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24
. 4. 2007

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हास्य व्यंग्य

इस सप्ताह—

समकालीन कहानियों में यू एस ए से
उमेश अग्निहोत्री की कहानी क्या हम दोस्त नहीं रह सकते

"दोस्त! क्या मतलब है आपका? "  जय का हँसमुख चमकदार चेहरा फ़ौरन अपनी चमक खो देता, आँखों की पुतलियाँ ऊपर-नीचे दाएँ-बाएँ घूमने लगतीं, एक हाथ की उंगलियों के पोर मेज़ पर बेआवाज़ उलटी-सीधी थाप देने लगते, और दूसरे हाथ की उंगलियों से वह अपने माथे पर गिर आये बालों को पीछे हटाने लगता। पहली बार जब उसके साथ ऐसा वाकया घटा था उसने चेहरे पर किसी तरह बनावटी-सी हँसी बनाए रखी थी, और कहा था, "धन्यवाद, जो आपने यह नहीं कहा, क्या हम भाई-बहन नहीं बन सकते? अगर आप यह कह देतीं, तो फिर अपने भाई से यह भी आग्रह करतीं कि बहन के लिए कोई अच्छा लड़का भी सजेस्ट कीजिए।"

*

हास्य-व्यंग्य में अविनाश वाचस्पति की रचना
मैच फ़िक्सिंग के रिमिक्

विश्व क्रिकेट का ग्लोबल माहौल है। सब कुछ क्रिकेटमय हो गया है। युवकों के बाल धोनीमय हो गए हैं। किसी ने टोपी, किसी ने बैट - सब कुछ कर लिया है सैट। इसी से बचने के लिए मोबाइल फोन पर आउटगोइंग काल की जा रही हैं बैन। पर इनकमिंग भी तो ख़तरनाक हो सकती है। क्रिकेट मैच के दौरान जिस प्रकार मैदान विज्ञापनों से सराबोर हो उठता है उसी प्रकार वर्तमान में हालत यह है कि खिलाड़ी खुद भी विज्ञापनों छपी शर्ट, पैंट, हैलमेट इत्यादि धरण कर लेता है। उसके इस हाल के लिए ज़िम्मेदार सिर्फ़ पैसे की ललक ही तो है जो उसे इस विज्ञापनबाज़ी के लिए प्रेरित करती है।

*

धारावाहिक में
कामतानाथ की कहानी
संक्रमण का दूसरा और अंतिम भाग
पापा शर्तिया सठिया गए हैं। रिटायर होने के छः-आठ महीने बात तक तो ठीक रहे। उसके बाद पता नहीं क्या हो गया है, दिन भर, रात भर बड़बड़ाते रहते हैं। ज़रा-ज़रा-सी बात पर गुस्सा करने लगते हैं। कभी किसी पर बिगड़ रहे हैं तो कभी किसी पर। सबसे ज़्यादा नाराज़ तो मुझसे रहते हैं। शायद ही मेरी कोई बात उन्हें पसंद हो, जबकि आज तक मैंने कभी उनकी किसी भी बात पर, चाहे कितनी ही बुरी लगे मुझे, पलटकर जवाब नहीं दिया। सबसे बड़ी नाराज़गी तो उनकी इस बात से है कि मैं दफ़तर से सीधे घर क्यों नहीं आता। कहते हैं चिंता होने लगती है। सड़कों पर लूटमार और कत्ल होते रहते हैं, एक्सीडेंट होते रहते हैं।

*

प्रौद्योगिकी में
रविशंकर श्रीवास्तव का प्रश्न आप क्या कर रहे हैं?
ट्विटर का साधारण-सा उद्देश्य है – आप दुनिया को, दोस्तों को और चाहें तो दुश्मनों को भी, अंग्रेज़ी के 140 अक्षरों (हिंदी के लिए ज़ाहिर है ये कम हो जाएँगे) में ये बताएँ कि आप क्या कर रहे हैं? इसके लिए ट्विटर में पंजीकृत होना होता है, जो कि पूर्णतः मुफ़्त है, फिर चाहें तो मिनट दर मिनट सारी दुनिया को बताते रहें कि आप उस वक्त क्या कर रहे हैं। आपका लिखा आपके ट्विटर घर पृष्ठ पर दर्ज होता रहेगा। आप ट्विटर मित्र जोड़ सकते हैं या आप ट्विटर मित्र बन सकते हैं। आप क्या कर रहे हैं यह प्रविष्टि चाहें तो व्यक्तिगत रूप से, सार्वजनिक प्रदर्शन हेतु अवरुद्ध भी कर रख सकते हैं।

*

साहित्य समाचार में

सप्ताह का विचार
अपने दोस्त के लिए जान दे देना इतना मुश्किल नहीं है जितना मुश्किल ऐसे दोस्त को ढूँढ़ना जिस पर जान दी जा सके। - मधूलिका गुप्ता

 

डॉ राधेश्याम शुक्ल, शबनम शर्मा, गिरीश बिल्लोरे ''मुकुल''
और
सुरेश राय
की नई रचनाएँ

ताज़ा हिंदी चिट्ठों के सारांश
नारद से

-पिछले अंकों से-
कहानियों में
फ्रैक्चर- डॉ० मधु संधु
चश्मदीद- एस आर हरनोट
बैसाखियाँ - इला प्रसाद
पगडंडियों की आहटें - जयनंदन
अगर वो उसे माफ़ कर दे-अर्चना पेन्यूली
होली का मज़ाक-यशपाल
*

हास्य व्यंग्य में
पेन मांगने में शर्म... -दीपक राज कुकरेजा
प्री-मैच्योर रिटायरमेंट- गुरमीत बेदी
वाह डकैत हाय पुलिस-डॉ. नवीनचंद्र लोहानी
जिस रोज़ मुझे भगवान...-तरुण जोशी
*

संस्कृति में
अशोक श्री श्रीमाल का आलेख

शब्दकोश का जन्
*

आज सिरहाने
कमलेश्वर का उपन्यास
अम्मा- राजेंद्र दानी के शब्दों मे
*

नाटकों में
कुमार आशीष का
संकल्
*

रचना प्रसंग में
श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी और डॉ. विनय कुमार पाठक बता रहे हैं
ललित निबंध के मानदंड
*

फुलवारी में
मौसम की कहानी का अगला भाग
तूफ़ान क्यों आते हैं?
*

रसोईघर में
माइक्रोवेव-अवन में पक रहे हैं
हरे प्याज़ और मटर,
गाजर के साथ
*

दृष्टिकोण में
महेश चंद्र द्विवेदी खोल रहे हैँ
भारतीय दंड-संहिता की
कमज़ोर कड़ियाँ

*

संस्मरण में
भीष्म साहनी की आपबीती
हानूश का जन्

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"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1 – 9 – 16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन¸ कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन
-|-
सहयोग : दीपिका जोशी

 

 

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