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एक दिन समय निकालकर मैं और मेरी श्रीमती जी शिष्टाचार के नाते उन आगंतुक पड़ोसी के घर मिलने के लिए गए। इस बीच हम बराबर यह आशा करते रहे कि शायद वे कभी हमसे मिलने को आएँ, मगर ऐसा उन्होंने नहीं किया। कदाचित अपने संकोची स्वभाव के कारण वे अभी लोगों से मिलना न चाहते हों, ऐसा सोचकर हमने ही उनसे मिलने की पहल की। हमें अपने घर में प्रवेश करते देख वे प्रसन्न हुए। उनकी बातों से ऐसा लगा कि बहुत दिनों से वे लोग भी हमसे मिलना चाह रहे थे, किंतु मारे सकुचाहट के वे बहुत चाहते हुए भी हमसे मिलने का मन नहीं बना पाते थे। मेरा अनुभव रहा है कि बातचीत का प्रारंभिक दौर प्रायः ऐसी मुलाक़ातों में अपने-अपने परिचय, मोटी-मोटी उपलब्धियों, बाल-बच्चों की पढ़ाई, उनकी नौकरियों या शादियों आदि से होता हुआ कालोनी की बातों अथवा महंगाई और समकालीन राजनीतिक-सामाजिक दुरवस्था तक सिमटकर रह जाता है। ऐसी कुछ बातें हमारी पहली मुलाक़ात के दौरान हुई तो ज़रूर, मगर एक ख़ास बात जो मैंने नोट की, वह यह थी कि हमारे यह नए पड़ोसी मल्होत्रा साहब और उनकी पत्नी घूम-फिर कर एक ही बात की ओर बराबर हमारा ध्यान आकर्षित करने में लगे रहे कि उनका एकमात्र लड़का विदेश में है और किसी बड़ी कंपनी में इंजीनियर है। वहीं उसकी पढ़ाई हुई और वहीं उसकी नौकरी लगी। साल-दो साल में एक-आध बार वे दोनों भी वहाँ कुछ महीनों के लिए जाते हैं। अमेरिका के वैभव, जीवन-शैली, मौसम, लोगों के श्रेष्ठ रहन-सहन आदि का आनंद-विभोर होकर वर्णन करते-करते उन्होंने अपने बेटे की योग्यताओं, उपलब्धियों व उसकी प्रतिभा का खुलकर बखान किया जिसे मैं और मेरी श्रीमती जी ध्यानपूर्वक सुनते गए। इस बीच मैंने पाया कि मल्होत्रा साहब ने ज़्यादा बातें तो नहीं की, किंतु उनकी श्रीमती जी बराबर बोलती रहीं। चूँकि यह हम लोगों की पहली मुलाक़ात थी, इसलिए शिष्टाचार का निर्वाह करते हुए हमने उनकी सारी बातें धैर्यपूर्वक सुन ली और यह कहकर विदा ली कि फिर मिलेंगे- अब तो मिलना-जुलना होता ही रहेगा।

घर पहुँचकर मैं और मेरी श्रीमती जी कई दिनों तक इस बात पर विचार करते रहें कि विदेशों में रहने की वजह से मल्होत्रा दंपति के व्यवहार में, उनकी बातचीत में और उनकी सोच व दृष्टि में यद्यपि कुछ नयापन या खुलापन अवश्य आ गया है, मगर अपने पुत्र से बिछोह की गहरी पीड़ा ने इन्हें कहीं-न-कहीं भीतर तक आहत अवश्य किया है। कहने को तो ये दोनों अपने बेटे की बढ़ाई ज़रूर कर रहे हैं, वहाँ के ऐशोआराम की ज़िंदगी का बढ़चढ़ कर यशोगान ज़रूर कर रहे हैं, मगर यह सब असलियत को छिपाने, अपने मन की रिक्तता को ढकने व अवसाद को दबाने की गरज से वे कह रहे हैं।

कई महीने गुज़र गए। एक दिन मल्होत्रा साहब और उनकी पत्नी शाम के टाइम हमारे घर पर आए। इस बीच कभी मार्केट में या फिर आस-पड़ोस की किसी दुकान पर वे मुझे अक्सर मिल जाया करते। एक-दो बार हमने दिल्ली की यात्रा भी साथ-साथ की। रास्तेभर वे अपने विदेश के अनुभवों से मुझे अवगत कराते रहे। कल वे दोनों मुझे रेल्वे स्टेशन पर मिल गए थे और कह गए थे कि जल्दी ही वे हमारे घर आएँगे। एक खुशी का समाचार वे हमें देने वाले हैं. . .। ड्राइंग-रूम में बैठते ही मल्होत्रा साहब ने एक सुंदर-सा लिफ़ाफ़ा मुझे पकड़ाया। इससे पहले कि मैं कुछ पूछूँ, उनकी श्रीमती बोल पड़ी-
''बेटे रवि की शादी अगले महीने की पाँच तारीख को तय हुआ है। यह उसी का कार्ड है।''
''अच्छा, फिक्स हो गई आपके बेटे की शादी? रिश्ता कहाँ तय किया?'' मैंने जिज्ञासा-भरे लहजे में कहा।
''वो-वोह जी, लड़के ने अमेरिका में ही एक लड़की पसंद कर ली। उसी के ऑफ़िस में काम करती है।''
''मगर, मिसेज मल्होत्रा! आप तो ज़ोर देकर कह रही थी कि बेटे के लिए बहू मैं अपने देश में ही देखूँगी। विदेश में अच्छे दोस्त मिल सकते हैं, अच्छी पत्नियाँ नहीं।''

मेरी बात सुनकर दोनों पति-पत्नी क्षणभर के लिए एक-दूसरे को देखने लगे। मुझे लगा कि मेरी बात से वे दोनों दुविधा में पड़ गए हैं। बात इस बार मि.मल्होत्रा ने सँभाल ली, बोले-
''ऐसा है जी, लड़की भी कंप्यूटर इंजीनियर है। रवि के ही ऑफ़िस में काम करती है। मूलतः इंडियन ओरिजिन की है। कई पीढ़ियों से वो लोग अमेरिका में बस गए हैं. . .बेटे की भी इस रिश्ते में ख़ासी मर्ज़ी है और फिर डेस्टिनी भी तो बहुत बड़ी चीज़ है।''

चूँकि डेस्टिनी यानी नियति की बात बीच में आ गई थी, इसलिए इस प्रसंग को और आगे बढ़ाना मैंने उचित नहीं समझा। बातों के दौरान मालूम पड़ा कि शादी अमेरिका में होगी क्योंकि लड़की के सारे परिजन वहीं पर रहते हैं। मल्होत्रा दंपति अपने एक-आध परिजन के साथ वहाँ जाएँगे और शादी हो जाने के बाद यहाँ एक अच्छी-सी पार्टी देंगे।
इससे पहले कि मैं इस रिश्ते के लिए मल्होत्रा जी को बधाई देता और उनकी सुखद विदेश-यात्रा की कामना करता, मिसेज मल्होत्रा बोली-
''भाई साहब, एक बार आप अमेरिका ज़रूर हो आएँ। वाह, क्या देश है! क्या लोग हैं! ज़िंदगी जीने का मज़ा अगर कहीं है तो अमेरिका में है - मौका लगे तो आप ज़रूर हो आना. . .।''

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