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मुझे बात की मंशा को पकड़ने में देर नहीं लगी। मुझे लगा कि श्रीमती मल्होत्रा अपने इस कथन के ज़रिए मुझे चित करना चाहती हैं। उसकी बात में एक ऐसे आभिजात्य कांपलेक्स की बू आ रही थी जिसके वशीभूत होकर व्यक्ति अपने को दूसरे से श्रेष्ठ समझने लगता है। मैंने तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त की-
''देखिए मैडम, विदेश में चाहे आप स्वर्ग भोग लें, मगर वह देश आपको दूसरे दर्जे का नागरिक ही मानेगा. . .अपने देश जैसी उन्मुक्तता वहाँ कहाँ?

मेरी बात सुनकर मिसेज मल्होत्रा ने जैसे मुझसे जिरह करने की ठान ली। इस बार वे अंग्रेज़ी-मिश्रित हिंदी में बोली. . .
''व्हाट डु यू मीन! माई सन गेट्स मोर दैन थ्री लैक रुपीज़ एज सैलरी इन ए वैरी गुड कंपनी. . .इतनी सैलरी उसको इंडिया में कौन देता? ही इज वेरी ब्रिलियंट. . .कंपनी उसको छोड़ती नहीं है, सच ए जीनियस इज़ ही. . .व्हॉट इज़ हियर इन दिस कंट्री?''

अभी तक मैं शांत भाव से उनसे बात कर रहा था। कहीं कोई कडुवाहट या उत्तेजना नहीं थी। मगर मिसेज मल्होत्रा के अंतिम कथन ने मुझे भीतर तक बेचैन कर डाला। मिस्टर मल्होत्रा मेरी बेचैनी भाँप गए।
मेरी श्रीमती जी भी तनिक आशान्वित नज़रों से मुझे देखने लगी। उसे लग रहा था कि मैं ज़रूर प्रतिवाद करूँगा। मेरे अंदर भावों का समुद्र उफन रहा था, फिर भी संयत स्वर में मैंने कहा- ''देखिए, कंपनी आपके बेटे पर कोई एहसान नहीं कर रही। आपका बेटा चूँकि सुयोग्य है, इसलिए उसे अच्छा पैसा दे रही है। सीधी सी बात है। वह कंपनी को अपनी मेहनत और लगन से कमा कर दे रहा है, तभी बदले में कंपनी उसे अच्छा वेतन दे रही है। जिस दिन वह काम में कोताही करेगा, उसी दिन कंपनी उसको घर बिठा देगी। और फिर आपका होनहार बेटा अपनी सेवाएँ अपने देश को नहीं, विदेश को दे रहा है। इस देश के लिए उसका क्या योगदान है भला? बुरा न माने तो आप दोनों के लिए भी उसका कोई योगदान नहीं है- वह ब्रिलियंट होगा, जीनियस होगा। अपने लिए। इस देश के लिए उसका होना या न होना बराबर है।''

मेरे मुँह से सच्ची-तीखी बातें सुनकर दोनों पति-पत्नी सक़ते में आ गए। आज तक उनको शायद किसी ने भी इस तरह की खरी-खोटी बातें नहीं कहीं होंगी। मेरी बातें सुनकर मिस्टर मल्होत्रा खड़े हो गए। मैंने बात का रुख मोड़ते हुए कहा-
''ठीक है, आप हो आइए विदेश से। रिसेप्शन के समय हम सभी हाज़िर होंगे। मेरे लायक और कोई सेवा हो तो बता दें या अमेरिका से लिख भेजें।''

मेरी इस बात ने निश्चित ही वातावरण को तनिक हल्का कर दिया और मल्होत्रा दंपति हमसे विदा हुई। अगले महीने शादी हो जाने के बाद मल्होत्रा दंपति बहू-बेटे को लेकर भारत आए। यहाँ कार्यक्रम के अनुसार उन्होंने एक अच्छी-सी पार्टी दी। कुछ दिनों तक भारत में घूम लेने के पश्चात बेटा-बहू दोनों वापस अमेरिका चले जाने की तैयारी करने लगे। मेरी श्रीमती जी को अपने मकान की चाबी सँभालते हुए मल्होत्रा दंपति कह गए कि अब वे भी साल-दो साल तक बेटे-बहू के पास रहेंगे। मकान मालिक को समझा दें कि किराये की चिंता बिल्कुल न करें। उनके खाते में वे वहीं से पैसा डाल दिया करेंगे।

मुश्किल से तीन महीने गुज़रे होंगे। एक दिन मैंने देखा मल्होत्रा साहब के मकान की बिजली अंदर से जल रही है। मैं भीतर चला गया। मल्होत्रा साहब अख़बार पढ़ रहे थे। मुझे देख वे खड़े हो गए। मैंने हैरानी-भरे स्वर में पूछा-
''अरे, आप अमेरिका से कब लौटे? आप तो साल-दो साल में लौटने वाले थे. . .यह अचानक!
मेरी जिज्ञासा सही थी जिसको शांत करने के लिए उन्हें माकूल जवाब देना था। इस बीच मैंने पाया कि हताशा उनके चेहरे पर अंकित है और मायूसी के अतिरिक्त उनके स्वर में कुछ प्रकंचन घुला हुआ है। वे बोले-
''अजी, हम बुजुर्गों का वहाँ क्या काम? उस देश को तो हुनरमंद और फिट व्यक्ति चाहिए। फारतू लोगों को वहाँ रहने नहीं देते। हमको उन्होंने वापस भेज दिया।''

मिस्टर मल्होत्रा जब मुझसे बात कर रहे थे तो मैंने देखा कि मिसेज मल्होत्रा मुझसे नज़रें बचाकर बाथरूम में घुस गई।

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9 मई 2007

 

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