा, यह जो सिलबट्टा है न, यह मिक्सी की तरह शोर नहीं करता, यह संवाद करता है। जब पत्थर से पत्थर रगड़ता है और बीच में पुदीना पिसता है, तो उसका असली गुण बाहर आता है। जो जल्दबाजी में बनता है, वह केवल पेट भरता है, और जो सब्र से बनता है, वह रूह को ठंडक देता है।"

आदित्य दरवाजे पर खड़ा यह सब देख रहा था। उसके लिए यह केवल एक रसोई का दृश्य नहीं था, यह गर्मी की छुट्टियों की औपचारिक शुरुआत थी। आदित्य ने उस घड़े को देखा जिसमें पना ठंडा होने के लिए रखा जाना था। उस पर लिपटा हुआ गीला सूती कपड़ा ऐसा लग रहा था मानो तपती दोपहर में किसी ने उसे सुरक्षा का कवच पहना दिया हो। दादी ने जब पहला गिलास भरकर उसे दिया, तो वह केवल एक पेय नहीं था; वह दादी का प्यार, गाडरवारा की संस्कृति और तपती धूप के खिलाफ एक मीठा विद्रोह था।
“दादी, आज पना बनेगा न?” उसने पूछा।
दादी ने बिना सिर उठाए कहा, “बनेगा भी, और पिया भी जाएगा। गर्मी से लड़ना है तो तैयारी भी करनी पड़ेगी।”
“और फुल्की?”
इस बार दादी ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा, “तुम्हारी दुनिया फुल्की से शुरू होकर वहीं खत्म हो जाती है क्या?”
आदित्य हँस पड़ा, पर उसकी आँखों में एक बालसुलभ जिद बनी रही।

गाडरवारा का जीवन अपने आप में एक धीमा संगीत था। यहाँ समय भागता नहीं, चलता है। लोग एक-दूसरे को नाम से नहीं, रिश्तों से पहचानते हैं—किसी के लिए वह “बाबू” है, किसी के लिए “भैया”, किसी के लिए “चाचा”। गर्मी में यह संगीत और भी धीमा हो जाता है। दोपहर होते-होते सड़कें खाली हो जातीं, दुकानें आधी बंद, और पेड़ों के नीचे बैठे लोग अपने-अपने पंखे झलते हुए जैसे समय को काटते रहते। पर इस ठहराव में भी कुछ आवाज़ें होती हैं, जो जीवन को चलाए रखती हैं— “ठंडा-ठार पियो जलजीरा… पेट के मर जाएँ सब कीरा…” यह आवाज़ दूर से आती और धीरे-धीरे पूरे मोहल्ले में फैल जाती। दोपहर तक पना तैयार हो चुका था। दादी ने उसे मिट्टी के घड़े में डालकर ठंडा होने के लिए रख दिया।

आदित्य ने जैसे ही पहला गिलास भरा, उसकी ठंडक हाथों में उतर आई। उसने एक लंबा घूँट लिया और उसकी आँखें अनायास बंद हो गईं।
“कैसा है?” दादी ने पूछा। “जैसे… जैसे अंदर कोई ठंडी हवा चल रही हो,” आदित्य ने धीरे से कहा।
दादी ने संतोष की साँस ली, “बस, यही चाहिए।” फिर उन्होंने धीमे स्वर में जोड़ा, “देखो, गर्मी केवल बाहर नहीं होती, भीतर भी होती है। पना भीतर की गर्मी को भी शांत करता है।”
आदित्य ने इस वाक्य को पूरी तरह नहीं समझा, पर उसे लगा कि इसमें कुछ गहराई है। शाम होते-होते वह अपने दोस्तों के साथ गली में निकल पड़ा।

गली का वह मोड़ जैसे हर दिन किसी उत्सव की प्रतीक्षा करता था। वहीं खड़ा होता था फुल्की वाला—एक साधारण-सा आदमी, पर उसके हाथों में जैसे स्वाद की कोई अदृश्य कला थी। उसकी टोकरी में सजी फुल्कियाँ, पास रखा मटका, जिसमें जलजीरा ठंडा हो रहा था, और एक छोटी-सी बाल्टी जिसमें आलू-चना का मसाला, सब कुछ जैसे किसी मंच की सजावट हो।

“आ गए छोटे बाबू!” उसने आदित्य को देखते ही कहा। “हाँ भैया, आज तो बहुत प्यास लगी है,” आदित्य ने उत्साह से कहा। “प्यास का इलाज है मेरे पास,” उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
उसने एक फुल्की उठाई, उसे सावधानी से तोड़ा, उसमें मसाला भरा, और फिर उसे जलजीरे में डुबोकर आदित्य के हाथ में दे दिया। पहली फुल्की मुँह में जाते ही जैसे पूरा संसार बदल गया। खट्टापन पहले जीभ को छूता, फिर तीखापन हल्का-सा चुभता, और अंत में ठंडक भीतर तक उतर जाती।
“भैया, इसमें क्या डालते हो?” आदित्य ने पूछा। फुल्की वाला हँसा, “अगर सब बता दूँगा, तो मेरा काम कैसे चलेगा?” “फिर भी…” “बस इतना समझ लो—थोड़ा जीरा, थोड़ा नमक, थोड़ा पुदीना… और थोड़ा अनुभव।” “अनुभव?” “हाँ, यह जो पानी है न, इसे समझना पड़ता है। कितना खट्टा, कितना तीखा—यह सब हाथ और मन से तय होता है।”

गली के मोड़ से वैश्विक क्षितिज तक शाम की धुंधलकी गाडरवारा की गलियों में उतर रही थी, लेकिन उस पुराने मोड़ पर आज एक अलग ही ऊर्जा महसूस हो रही थी। राघव, जो अब तक केवल एक दर्शक की तरह आदित्य को फुल्की खिलाते देख रहा था, धीरे से आगे बढ़ा। उसने देखा कि कैसे आदित्य हर फुल्की के साथ केवल स्वाद नहीं, बल्कि एक मुस्कान बाँट रहा था।

उसी समय एक कार आकर रुकी। उसमें से उतरा एक युवक—साफ़-सुथरे कपड़े, आँखों में हल्की थकान, और चेहरे पर एक अजनबीपन। वह धीरे-धीरे फुल्की वाले के पास आया।
“यह क्या है?” उसने पूछा। “फुल्की,” जवाब आया, “और यह पानी जलजीरा।”
युवक ने एक फुल्की ली। जैसे ही उसने उसे खाया, उसके चेहरे पर जो भाव उभरा, वह देखने लायक था। जैसे उसने कोई भूली हुई चीज़ अचानक पा ली हो।
“यह… यह तो वैसा ही है,” उसने धीरे से कहा। “क्या?” आदित्य ने पूछा। “जैसा बचपन में खाता था।”
उसका नाम राघव था। वह कई वर्षों से विदेश में रह रहा था और अब पहली बार अपने कस्बे लौटा था। “वहाँ भी यह मिलता है,” उसने कहा, “पर स्वाद अलग होता है। शायद वहाँ यह केवल खाना है, और यहाँ…” “यहाँ क्या?” “यहाँ यह याद है।”

राघव ने मटके की दीवार पर उंगलियाँ फेरते हुए कहा, “आदित्य, तुम्हें अंदाजा भी है कि इस ठंडे पानी की कीमत उन बड़े शहरों में क्या हो सकती है जहाँ लोग प्यास बुझाने के लिए प्लास्टिक की बोतलों में बंद कृत्रिम ज़हर पीते हैं?”
आदित्य ने अपनी एप्रन से हाथ पोंछते हुए उसकी ओर देखा, “भैया, यहाँ तो यह बस एक प्यास बुझाने का ज़रिया है। इसमें कीमत जैसा क्या है?”
राघव की आँखों में एक चमक कौंधी। उसने विस्तार से समझाना शुरू किया, “यही तो बात है। वहाँ लोग 'असली' चीज़ के लिए तरस रहे हैं। मैंने न्यूयॉर्क और लंदन की उन चमकती सड़कों पर लोगों को 'नेचुरल' और 'ऑर्गेनिक' के नाम पर हज़ारों खर्च करते देखा है। लेकिन उनके पास वह 'अनुभव' नहीं है जो इस सिलबट्टे पर पिसे पुदीने और दादी के हाथों की ममता में है। हम इसे एक बड़ा रूप दे सकते हैं—'वैदिक जलजीरा'।”

आदित्य का काम रुक गया, वह मंत्रमुग्ध होकर सुन रहा था। राघव ने आगे कहा, “सोचो, हम एक ऐसा तंत्र खड़ा करें जहाँ गाडरवारा जैसे सैकड़ों कस्बों के बेरोजगार युवाओं को रोज़गार मिले। हम उन्हें केवल फुल्की वाला नहीं कहेंगे; वे 'जलजीरा संस्कृति के वाहक' होंगे। काँच के ऊंचे गिलासों में नहीं, बल्कि मिट्टी के सोंधे कुल्हड़ों में यह जलजीरा परोसा जाएगा। वही दादी का नुस्खा, वही हींग की खुशबू, लेकिन एक अंतरराष्ट्रीय पहचान के साथ। यह केवल एक व्यापार नहीं, हमारी मिट्टी की खुशबू को दुनिया तक पहुँचाने का एक मिशन होगा।”

आदित्य के मन में एक तस्वीर उभरने लगी—एक ऐसी दुनिया जहाँ मशीनों का शोर नहीं, बल्कि सिलबट्टे का धीमा संगीत हो। उसने संकल्प के साथ मटके पर हाथ रखा और कहा, “तो भैया, क्या हम इसकी शुरुआत इसी मोड़ से करें? क्या हम दुनिया को बता सकते हैं कि असली ठंडक कहाँ मिलती है?”
राघव ने मुस्कुराकर उसका कंधा थपथपाया, “बिल्कुल, क्योंकि जब नीयत साफ़ हो और हाथों में दादी का आशीर्वाद, तो एक छोटा-सा मटका भी समंदर बन सकता है।”

दिन बीतने लगे। आदित्य और राघव की बातचीत गहरी होने लगी। राघव उसे अपने शहरों की कहानियाँ सुनाता—ऊँची इमारतें, चमकदार बाज़ार, मशीनों से चलता जीवन। “पर वहाँ रुककर बात करने का समय नहीं है,” वह कहता, “यहाँ एक फुल्की खाते-खाते भी लोग बात कर लेते हैं।”
आदित्य को यह सुनकर आश्चर्य होता, “इतनी बड़ी जगहों पर लोग बात नहीं करते?” “करते हैं,” राघव मुस्कुराता, “पर वहाँ बातचीत में जल्दी होती है, यहाँ ठहराव है।”

राघव की स्मृति का झरोखा राघव ने जैसे ही फुल्की का वह तीखा-नमकीन पानी चखा, उसकी बंद आँखों के पीछे हज़ारों मील दूर एक दूसरा संसार तैर गया। उसे याद आई लंदन की वह ऊँची काँच वाली इमारत, जहाँ वह पिछले दस सालों से रह रहा था। वहाँ की सर्द सुबहें, जहाँ सूरज बस एक सफेद धब्बे की तरह दिखता था; उसमें गाडरवारा जैसी तपिश और अधिकार नहीं था। वहाँ के ऑफिस में मशीनों से निकलने वाली कॉफी और प्लास्टिक की बोतलों में बंद नीले-पीले रंगों वाले 'एनर्जी ड्रिंक्स' थे, जो प्यास तो बुझा देते थे, पर मन को कभी तृप्त नहीं कर पाए।

उसे वह चमक-धमक वाला सुपरमार्केट याद आया, जहाँ 'इंडियन फ्लेवर' के नाम पर डिब्बाबंद मसाले मिलते थे, लेकिन उनमें वह सोंधी महक नहीं थी जो अभी इस गली के मोड़ पर तैर रही थी। राघव को महसूस हुआ कि उन आलीशान अपार्टमेंट्स में लोग रहते तो साथ थे, पर एक-दूसरे से मीलों दूर थे। वहाँ किसी के पास रुककर यह पूछने का समय नहीं था कि "भाई, क्या हाल है?" वहाँ बातचीत केवल औपचारिकताओं और व्यापार तक सीमित थी। आज इस साधारण-सी फुल्की वाले के सामने खड़े होकर उसे अहसास हुआ कि उसने वर्षों तक जो 'स्टेटस' कमाया, वह इस एक गिलास जलजीरे के सुकून के सामने कितना छोटा था।

एक दिन अचानक फुल्की वाला नहीं आया। गली का मोड़ सूना था। न आवाज़, न भीड़। आदित्य को अजीब-सा खालीपन महसूस हुआ।
“कहाँ गए भैया?” उसने पूछा। “बीमार हैं,” पास वाले दुकानदार ने बताया।
उस दिन फुल्की का स्वाद नहीं, उसकी अनुपस्थिति महसूस हुई। शाम को आदित्य ने दादी से कहा, “हम उनके घर चलें?” दादी ने बिना देर किए हामी भर दी।

जब आदित्य और दादी संकरी गलियों से होते हुए फुल्की वाले के घर पहुँचे, तो आदित्य का मन एक अजीब-सी घबराहट से भरा था। वह मोड़ जो रोज़ जलजीरे की आवाज़ से गुलज़ार रहता था, आज यहाँ एक खामोश सन्नाटे में तब्दील हो गया था। एक छोटे-से कमरे में, जहाँ रोशनी भी संकोच से दाखिल हो रही थी, फुल्की वाला एक पुरानी चारपाई पर लेटा था। उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें आज गहरी लग रही थीं और उसकी आँखें, जो हमेशा चमकती रहती थीं, आज थोड़ी धुंधली थीं।

आदित्य ने देखा कि कमरे के एक कोने में वही मटका और टोकरी रखी थी, जो हर शाम उत्सव का कारण बनते थे। लेकिन आज वे बेजान थे।
"बाबू... आप यहाँ?" उसके स्वर में एक ऐसी विनम्रता और आश्चर्य था जिसने आदित्य के गले में एक फाँस-सी पैदा कर दी।
दादी ने आगे बढ़कर उसके माथे पर हाथ रखा—वही हाथ जिसने सुबह आदित्य को पना पिलाया था। उन्होंने धीमे से कहा, "कुछ दिन आराम करो, शरीर को भी तो जेठ की इस धूप से लड़ने की फुर्सत चाहिए।"
आदित्य ने उसके हाथ पकड़े और भर्राई आवाज़ में कहा, "भैया, आप जल्दी ठीक हो जाइए। आपके बिना वह मोड़... वह पूरा गाडरवारा जैसे प्यासा लग रहा है।"

उस क्षण आदित्य को अहसास हुआ कि स्वाद केवल जीभ तक सीमित नहीं होता। उस फुल्की वाले की अनुपस्थिति ने उसे समझाया कि एक साधारण-सा जलजीरा बेचने वाला इंसान भी समाज के लिए कितना अनिवार्य हो सकता है। वह केवल एक दुकानदार नहीं था, वह उस मोहल्ले की खुशियों का एक अदृश्य हिस्सा था।
अगले दिन की दोपहर गाडरवारा की हवा में लू के थपेड़े और भी तेज़ थे। आदित्य ने एक निर्णय लिया। उसने अपनी कमीज़ की आस्तीनें ऊपर चढ़ाईं और दादी के सामने ज़मीन पर बैठ गया।
“दादी, मुझे जलजीरा बनाना सिखाओ।” दादी ने पूछा, “क्यों?” “बस… सीखना है।”

दादी समझ गईं। उस दिन सिलबट्टे पर केवल मसाले नहीं पिसे, एक भावना पिसी और फिर से बनी। उन्होंने हर चीज़ सिखाई—मात्रा, संतुलन, स्वाद। और अंत में कहा, “सब कुछ सीख सकते हो, पर स्वाद तभी आएगा जब मन से बनाओगे।”

उसके सामने वही भारी पत्थर का सिलबट्टा था, जिस पर दादी सालों से स्वाद के जादू बुनती आई थीं। दादी ने पुदीने की ताज़ी पत्तियों की एक ढेरी उसकी ओर खिसकाई और गंभीर स्वर में कहा, "देख आदित्य, जलजीरा बनाना केवल मसालों का घोल तैयार करना नहीं है, यह एक साधना है। जैसे शब्दों को सही क्रम में रखने से कविता बनती है, वैसे ही मसालों का सही संतुलन जीवन का स्वाद तय करता है।"

आदित्य ने पत्थर का 'लोढ़ा' हाथ में लिया। पहले तो उसे वह बहुत भारी लगा। जब उसने पुदीना पीसना शुरू किया, तो पत्तियाँ इधर-उधर भागने लगीं। दादी मुस्कुराईं और बोलीं, "इसे ज़ोर से मत दबा। पत्थर को पुदीने से बात करने दे। हींग को देख—इसे बस एक चुटकी डालना। हींग अहंकार जैसी होती है; अगर यह ज़रूरत से ज़्यादा हो जाए, तो पूरे पना की मिठास को कड़वाहट में बदल देती है। और यह काला नमक? यह वह विनम्रता है जो हर चीज़ में घुल जाती है पर अपनी पहचान नहीं खोती।"

दो घंटे की मेहनत के बाद जब आदित्य का माथा पसीने से तर-बतर था, उसने पना तैयार किया। उसने काँपते हाथों से दादी को पहला घूँट चखाया। दादी ने अपनी आँखें मूँद लीं। कुछ क्षण का सन्नाटा आदित्य को सदियों जैसा लगा। फिर दादी ने धीरे से कहा, "स्वाद तो आ गया है, पर अभी इसमें वह 'ठहराव' नहीं है जो मन को शांत करे। तू अभी जलजीरा बना रहा है; जिस दिन तू प्यास को समझने लगेगा, उस दिन स्वाद अपने आप उतर आएगा।"

आदित्य ने उस दिन जाना कि दादी के लिए रसोई घर केवल खाना बनाने की जगह नहीं, बल्कि संस्कारों की पाठशाला थी। सिलबट्टे पर केवल मसाले नहीं पिसे जा रहे थे, बल्कि आदित्य के भीतर का कच्चापन भी धीरे-धीरे बारीक हो रहा था। उस रात, गाडरवारा की छत पर लेटे हुए आदित्य को नींद नहीं आ रही थी। आसमान सितारों से भरा था, लेकिन उसकी आँखों के सामने तो वह मिट्टी का कोना और राघव भैया की बातें घूम रही थीं। उसे समझ आ रहा था कि 'वैदिक जलजीरा' केवल एक ब्रांड का नाम नहीं, बल्कि उस खोई हुई आत्मीयता को वापस लाने की कोशिश है, जो बड़े शहरों की आपाधापी में कहीं गुम हो गई थी।

अगले दिन सुबह, जब आदित्य ने मटके पर हाथ रखा, तो उसे वह केवल मिट्टी का एक पात्र नहीं लगा; उसे महसूस हुआ कि वह पीढ़ियों के विश्वास को थामे हुए है। राघव बगल में खड़ा था—अपनी आधुनिक तकनीक और योजना के साथ, और दादी पीछे आँगन में बैठी अपनी स्मृतियों और दुआओं के साथ। राघव ने मुस्कुराते हुए कहा, “आदित्य, हम दुनिया को केवल स्वाद नहीं देंगे, हम उन्हें एक 'अहसास' देंगे। वह अहसास, जो प्यास लगने पर पानी की पहली बूंद में होता है।”
आदित्य ने पहला कुल्हड़ भरा और उसे सबसे पहले उसी बीमार फुल्की वाले के पास ले गया, जो अब थोड़ा बेहतर महसूस कर रहा था। जब उसने वह जलजीरा पिया, तो उसकी आँखों के कोरों में जो नमी उभरी, वह आदित्य के लिए किसी भी मुनाफ़े या सफलता से बड़ी थी।

दादी दूर से यह सब देख रही थीं। उन्होंने देखा कि आदित्य अब केवल पना नहीं बना रहा था, वह रिश्तों की डोर को और मज़बूत कर रहा था। उनके चेहरे पर एक गहरा संतोष था। उन्हें पता था कि उनके बाद भी यह सुगंध खत्म नहीं होगी; सिलबट्टे का वह धीमा संगीत अब एक नए रूप में पूरी दुनिया में गूँजने वाला था।
शाम को गली के उसी मोड़ पर एक नया दृश्य था। आदित्य खड़ा था। सामने एक छोटा मटका, पास में फुल्कियाँ। लोग आश्चर्य से देख रहे थे।
“आओ, फुल्की खाओ,” उसने संकोच से कहा।

पहली फुल्की उसने एक छोटे बच्चे को दी। फिर धीरे-धीरे लोग आने लगे और देखते ही देखते वह मोड़ फिर से जीवित हो गया। कुछ दिनों बाद फुल्की वाला लौट आया। उसने जब यह दृश्य देखा, तो उसकी आँखें नम हो गईं।
“यह क्या कर रहे हो बाबू?” आदित्य मुस्कुराया, “बस, प्यास बुझा रहा हूँ।”

फुल्की वाले ने उसका सिर सहलाया, “तुमने मेरा काम नहीं, मेरा मन बचा लिया।”
राघव उस दिन चुपचाप यह सब देख रहा था। उसने धीरे से कहा, “यही तो है… यही वह चीज़ है जो कहीं और नहीं मिलती। यहाँ लोग केवल अपने लिए नहीं जीते।”
फुल्की वाले की वापसी के बाद भी गली का वह मोड़ अब पहले जैसा नहीं रहा था। उसमें एक नया अर्थ जुड़ गया था, जैसे किसी साधारण जगह ने अपनी सीमाएँ पार कर ली हों। आदित्य अब केवल फुल्की नहीं लगाता था, वह लोगों के चेहरे पढ़ने लगा था—किसी की थकान, किसी की प्यास, किसी की चुप्पी। जलजीरा उसके लिए अब पेय नहीं रहा, वह संवाद का माध्यम बन गया था।

उसी शाम राघव कुछ देर तक चुपचाप उसे काम करते देखता रहा। उसकी आँखों में एक अलग-सी चमक थी, जैसे वह केवल वर्तमान नहीं, भविष्य देख रहा हो।
“आदित्य,” उसने धीरे से कहा, “तुम्हें पता है, तुम क्या कर रहे हो?” आदित्य ने हँसकर कहा, “फुल्की बेच रहा हूँ।” राघव ने सिर हिलाया, “नहीं, तुम केवल फुल्की नहीं बेच रहे। तुम अनुभव दे रहे हो। तुम वह दे रहे हो, जो दुनिया ढूँढ रही है।”
आदित्य कुछ समझा, कुछ नहीं। “मतलब?”
राघव ने पास रखे मटके की ओर इशारा किया, “यह जो जलजीरा है न, यह केवल पानी नहीं है। यह भारत की स्मृति है, इसकी परंपरा है। और दुनिया आज इसी को खोज रही है—कुछ असली, कुछ सच्चा।”
आदित्य अब ध्यान से सुन रहा था। “तो?”
“तो क्यों न हम इसे यहीं तक सीमित न रखें?” राघव की आवाज़ में अब उत्साह था, “सोचो, अगर यही जलजीरा, यही स्वाद, यही सादगी हम देश के अलग-अलग शहरों में ले जाएँ… फिर विदेशों तक।”

आदित्य की आँखें फैल गईं, “विदेश?”
“हाँ,” राघव ने कहा, “मैं वहाँ रहा हूँ। लोग वहाँ बोतलों में बंद कृत्रिम स्वाद पीते हैं और उसे ‘कूल’ कहते हैं। अगर उन्हें यह असली स्वाद मिले, तो वे इसे अपनाएँगे।”
आदित्य के भीतर कुछ हलचल हुई, “पर हम करेंगे कैसे?”
राघव मुस्कुराया, “यही तो सोचने वाली बात है। एक छोटा-सा स्टार्टअप—'वैदिक जलजीरा'। हर शहर में एक छोटी-सी फ्रेंचाइजी नहीं, बल्कि एक पहचान। साफ़-सुथरा, सुसंगठित, पर वही पुराना स्वाद। और वहाँ काम करेंगे हमारे जैसे लोग जिन्हें काम की ज़रूरत है।”

आदित्य अब पूरी तरह उस विचार में डूब चुका था। “मतलब… लोगों को रोज़गार भी मिलेगा?”
“हाँ,” राघव ने कहा, “और केवल रोज़गार नहीं, सम्मान भी। कोई यह नहीं कहेगा कि वह केवल फुल्की वाला है। वह कहेगा—मैं जलजीरा संस्कृति का वाहक हूँ।”
कुछ देर दोनों चुप रहे। गली में वही हवा चल रही थी, वही लोग थे, वही मटका था, पर अब सब कुछ बदल गया था। आदित्य ने धीरे से कहा, “तो हम शुरू करें?”
राघव ने उसकी ओर देखा, “यहीं से, इसी मोड़ से। यही हमारी पहली शाखा होगी।” आदित्य ने मटके पर हाथ रखा, जैसे कोई संकल्प ले रहा हो।

उस क्षण गली का वह छोटा-सा कोना केवल एक दुकान नहीं रहा, वह एक स्वप्न का जन्मस्थान बन गया, जहाँ मानवीय रिश्तों की संवेदना और एक युवक का अनुभव मिलकर एक नई राह बना रहे थे। धूप अब भी उतनी ही प्रखर थी, पर अब उनके भीतर एक और ताप जल रहा था—कुछ करने का, कुछ बदलने का, और उस स्वाद को दुनिया तक पहुँचाने का जो अब तक केवल स्मृतियों में बसता था। जिसने एक साधारण-सी चीज़ को जीवन का उत्सव बना दिया।

और शायद जीवन भी यही है—तपती धूप में किसी और के लिए एक घूँट ठंडक बन जाना। उस रात आदित्य ने जब पना का गिलास उठाया, तो उसे लगा स्वाद वही है, पर अर्थ बदल गया है। अब वह केवल प्यास बुझाने का साधन नहीं रहा, वह एक ज़िम्मेदारी बन गया है—किसी की कमी को पूरा करने की, किसी की मुस्कान को लौटाने की।

और दादी दूर बैठी यह सब देख रही थीं। उनके चेहरे पर वही संतोष था जैसे कोई परंपरा आगे बढ़ गई हो। धूप हर साल आएगी, प्यास हर बार लगेगी, पर जब तक ऐसे हाथ हैं जो मटका भरते रहेंगे, तब तक जीवन कभी सूखेगा नहीं।

१ मई २०२६

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