हाँ, इस बात पर सभी एकमत थे कि
महँगाई चाहे पेट्रोलियम पदार्थों की वजह से बढ़े या खाद्य-पदार्थों की वजह से, इसका
खामियाजा आम आदमी को ही भुगतना पड़ता है। जेब कटती है तो आम आदमी की, पेट काट-काटकर
की गई बचत को दीमक चाटती है तो आम आदमी की और पेट पिचकता है तो आम आदमी का।
अब हम कोई रईसजादे तो थे नहीं कि महँगाई पर छपी ढेर सारी खबरों का हम पर कोई असर
नहीं होता। सरकारी दफ़्तर में बाबू ही तो थे। वही नौ से पाँच की नौकरी और
बँधी-बँधाई तनख्वाह। कोई ऊपरी आमदनी भी नहीं। महँगाई से आहत हम अपना सिर धुनने ही
लगे थे कि श्रीमती जी ने रेडियो चालू कर दिया, ‘रसोई गैस की कीमतें पचास रुपए तक बढ़ा
दी गई हैं। सरकार का मानना है कि सिर्फ पैट्रो पदार्थों की वजह से ही महँगाई नहीं
बढ़ी है बल्कि लौह अयस्क, स्टील, कपास, दूध, सी-फिश और संतरे जैसी वस्तुओं का भी
इसमें बड़ायोगदान है...।’ मन में आया कि वहीं बैठे-बैठे चप्पल उठाकर रेडियो पर दे
मारे पर हिम्मत नहीं पड़ी। क्योंकि जमीन पर गिरकर रेडियो टूटता तो हमारा और बहुत
संभव है चप्पल भी जख्मी हो जाती। अब ये रिस्क लेने को हम कतई तैयार नहीं थे। कल रात
पता नहीं किसकी शक्ल देखकर सोए थे कि सुबह छः बजे से आठ बजे तक महँगाई के बारे में
ही पढ़-सुन रहे थे। हमें याद आया कि रात को चेहरा तो हमने अपना ही देखा
था। लेकिन चेहरे का महँगाई से क्या संबंध?
चूँकि महँगाई रूपी कीट हमारे दिमाग में घुसकर
खूब उत्पात मचा रहा था इसलिए हमारा दिमाग घूमने लगा। हमें ऐसा लगा जैसे कोई बड़ी-बड़ी
घीया, कद्दू, आलू, प्याज, लौकी हमारे सिर पर फोड़ रहा है और हम पगलाने लगे हैं। बड़ी
मुश्किल से हमने अपने दिमाग पर नियंत्रण कर खुद को संभाला क्योंकि हम बैठे बिठाए
पगलाने के इलाज का खर्च तो कम से कम नहीं ही वहन कर सकते थे।
तभी श्रीमती जी की आवाज कानों में पड़ी, ‘मुन्ना के बापू, चाय बना दें....?’
हम दो कप चाय पीते हैं एक अखबार पढ़ने से पहले और दूसरा अखबार पढ़ने के बाद। लेकिन
महँगाई की मार को देखते हुए हमने चाय के दूसरे कप के लिए मना कर दिया। श्रीमती जी
को हमारी ‘ना’ से बड़ी हैरानी हुई। बोलीं, ‘क्या बात है मुन्ना के बापू, तबियत तो
ठीक है?... दूसरी चाय काहे नहीं पीओगे?’ हमने कहा, ‘भागवान, अब एक कप पर ही गुजारा
करना पड़ेगा। चायपत्ती, चीनी, दूध, गैस, तेल, अनाज सबकी कीमतें आसमान तक उछल रही
हैं। टिफिन में भी तीन की बजाए दो ही रोटी
रखना। आज से हम पानी ज्यादा पिया करेंगे। और देखो, तुम भी अपनी एक रोटी कमकर दो।
बैठे-बैठे मुटिया रही हो।’
श्रीमती जी को अपनी रोटी कम करने की बात इतनी नागवार गुजरी कि कमरे में जाकर एक
मुड़ी-तुड़ी लाल-सी पर्ची उठा लाई। हमने पूछा क्या है तो तुनककर बोलीं कि खुद ही देख
लो।
हमने पर्ची खोल कर देखी तो पानी का बिल था।
यानि श्रीमती जी ने जले पर नमक छिड़कते हुए जता दिया था कि देखती हूँ अब कितना पानी
पीते हो। आए बड़े मेरी रोटियाँ गिनने वाले, हुँह...।
ऑफिस पहुँचे तो वहाँ भी यही चर्चा गर्म थी। हर बाबू के पास महँगाई का ही किस्सा था।
महँगाई से निपटने के लिए युद्ध स्तर पर कई तरह की योजनाएँ बनाई जा रही थीं। बाबू
अपनी बरसों पुरानी आदतें तक बदलने को तैयार थे। एक कह रहा था मैं पाँच की बजाए तीन
बीड़ी ही पिया करूँगा। अब ये कहने वाला ही जानता था और हम भी जानते थे कि किसी भी
तरह के नशे की लत वाले लोग मुसीबत के समय अपने नशे की मात्रा बढ़ा तो सकते हैं लेकिन
घटा कदापि नहीं। फिर भी कहने में क्या हर्ज था। दूसरा कह रहा था कि अब मैं दो लीटर
के बजाए डेढ़ लीटर दूध ही लिया करूँगा और आधा लीटर पानी मिला दिया करूँगा। यानि नमक
लगे ना फिटकरी और रंग चौखा। दूध में पानी मिलाने की बात पर हमें अपना पानी का बिल
याद आ गया कि भई इसकी हैसियत इतनी तो है कि दूध में पानी मिला सके। तीसरा अपने
बच्चों को प्राइवेट स्कूल से निकालकर सरकारी स्कूल में दाखिल करने की बात कर रहा
था। यानि जो सरकार बढ़ती महँगाई पर आँखें मूँदे बैठी है उसी की शरण में जाने की
कोशिश। अब सरकारम् शरणम् गच्छामि के अलावा मरता क्या ना करता। चौथे को कोई फिक्र
नहीं थी। उसका कहना था कि वह कर्ज लेकर अपनी सारी जरूरतें पूरी करेगा और छठे वेतन
आयोग के बाद मिलने वाले एरियर से अपना सारा कर्जा चुकता कर देगा। लेकिन छठे वेतन
आयोग की रिपोर्ट का तो कहीं दूर-दूर तक
अता-पता नहीं था।
यानि जितने बाबू, उतनी योजनाएँ, उतने बदलाव। हमने भी अपनी चाय और रोटी में कटौती की
योजना बताई तो सब हमारा मुँह देखने लगे। अब उन सबमें सबसे ज्यादा लाचार और तंगहाल
तो हम ही थे क्योंकि जिनकी बीवियाँ भी कमाती थीं। उन्हें तो कोई फर्क पड़ने वाला था
नहीं। उलटा वे तो महँगाई भत्ते और मकान भत्ते में होने वाली बढ़त से खुश ही थे जबकि
हमें लग रहा था कि हमें ‘सिटी ब्यूटीफुल’ से दूर किसी दूर-दराज के छोटे-से कस्बे
में ही प्रस्थान करना पड़ेगा।
शाम को टेलीविजन चालू किया तो हर चैनल पर पिछले
एक घंटे से महँगाई का ही रोना रोया जा रहा था, ‘आज हम आपको बताएँगे कि कैसे महँगाई
चुपके से आकर हमारी जेबों को काट रही है, हमारी बचत को चट कर रही है। महँगाई रूपी
साँप कैसे अपना फन उठाकर हमारी खाने-पीने की चीजों को विषैला कर रहा है। कैसे. . .?
कैसे. . .? महँगाई के दानव से लड़ना है तो अब जाग जाओ. . .।’
और अगले ही पल हमारा ध्यान भंग हो गया। श्रीमती जी ने सुबह की तरह ही एक लाल-सी
मुड़ी-तुड़ी पर्ची हमें फिर पकड़ा दी। हम पहले ही चोट खाए हुए थे इसलिए तुरंत समझ गए।
झट से टेलीविजन बंद कर दिया। हमने महसूस किया कि हमारी श्रीमती जी को भी घर-खर्च की
उतनी ही चिंता है जितनी हमें। आवाज में शहद घोलते हुए हमने कहा, ‘हमारी सबेरे की बात
दिल को मत लगाना। पेट भर रोटी खाई कि नहीं? कित्ती दुबला रही हो। हम कुछ ना कुछ
जुगाड़ करेंगे।’
श्रीमती जी पसीज गई, ‘का जुगाड़ करोगे? सारा दिन तो दफ्रतर में खटत हो।’
‘तुम चिंता काहे करती हो?. . .और नहीं तो सुबह
उठकर ‘हिंदुस्तान’ ही बेचेंगे।’
‘का?’ श्रीमती जी की आँखें भय से फैल गईं।
‘हमारा मतलब है, अखबार बेचेंगे। पैसा भी मिलेगा और महँगाई की खबरें भी नहीं पढ़नी
पड़ेंगी।’
‘काहे. . .?’
अरे भई, जब टैम ही नहीं होगा तो खबरें कब पढ़ेंगे?’
श्रीमती जी की आँखें छलकने को हो आईं। हमने बात का रुख बदलते हुए कहा,
‘मुन्ना का कर रहा है?’
‘अभी सोया है। बहुत थक गया था। आज स्कूल से पैदल आया है।’
‘पैदल क्यों?. . .रिक्शा वाला नहीं आया क्या?’
श्रीमती जी कुछ नहीं बोलीं।
हम सब समझ गए।
‘देखो मुन्ना की माँ, अब हम इतने गए-गुजरे भी नहीं है कि अपने फूल-से मुन्ना को पैदल
स्कूल भेजें। कल रिक्शावाले को बोल देना कि हमार बबुआ को घर से स्कूल और स्कूल से
घर छोड़कर जाया करे, हाँ. . .।’
मुन्ना की स्कूल की छुट्टियाँ होने पर इस बार हमने गाँव जाने का कार्यक्रम बनाया था
ताकि अपने माँ-बाबूजी से मिल सकें लेकिन हाय री महँगाई! हमें अपनी यह हसरत पूरी होती
नजर नहीं आ रही थी। काफी देर तक हम इसी उधेड़-बुन में रहे कि इस महँगाई रूपी राक्षस
से कैसे निपटा जाए।
हमने कहीं पढ़ा था कि अगर खाना धीरे-धीरे चबा-चबाकर खाया जाए तो खाने के दौरान
मस्तिष्क अपना सिगनल सही समय पर ‘सेंटैटी सेंटर’ में पहुँचा देता है। यानि यह वह
अवस्था होती है जब व्यक्ति को खाना खाने के बाद संतुष्टि होने का संदेश मिलता है और
जाहिर है इसके बाद कोई भी व्यक्ति ज्यादा नहीं खा सकता। इस अनोखी तकनीक से खाना
खाने से व्यक्ति को कैलोरी, ऊर्जा तो मिलती ही है साथ ही उसका शरीर स्वस्थ भी बना
रहता है। जबकि जल्दी-जल्दी खाना खाने से व्यक्ति अधिक खा लेता है और इससे पहले कि
ब्रेन सिगनल ‘सेंटैटी सेंटर’ तक पहुँच पाए व्यक्ति की तोंद खाने से ठूँस-ठूँसकर भर
चुकी होती है।
भला हो उन डॉक्टरों का जिन्होंने ऐसी-ऐसी महान खोजें की हैं जो मुसीबत के वक्त काम
आ सकती हैं। वैसे हमारे बुजुर्ग तो सदियों से कहते आ रहे हैं कि खाने का एक कौर कम
से कम बत्तीस बार चबाकर खाना चाहिए लेकिन आज की
रफ्तार-भरी जिंदगी में इतना धीरज किसके पास है।
हमने भी आज चाय और रोटी में कटौती की थी। सोचा रात का भोजन इसी तकनीक से किया जाए।.
. .लेकिन यह क्या? हम तो भोजन पर ऐसे टूट पड़े जैसे कुत्ता हड्डी पर। और जब तक ब्रेन
सिगनल हमारे ‘सेटैटी सेंटर’ तक पहुँचता हम पाँच रोटियाँ डकार चुके थे। फिर भी हमने
हिम्मत नहीं हारी। एक नुस्खा फेल हुआ तो क्या हुआ। हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा।
डॉक्टरों द्वारा ईजाद किए गए कई और नुस्खे भी हमारे मस्तिष्क में चक्कर काटने लगे।
मसलन, नीम की दातुन करने से दाँत और मसूढ़े स्वस्थ रहते हैं। ज्यादा नमक, मिर्च, घी,
तेल, चीनी और मसालों का उपयोग स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। हमारे घर के सामने ही
नीम का पेड़ लगा है लेकिन हमें उसकी कभी याद नहीं आई थी। पर आज हमने कॉलगेट को
अलविदा कहने का मन बना ही लिया।
सरकार भी जानती है कि हिंदुस्तानकी जनता इतनी चतुर और कुशल तो है ही कि स्वयं को
परिस्थितियों के अनुसार ढाल सकती है। सरकार की सोच पर मुहर लगाने के ख्याल से हम कमर
कसकर राशन की सूची बनाने बैठ गए और हिसाब लगाया कि यदि आटे में तीन किलो, चीनी में
आधा किलो, चायपत्ती में दो सौ ग्राम, घी में आधा किलो, दूध में आधा लीटर और नमक,
मिर्च, मसालों, सब्जियों में एक निश्चित हिसाब से कटौती की जाए तो कितने रुपयों की
बचत हो सकती है कि उतनी ही तनख्वाह में पूरा महीना आराम से निकल जाए। हम उँगलियों
पर हिसाब लगाते जा रहे थे। गणित में बेशक हम जरा कमजोर हैं लेकिन घर के राशन-पानी
की व्यवस्था हम इस प्रकार करना चाहते थे जैसे कोई चार्टर्ड अकाउंटेंट
किसी कंपनी का लेखा-जोखा रखता है।
बड़ी कार्य-कुशलता से हमने राशन की सूची तैयार करके अपने तकिए के नीचे इस ख्याल से रख
ली कि इससे पहले कि महँगाई के तेवर और बढ़ें सुबह उठकर सबसे पहले सुपर बाजार से राशन
लेकर आएँगे।
सुबह से शाम महँगाई का जाप करते-करते ना जाने कब हमारी आँख लग गई।
‘आग लग गई...आग लग गई. . .।’
चारों तरफ से कुछ ऐसी ही आवाजें आ रही थीं। लोग इधर-उधर भागे जा रहे थे। हमने एक
आदमी को रोक कर पूछा, ‘भाई, आग कहाँ लगी है?’
‘उधर, गर्म बाजार में।’
‘गर्म बाजार में?. . .कैसे?’
‘मियाँ, खुद ही देख लो। हमसे क्या पूछते हो।’ उसने हमें ऐसे घूरा जैसे हम कोई अजूबा
हों।
हम आगे बढ़ते गए। एक तरफ बड़ा ही विचित्र नजारा था। कुछ गधे गाड़ियों को खींच रहे थे।
हमने फिर किसी से इसका कारण पूछा। पता चला कि पेट्रोल की कमी गधों से पूरी की जा
रही है। कुछ और दूर गए तो कुछ युवतियाँ ‘शार्ट्स’ में घूम रही थीं। तहकीकात की तो
पता चला कि कॉलेज की लड़कियों ने अपने कपड़ों में कटौती करके महँगाई के खिलाफ अभियान
छेड़ा है। एक पल के हमारे मस्तिष्क में हलचल हुई कि महँगाई और कितनी बढ़े कि ‘शाटर्स’
शब्द के सामने ‘अति’ शब्द और जुड़ जाए। तभी हमें पत्थर से ठोकर लगी और हम लंगड़ाते
हुए जैसे-तैसे गर्म बाजार पहुँचे।
‘भिंडी कैसे दी?’ हमने एक रेहड़ी वाले से पूछा।
‘दो रुपए की एक।’ कहकर उसने सब्जियों पर पानी का छिड़काव करना शुरू कर दिया।
हम आश्चर्यचकित. . . भौंचक्क। दूसरी रेहड़ी पर पहुँचे।
‘भइया, प्याज कैसे दिए?’
‘बीस रुपए का एक।’
हम तो जैसे आसमान से गिरे।
‘और ये आलू, टिंडे, लौकी, टमाटर?’
‘आलू १५ रुपए का एक, टिंडे १४ के दो, टमाटर १० का १०० ग्राम और लौकी ८० रुपए प्रति
नग।’
उसने एक झटके में हमें सारी जानकारी दे दी। अब हमें समझ आ गया था कि गर्मबाजार में
कौन-सी आग लगी है।
‘कितना तोल दूँ?’ रेहड़ी वाले नेहमें किंकर्त्तव्यविमूढ़ देखा तो खुद ही पूछा।
हम बिना कोई जवाब दिए और आगे बढ़ गए जहाँ एक फल वाला आवाज लगा-लगाकर ग्राहकों को बुला
रहा था।
‘बाबूजी, हमारी रेहड़ी वाला ठीक होगा। बाकी सबने तो लूट मचा रखी है। इस बार रेट
पूछकर हम अपनी मानसिक शांति भंग नहीं करना चाहते थे अतः तुरंत आदेश दिया, ‘दो किलो।’
रेहड़ी वाला हमें आँखें फाड़कर देखनेलगा।
‘ऐसे कैसे देख रहे हो भइया?. . तोलो. . .आम तोलो. . .।
उसने हमें फिर ऐसे घूरा जैसे हम पगला गए हों या किसी अजायबघर से आए हों।
‘ये लो साहब. . .आपने अच्छी बोहनी करवा दी। घर में जरूर कोई फंक्शन होगा। अब बाकी
आधा किलो आम और बचे हैं। भगवान की दया से आपके जैसे ग्राहक रोज मिल जाएँ तो. . .’
‘तो. . .तो क्या. . .?’
‘कुछ नहीं बाबूजी. . .भगवान बड़ा दयालु है।’
हमें उसकी बात का अर्थ तो समझ नहीं आया।
हमें उसकी बात का अर्थ तो समझ नहीं आया। बहरहाल हमने पूछा, ‘कितने पैसे हुए?’
‘४२० रुपए साहब।’
‘क्या. . .?’ हमें जैसे गश-सा आ गया।
‘होश में तो हो?’
‘आप ४१८ रुपए दे देना। सुबह-सुबह बोहनी का टाइम है। दो रुपए हम छोड़े देतेहैं।’
‘साला, चार सौ बीस।’ हमने मन ही मन उसे कोसा और आमों से भरा थैला उसकी रेहड़ी पर
उलटाकर बुड़बुड़ाते हुए आगे बढ़ गए। रेहड़ी वाले की लानतें-मलानतें दूर तक हमारे कानों
में लट्ठ मारती रहीं। हमारी गर्दन शर्म से झुकी जा रही थी।
हम लगभग दौड़ते हुए राशन की एक बड़ी-सी दुकान जिस पर ‘उचित दर का राशन मॉल’ का बड़ा-सा
बोर्ड लगा था, में घुस गए। इतनी बड़ी दुकान में सिर्फ एक ग्राहक था और पूरी की पूरी
दुकान खाली पड़ी थी। नौकर उस इकलौते ग्राहक को सामान तोल रहा था और दुकानदार
टेलीविजनपर समाचार देख रहा था। बेचारा और कर भी क्या सकता था।
हमने उसकी ओर कोई खास तवज्जो नहीं दी और ‘शो-केस’ में रखे खाद्य-पदार्थों को
निहारने लगे। छोटे-छोटे खानों में हरवस्तु का थोड़ा-थोड़ा माल रखा हुआ था। हमने मन ही
मन दुकानदार की तारीफ की। रहा नहीं गया तो कह ही दिया, ‘आपका प्रबंधन बहुत बढ़िया
है। ऐसा तो हमने पहली बार ही देखा है कि आटा, दाल, चावल, चीनी, घी, तेल आदि को नमूने
के तौर पर‘शो-केस’ में सजाकर रखा गया हो। ग्राहक को इससे बहुत सुविधा रहती है।’
दुकानदार ने हमारे चेहरे की ओर ऐसे देखा कि हम यहाँ भी नर्वस हो गए।
‘लगता है घर की सारी शॉपिंग आपकी धर्मपत्नी करती हैं। ये जो ‘शो-केस’ में सामान रखा
हुआ है ना, ये नमूने के लिए नहीं है। बोलिए क्या-क्या तुलवा दूँ?’
‘तभी टेलीविजन पर समाचार वाचक की आवाज सुनाई पड़ी, ‘महँगाई की खबर सुनकर चार
रिक्शेवालों की मौत। दो मजदूरों ने महँगाई के बोझ तले दम तोड़ा. . .। तीन कामवालियाँ
घायल जिनकी हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है। कद्दू के नीचे दबी एक कामवाली को बड़ी
मुश्किल से क्रेन की सहायता से बाहर निकाला गया। बाकी दोनों कामवालियाँ आलू और
प्याज के नचे दब गई थीं जिन्हें उनके दयालु मालिकों ने बड़ी हिम्मत से बचाया। खबर
मिलने तक उनकी साँसें रुक-रुककर चल रही थीं।’
खबर सुनकर हमारी साँस भी रुकनेलगी। शब्दों की संवेदना हमारे कानों से उतरकर दिल में
समा रही थी। प्रतिदिन कमाकर खाने वालों की हालत वाकई दयनीय होती है। काम मिला तो ठीक
नहीं तो फाके। ऐसे लोग बेचारे गर्मी में लू और सर्दी में ठंड से ही मर जाते हैं।
अनायास हमारी नजरें टी.वी. स्क्रीन तक गईं। देखा एक मजूर चावल और दूसरा गेहूँ के
दाने के नीचे अभी भी दबा पड़ा था। अब हमारा दुकान में खड़ा रहना भी मुश्किल हो गया।
हमने फटाफट राशन की सूची दुकानदार को थमाई और कहा कि राशन घर भिजवा दे। पैसे भी
वहीं दे देंगे। दुकानदार ने हमें एक ‘स्क्रैच-कार्ड’ पकड़ा दिया और बताया कि ‘लक्की
कूपन स्कीम’ चालू की है जो भी उपहार निकले दुकान पर आकर ले जाना। हमने सोचा इतने
बड़े ‘मॉल’ के मालिक ही ऐसी आकर्षक योजनाएँ चलाते हैं, शायद वॉशिंग मशीन या फ्रिज ही
निकल आए।
सब्जी के बिना भी गुजारा मुश्किल ही था। सोचा थोड़ी-बहुत सब्जी और मुन्ना के लिए
एक-आध फल भी खरीदते चलें। हम नजरें बचाकर दोबारा गर्म बाजार पहुँचे। आम और सब्जी
वाले ने हमें देखकर मुँह दूसरी तरफ फेर दिया। हम भी उनसे छुपते-छुपाते दूर कोने में
खड़ी रेहड़ियों के पास पहुँचे। मोलभाव करने के पश्चात हमने दस भिंडियाँ, दो प्याज, दो
आलू और दो सौ ग्राम टमाटर खरीदे। लौकी खरीदने की हमारी हिम्मत नहीं हुई। मुन्ना के
लिए एक आम खरीदा जो काफी झकझक के बाद रेहड़ी वाले ने हमें पचास रुपए में दिया।
फल और सब्जी खरीदने के बाद हम थैला और मुँह दोनों लटकाए घर पहुँचे तो नौकर राशन लेकर
खड़ा था। बिल देखकर हमें नानी याद आ गई। भुगतान के लिए चालीस रुपए कम पड़ गए। कहाँ से
लाएँ?
हम चाहते तो नहीं थे लेकिन मुन्ना की गुल्लक तोड़ने के अलावा इस समय हमारे पास कोई
और चारा नहीं था। अब केवल एक पाँच का सिक्का ही गुल्लक में शेष रह गया था।
तभी हमें ‘स्क्रैच कार्ड’ का ध्यान आया। हमने कमीज की जेब टटोली और कार्ड श्रीमती जी
के हवाले कर कहा कि भई, तुम तो घर की लक्ष्मी हो, अन्नपूर्णा हो, तुम्हीं स्क्रैच
करो शायद तुम्हारे भाग्य से कोई बढ़िया आइटम निकल आए। श्रीमतीजी ने खुशी-खुशी कार्ड
स्क्रैच किया। लिखा था, ‘मॉल पर पधारने के लिए धन्यवाद। कृपया इसी तरह मनोबल बनाए
रखें।’ यानि ऊँची दुकान, फीका पकवान। कार्ड पढ़कर श्रीमती जी ने हमें ऐसे देखा जैसे
हम बहुत बड़े बेवकूफ हों। पर खुदा की कसम! पता नहीं क्यों, हमें मॉल के मालिक पर
बिल्कुल भी गुस्सा नहीं आया।
खैर! श्रीमती जी ने पुराने डिब्बों को टांड पर रख सारा राशन छोटी-छोटी डिब्बियों,
दवा की खाली शीशियों और नमकदानी में भरा और कहने लगीं कि मुन्ना को खाँसी और बुखार
है। ए.टी.एम. से कुछ रुपए निकाल लाओ। मुन्ना के लिए कैमिस्ट से दवाई लेते आएँगे। कम
से कम डॉक्टर की फीस के पैसे तो बचेंगे।
मुन्ना को बुखार की बात सुनकर में पसीने छूटने लगे। हमने उसे गोद में उठायाऔर
दुलारने लगे। मुन्ना के बुखार की तपन से हमारा तन और मन दोनों जल रहे थे। धन कितना
जलेगा इसकी खबर अभी हमें नहीं हुई थी। उसे गोद में लिए-लिए पैदल ही ए.टी.एम. तक
पहुँचे। इतना भी ध्यान नहीं रहा कि साइकिल पर ही बिठा लें। ऐसी बात नहीं है कि हमारे
पास स्कूटर नहीं है। है भई। आखिर सरकार स्कूटर-लोन किसलिए देती है। वो बात अलग है
कि अभी तक किश्तें नहीं उतरी हैं। न्यूनतम दर पर जो बनवाई हैं। समय तो लगेगा। लेकिन
पेट्रोल कहाँ से लाएँ? अपनी ही टंकी पिचक रही है तो स्कूटर की टंकी कहाँ से भरवाएँ?
हमें सबसे ज्यादा गुस्सा इस पापी पेट पर ही आता है कि ऐ खुदा! तू अगर पेट नहीं लगाता
तो तेरा क्या बिगड़ जाता।
खैर! ए.टी.एम. पर बैलेंस चैक किया तो खाते में सिर्फ सौ रुपए ही शेष थे। अब या तो
मुन्ना की खाँसी की दवा ले लो या बुखार की। हमने सोचा कि खाँसी की दवा में अल्कोहल
की मात्रा काफी रहती है। दवा पीकर मुन्ना चैन की नींद तो सो रहेगा। यही सोचकर हम
खाँसी की दवा खरीदकर घर आ गए और सोचने लगे कि किस-किस खर्च में और कटौती की जाए कि
मुन्ना की बुखार की दवा भी आ जाए। दवा पीकर मुन्ना चैन से सो गया। उसके इस तरह काफी
देर तक चैन से सोए रहने से हम घबरा गए और चिल्लाने लगे, ‘मुन्ना. . .मुन्ना. .
.मुन्ना. . .।’
‘क्या हुआ मुन्ना के बापू. . .बेमौसम क्यों चिल्लाते हो?’ श्रीमती जी ने हमें
झिंझोड़ा तो हम चौंककर उठ बैठे।
‘मुन्ना कहाँ है?’ हमारे हलक से बमुश्किल आवाज निकली।
‘मुन्ना तो मजे में सो रहा है। आज स्कूल की छुट्टी जो है।’
हमारी जान में जान आई। शुक्र है हमस्वप्न-लोक में विचरण कर रहे थे क्योंकि सुपर
बाजार की महँगाई से निपटने के लिए ही हमें कितने पापड़ बेलने पड़ रहे थे ऊपर से ये
गर्म बाजार की महँगाई. . .? उफ!
तौबा-तौबा! उसने तो हमें भिंडी, लौकी, टमाटर, प्याज और राशन के ऐसे-ऐसे हथौड़े मारे
कि हम अभी तक सदमे में हैं।
हमने महसूस किया कि हम शक्तिहीन होते जा रहे हैं। इस लोक की महँगाई स्वप्नलोक में
भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रही थी। हम बेहद दहशत में थे क्योंकि हमने सारे उपाय करके तो
देख ही लिए थे। अब इसके अलावा हम और कर भी क्या सकते थे कि सिर पकड़कर सिर्फ और
सिर्फ यह सोचें कि इस देश के डॉक्टरों ने ऐसी कौन-सी तकनीक या दवा ईजाद की है जो
महँगाई के साथ-साथ उसके खौफ से भी निजात दिला सके। |