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मेरी सहेलियाँ, आस-पास के सब छोटे और मेरे साथ के बड़े बच्चे घेर कर खड़े थे, हमारी कार। और क्या अब तो कार हमारी ही थी। मैंने सबको दूर किया था, अरे सबके सब गंदे हाथ से छुए डाल रहे थे, वैसे मैंने भी पहली बार कार छुई थी, पर कार तो मेरी थी तो मना भी मैं ही करूँगी ना। इतनी चिकनी इतनी बड़ी, ऑटो तो छोटा-सा, पुराना भी कितना था।

मम्मी पापा बाहर आए और आज किसी से बोले ही नहीं। सब पड़ोसी, कुछ घरों के भीतर से और कुछ बाहर निकल कर देख रहे थे, हमारी कार। उसकी सीट कितनी चिकनी थी, प्रिन्स और मुझे पापा ने जैसे ही इशारा किया, खट्ट से पीछे बैठ गए, सही में बहुत मुलायम सीट थी। मम्मी भी पीछे बैठ रही थी, कि पापा बोल पड़े,
"अरे हियओ सीट है, आगे आओ रानी जी।'' मम्मी शर्मा जाती हैं, पापा की ऐसी बातों से।
कार हमारी बस्ती की कच्ची गलियों से निकली, पक्की चिकनी सड़क पर दौड़ने लगी। पर ये सड़क है बड़ी ही खतरनाक... कितनी बार देखा है एक्सीडेंट होते हुए। "अरे धीरे चलाओ", मम्मी ने पापा से धीरे से कहा था। पापा ने पीछे हम लोगों को खिड़की से झाँकते देखा, "भई ठीक ते बैठओ।", झिड़की दी हमें और मम्मी की बात दोनों को और कार और तेज़ कर दी, मम्मी को देखा मैंने, थोड़ा-सा खिड़की की तरफ़, पापा से दूर सरक गईं। फिर बहुत दूर घुमाया पापा ने। प्रिन्स तो बार-बार खिड़की पर अपने को देख रहा था, शीशे में, अपने में ही मस्त, छोटा है ना। मैं भी खिड़की पर ही आँखें लगाए थी, कभी-कभी झुक कर सामने वाले बड़े शीशे से सड़क देखती थी। एक बार मन किया था की पीछे वाले शीशे से भी देखा जाए, दूर भागती सड़क कैसी लगती होगी, देखा तो जाए? पर पापा के डर से नहीं देखा। जगह-जगह बड़ी-बड़ी तैयारियाँ, सड़कें खाली एकदम, बस कहीं-कहीं नाचने गाने की धूम। पापा ने ११ बजे वापस हमें घर ला दिया। मन भर घूमे थे आज, और वो भी बड़ी-सी कार में। दिन में तो और भी मज़ा आता होगा ना। मुझे तो अभी भी कार की गुलगुली सीट ही याद आ रही है।

उस चमक दमक से दूर हमारी बस्ती में जिसके सामने वो ऊँची इमारतें हैं, कितनी फीकी-सी है। पर मैं तो रहती हूँ यहीं, प्रिन्स मम्मी और पापा भी। यही तो है वो जगह जहाँ से गाँव से यहाँ आए मेरे पापा के आगे बढ़ने बड़ा आदमी बनने के सपने शुरू हुए थे। चमक-दमक, कार, ये घूमना-फिरना एक दिन की खुशी है और हमारी बस्ती हमेशा साथ रहने वाली खुशी, पर हाँ ये त्योहार भी तो एक दिन की खुशी ही तो हैं। पता नहीं पूछूँगी कभी किसी से कि कौन-सी खुशी बड़ी है। मुझे तो लगता है कि खुशियाँ तो बस खुशियाँ हैं, छोटी बड़ी कैसे? पता नहीं। वो १२ बजे घर से ही देखा था अभी, कहीं पटाखे छूट रहे थे...कितनी चमक थी। जैसे कितने सारे तारे एक साथ निकल आए थे ऊपर आसमान में, गिरते हुए से, छिटक कर हर कहीं फ़ैलते हुए से।
"हे दुर्गा महरानी, हर नवा साल ऐसेहे आवए", मम्मी ने पापा से जब वो फिर वापस जा रहे थे कहा था, पापा हँसे थे, जैसे कि ऐसा कहाँ, होता है। मम्मी का नाम आशा कितना सही है। बाहर पापा फिर आ गए हैं, बुला रहे हैं शायद...अभी आई...देख कर आती हूँ...

दूसरी डायरी

ये एक नया साल है नए दिन, ५ जनवरी, नीता का नया भोर का तार चिपका होगा आकाश के किसी कोने में, हाँ एकदम ताज़ा नया नहीं ५ दिन बूढ़ा। इतने दिन हम बस इतने व्यस्त थे, इतने खुश थे की सोच ही नहीं पाए कि कोई डायरी भी थी जो रोज़ लिखी जाती थी।

३१ दिसंबर, दिल्ली की सर्दियों में तो, शाम के ३ कब बजे गए पता ही नहीं चला था, और आगे का समय जाने कहाँ पंख पसारे उड़ता चला गया, वो तो एकदम ख़याल ही नहीं। घर की डोर बेल बजी, नीता लेटी थी, मैंने उठ कर दरवाज़ा खोला तो, सामने क्या देखता हूँ, उदय खड़ा था। हाँ उदय आया, बिना बताए, "सरप्राइज़ पापा...सरप्राइज़।'' किसी समय एकाएक इतनी खुशी मिले तो शब्द भी साथ छोड़ देते हैं। नीता ने आवाज़ सुन ली थी, उसी से बँधी दौड़ती चली आ रही थी, बाहर आई, और हर बार की तरह मुझे भूल नीता से लिपट गया उदय। एक लड़की भी साथ थी, मैं समझ गया, आशा है। पीछे सामान खींचती-सी, चुपचाप खड़ी थी। कुछ दिनों पहले उदय ने हमें आशा के बारे में बताया था।
"पापा, एक लड़की है, मेरे साथ ही पीएच.डी. कर रही है, आशा पोवेल, आशा की माँ इंडियन है, पर वो कभी आई नहीं इंडिया।'' उदय शादी करना चाहता है उससे, और शादी भी कहाँ यहीं इंडिया में। आशा की ही ज़िद है। हमारी भी बात कराई थी आशा से। नीता खुश थी, बहुत खुश। कहती है अच्छी लड़की है। नीता की आँखों में मैं अपनी माँ की आँखों में हमेशा बसा रहा, अपने मन कि बहू, खुद ना ढूँढ़ पाने का दर्द नहीं खोज पा रहा हूँ। मेरी माँ-, नीता और मेरी खोज सब मिल कर निदा फ़ज़ली कि कविता याद दिलाती हैं,
"बीवी बेटी बहन पड़ोसन थोड़ी-थोड़ी-सी सब में
दिन भर एक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी माँ..."

सामने खड़ी आशा माँ बेटे को ऐसे मिलते देख मुसकरा रही थी। मुझसे "हाय" किया उसने, फिर शायद उसे ही अटपटा-सा लगा और "नमस्ते" में हाथ जोड़ दिए। शुद्ध हिंदी उच्चारण, "जी में आशा हूँ"। मैं तो खुश हुआ ऐसा उच्चारण यहाँ लोगों का न हो।
नीता नटनी-सी पागलों-सी दौड़-दौड़ सारी तैयारियाँ करने लगी, बेटे को क्या पसंद है क्या नहीं, सब पता है। और बेटा भी मदद करता ही रहा।
"उदय एकाएक, सरप्राइज़ ऐसा भी क्या, बताया तो होता,''
"पापा आशा ने कहा, न्यू इयर इंडिया में ही सेलिब्रेट करेंगे, उसकी माँ का भी मन था वो इंडिया जाए, आई कहाँ है कभी।''
मैंने आशा को देखा, उसके गालों पर वही गोल गड्ढ़े, खुशी के।

माँ बेटे के मेल-मिलाप के बीच आशा से बातें कीं, कहीं अपने को अकेला ना समझने लगे। नीता तो बस बेटा दिख जाए मगन हो जाती है, फिर और कुछ दिखता नहीं उसे। आशा ने मुझसे न्यू इयर सेलिब्रेशन प्लान के बारे में पूछा। मैं याद करते हुए बताता हूँ कि आज से ५ साल पहले जब मैं रिटायर हुआ था, ऑफ़िस की पार्टी मेरी भी लास्ट न्यू इयर पार्टी थी। उसके बाद हमने इलाहाबाद छोड़ दिया। यहाँ दिल्ली में आकर रहने लगे। आशा की आँखें भी हँसती हैं जब वो हँसती है। खुश थी कि मैंने यहाँ आकर रुकने की कोशिश नहीं की, बिजनेस शुरू किया, वो काम शुरू किया जो घर बैठे हो सकता था, अरे भई ऑटो चलते हैं, अस्थाना साब के।
बेटे के आने की खुशी में पागल हुई जा रही नीता ने क़रीब १० सालों बाद न्यू इयर पार्टी में डान्स भी किया, बेटे के साथ, पूरे मन से। आशा और मैं दूर बैठे थे, "आशा, छोटी बच्ची नहीं लग रही तुम्हें नीता,'' कहा तो आशा एक पल को गंभीर हो "हूँ", करती है, फिर वही गाल के गढ्ढे और हँसी।
आज उदय चला गया है। घर में सन्नाटा है, जैसे कोई कभी यहाँ रहता ही न हो। नीता जैसे इतने दिनों से सोयी ही न हो थकी सो रही है। नया साल कितनी खुशियाँ लाया है, गिनने बैठ जाएँ, तो गिनती कम हो जाए, उदय और आशा के साथ बिताया एक-एक पल... जैसे बादल-सा फट पड़ा हो हमारे ऊपर, हम बस ठगे से देखते रह गए हों, इतने लाचार, पर इस लाचारगी में भी कितनी खुशी है।

हर किसी के लिए खुशियाँ अलग-अलग परिभाषा रखती हैं। आज खाली बैठा था, नीता भी सो रही थी, तो कार ड्राइवर प्रकाश से बात हुई, अभी थोड़ी देर पहले। काफ़ी देर बाद शरमाते हुए बताया उसने कि जब हम न्यू इयर पार्टी में थे, वो अपने परिवार को उसके शब्दों में "सहर घुमाने नए साल पर" ले गया था। उसका न्यू इयर सेलिब्रेशन। सबकी एक अलग दुनिया सबका एक छोटा-सा स्वर्ग। अपने बच्चों, क्या नाम बताया था ज्योना या ज्योती और हाँ प्रिन्स के बारे में बताता रहा।
आज सोच रहा हूँ, हम जीते क्यों है, खुशी की तलाश में। छोटी-छोटी बूँद बूँद टपकती, अपनी पवित्रता, बस एक झलक से सतरंगी हो जातीं खुशियाँ...जानता हूँ बहुत बड़ी चीज़ माँग रहा हूँ पर, हे भोर के तारे हर कहीं यही बूँद बूँद ही सही पर बस खुशियाँ भर दो...

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७ जनवरी २००८

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