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इतिहास


 
दादा-की-खोज-में-ऑस्ट्रेलिया-आए
बलजिंदर
-सिंह-की-कहानी
- रेखा राजवंशी


ऑस्ट्रेलिया भले ही भारतीय पर्यटकों और विद्यार्थियों में लोकप्रिय देश रहा है, परन्तु भारतीय आगमन का इतिहास बहुत पुराना है। पहली बार १७९६ में कलकत्ता में एक जहाज़ का निर्माण हुआ और उसे ऑस्ट्रेलिया भेजा गया। इस जहाज़ में बारह भारतीय भी थे। फिर तस्मानिया से ये लोग लम्बी यात्रा करके सिडनी पहुँचे, जिसमें केवल तीन व्यक्ति ज़िंदा रहे—एक भारतीय और दो ब्रिटिश। बाद में मज़दूरों के रूप में भारतीय ऑस्ट्रेलिया लाए गए। प्रमाण है कि सिखों और भारतीयों ने विश्व युद्ध में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

१८६० के दशक से भारतीयों ने, जिनमें से अधिकांश सिख थे, उद्योगपतियों और व्यापारियों की तरह पूरे ऑस्ट्रेलिया में ‘पायनियर्स ऑफ़ इनलैंड’ के रूप में काम करना शुरू कर दिया था। ऊँट चालक और फेरीवाले के रूप में ऑस्ट्रेलिया में उनकी उपस्थिति इतिहास में दर्ज है। अन्य भारतीय ब्रिटिश सरकार द्वारा मज़दूरों के रूप में यहाँ लाए गए। कुछ लोग ब्रिटिश भारत के समय नौकरी या व्यवसाय के अवसर तलाशने स्वयं ऑस्ट्रेलिया आए। वुलुन्गोंग शहर में बहुत-से किसान पंजाब से आकर बस गए और खेती-बाड़ी की। भारत ने पहली बार १९४१ में ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में एक व्यापार कार्यालय की स्थापना की।

अनेक ऑस्ट्रेलियावासी भारतीयों की कहानियाँ अनकही, अनसुनी हैं, जिन्हें ऑस्ट्रेलिया में भारतीय इतिहास के विशेषज्ञ लेन कैना ने अपनी किताब में दर्ज किया है। उन्हीं में से एक कहानी यह है—एक ऐसे शख़्स की कहानी, जो अपने दादा को ढूँढ़ने भारत से ऑस्ट्रेलिया आए और वर्षों तक उनकी तलाश की; अंततः उन्हें ढूँढ़ने में सफल भी हुए।

पंजाब के सिंबल ज़िले के सिंबल वाला गाँव के बलजिंदर सिंह बताते हैं कि उनके पिता का नाम सरदार सुलखान सिंह और दादी का नाम श्रीमती राध कौर था। उनकी माँ का बचपन में ही देहान्त हो गया था। बलजिंदर सिंह की दादी ने ही उन्हें पाला-पोसा और बड़ा किया था।

उनके दादा महँगा सिंह वर्षों पहले भारत छोड़कर विदेश चले गए थे। महँगा सिंह का जन्म १८९४ में हुआ था और १९१६ से १९१८ तक वे ईस्ट अफ्रीका में रेलवे गार्ड का काम कर रहे थे। उसके बाद सितंबर १९२० में वे ऑस्ट्रेलिया आकर बस गए, लेकिन उनका परिवार उस समय पंजाब में ही था।

बलजिंदर ने अपनी दादी से वादा किया था कि वे एक दिन दादा को ज़रूर खोज निकालेंगे। उनकी दादी जिस तरह से अपने पति का हुलिया बयान करती थीं, उससे बलजिंदर के मन में दादा को ढूँढ़ने और उनसे मिलने की उत्सुकता पैदा होती थी। आख़िरकार बड़े होकर १९८६ में बलजिंदर अपने दादा को खोजने के लिए ऑस्ट्रेलिया आ गए।

बलजिंदर सिंह को अपने दादा के ठिकाने का पता लगाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी, क्योंकि महँगा सिंह नाम से कोई भी व्यक्ति रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं था। जैसा कि अक्सर होता है, भारतीय विदेश में आकर अपना नाम बदल लेते हैं या उसका अंग्रेज़ीकरण कर लेते हैं, ताकि लोगों को नाम लेने में आसानी हो। दादा का नाम भी बदल गया था—ऑस्ट्रेलिया में महँगा सिंह, चार्ल्स सिंह बन गए थे और अपने दोस्तों के बीच ‘इंडियन चार्ली’ के नाम से जाने जाते थे। इस दौरान उनका पत्राचार चलता रहा, लेकिन १९५८ के बाद उनके पत्र वापस आने लगे। बलजिंदर सिंह बताते हैं कि उनके दादा बहुत बुद्धिमान व्यक्ति थे। उन्होंने १९१० में मैट्रिकुलेशन किया था। उसके बाद उन्होंने ब्रिटिश रेलवे में नौकरी कर ली और दो वर्षों के लिए ईस्ट अफ्रीका चले गए थे। बाद में वे बर्मा भी गए।

वे कहते हैं—
“मेरे दादा कराची से जहाज़ में बैठकर सिडनी गए और उन्होंने वादा किया कि अगर उन्हें ऑस्ट्रेलिया अच्छा लगा तो सबको वहीं बुला लेंगे, नहीं तो घर वापस आ जाएँगे और फिर कभी बाहर नहीं जाएँगे। जिस वक़्त दादा ऑस्ट्रेलिया आए, उस वक़्त मेरी दादी ५ माह की गर्भवती थीं और मेरे पिता मेरे चाचा से ६ साल बड़े थे। बाद में दूसरे बेटे, यानी मेरे चाचा दिलीप सिंह का जन्म हुआ। दादी ने ऑस्ट्रेलिया आने से मना कर दिया। अकेले दोनों बच्चों—सुलखान सिंह, जो मेरे पिता थे, और दिलीप सिंह—को बड़ा किया, पढ़ाया-लिखाया और दोनों सरकारी अफ़सर की तरह रिटायर हुए। दादा मेरे पिता से पत्रों के माध्यम से १९४७ तक लगातार सम्पर्क में रहे, पर उनके बीच दादी को लेकर अक्सर लड़ाइयाँ होती रहीं। मेरी दादी अपने पति और मेरे दादा का ६३ साल तक इंतज़ार करती रहीं, लेकिन वे कभी नहीं लौटे।”

बलजिंदर सिंह ने आख़िरकार उन्हें ढूँढ़ निकाला। आइए, जानें उन्हीं के मुँह से—
“१९८६ में पहुँचने के बाद मैंने अपने दादा की खोज शुरू की। हालाँकि मुझे उनके नाम के सिवा कुछ भी मालूम नहीं था। कई वर्षों तक मेरे दादा सरदार महँगा सिंह का कोई सुराग नहीं मिला। मैंने अपने दादा के बारे में घोषणा करने के लिए एस.बी.एस. हिन्दी रेडियो से भी सम्पर्क किया। वहाँ उनके विवरण की घोषणा की गई, पर सारे प्रयास व्यर्थ रहे।

मैंने हार नहीं मानी। मेरी खोज जारी रही। एस.बी.एस. पंजाबी रेडियो पर एक लेखक और इतिहासविद लेन कैना का इंटरव्यू सुना, तो उनसे सम्पर्क किया। उन्हें अपने दादा की फ़ाइल भेजी और मदद माँगी। जुलाई २००९ में मुझे नेशनल आर्काइव ऑफ़ नेचुरलाइज़ेशन से सूचना मिली, तो आशा की किरण जगी। उससे मुझे कैमडेन, न्यू साउथ वेल्स में २१ मार्च १९५७ को दायर की गई फ़ाइल और मेरे दादा का पता मिला। अफ़सोस की बात यह थी कि वे जीवित नहीं थे। दादा की मौत १९५९ में हो गई थी। अंततः उनका मृत्यु प्रमाण पत्र और अन्य काग़ज़ात प्राप्त हुए। खोजबीन के दौरान उनकी क़ब्र का भी पता लगा, जो सिडनी के सबर्ब लिवरपूल के चर्च ऑफ़ इंग्लैंड सिमेट्री में है और उस पर चार्ल्स सिंह लिखा हुआ है।

इसके बाद मैंने वेस्ले चार्ल्स क्लिफ्टन और मैरी ऐनी एलिज़ाबेथ थॉरबर्न के बच्चों की तलाश शुरू की, जिन्होंने १९५७ में मेरे दादाजी की ऑस्ट्रेलियाई नागरिकता के लिए आवेदन किया था। मैंने वेस्ले चार्ल्स क्लिफ्टन के बेटे इयान क्लिफ्टन और मैरी ऐनी एलिज़ाबेथ थॉरबर्न की बेटी पेट्रीसिया मुली को उनके ८० के दशक के अंत में ढूँढ़ निकाला। वे मेरे दादाजी को अपने माता-पिता के मित्र के रूप में जानते थे।”

इस तरह बलजिंदर सिंह ने लगभग १० वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद बरसों से जुदा हुए दादा का पता और ठिकाना खोज निकाला। बलजिंदर सिंह के प्रयासों को ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स के प्रीमियर ने भी सराहा। बलजिंदर सिंह की तरह न जाने ऐसे कितने परिवार होंगे, जिनके परिजन वर्षों पहले ऑस्ट्रेलिया आकर बस गए होंगे और जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया के इतिहास और विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई होगी।

१ जुलाई २०२५

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