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कलम गही नहिं हाथ  

 

 

 

बंदर नहीं बनाते घर

अखबार में खबर है कि बंदर मनुष्य की तरह अपनी भूलों से सीखने की प्रवृत्ति रखते हैं। शिकागो ड्यूक यूनिवर्सिटी मेडिकल कॉलेज के शोधकर्ता बेन हेडेन इस गुरुवार को प्रकशित जरनल साइंस में कहा है कि वे अनेक सालों से अपनी टीम के साथ बंदरों के साथ किये जाने वाले  प्रयोगों द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं।  

बंदर हमारे पूर्वज रहे हैं और अगर वे यह प्रवृत्ति रखते हैं तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं। तब से मनुष्य हजारों साल आगे बढ़ चुका है। वह अब खुद गलती करने तक प्रतीक्षा नहीं करता वह दूसरों की गलती से सीखता है। बेन साहब अपने शोध के परिणामों से जितने उत्तेजित दिखाई पड़ते हैं उतने शायद न भी होते अगर  अमिताभ बच्चन का ब्लॉग नियमित पढ़ते होते। इसमें जनवरी के किसी अंक में लिखा था- "दूसरों की ग़लतियों से सीखें। आप इतने दिन नहीं जी सकते कि खुद इतनी ग़लतियाँ कर सकें।" देखिए देखिये भारतीयों की सोच कितनी परिपक्व है। हमारे तो फिल्म स्टार तक जानते हैं कि अपनी गलतियों से सीखने तक प्रतीक्षा करना कोई बुद्धिमानी की बात नहीं। जब फ़िल्म स्टार इतने विद्वान हैं तो बुद्धिजीवियों की बात तो दूर है।

न... न... मेरे कुछ विदेशी मित्र इस बात से सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं कि मुझे भारतीय बुद्धिजीवियों को अमिताभ बच्चन से अधिक बुद्धिमान सिद्ध करने की भूल नहीं करनी चाहिए। अनेक बुद्धिजीवियों के पिता बुद्धिजीवी नहीं होते, उनमें बुद्धिजीवी जींस की कमी भी हो सकती है। लेकिन अमिताभ बच्चन के तो पिता ही बुद्धिजीवी थे सो वे अनेक बुद्धिजीवियों से बेहतर भी हो सकते हैं। मैं इस तरह की बहस में नहीं पड़ना चाहती हूँ। वैज्ञानिकों का भरोसा नहीं, वे मानव और बंदर दोनो के लिए एक सी भाषा का प्रयोग करते हैं। भाषा तो मैंने सहन कर ली लेकिन व्यवहार तो सहन नहीं होगा न?

व्यवहार से याद आया- बंदर और मनुष्य के व्यवहार में और भी भिन्नताएँ हैं। मनुष्य आज भी घर को अपने जीवन की पहली आवश्यकता समझता है जबकि बंदर घर नहीं बनाते। बंदरों को घर बनाने की सलाह देने वाली बया के घोंसले का क्या हाल हुआ था यह बहुत से लोग जानते होंगे।  कुछ दिन पहले ज्ञान भैया के ब्लॉग पर पंकज अवधिया जी द्वारा पोस्ट की गई एक कविता पढ़ी थी, आज वह याद आ रही है-

बंदर नहीं बनाते घर, घूमा करते इधर उधर
आकर कहते- खों-खों-खों, रोटी हमें न देते क्यों?
छीन-झपट ले जायेंगे, बैठ पेड़ पर खायेंगे।

पूर्णिमा वर्मन
१८ मई २००९

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